मार्च 20, 2013

दिहाड़ी डायरी: किश्त चार: हाथ कंगन को आरसी क्या

भले 'प्रथम' की 'असर रिपोर्ट' ग्रामीण परिप्रेक्ष्य में परीक्षाओं को ख़त्म करने और 'सतत एवं निरंतर मूल्यांकन प्रणाली' को शिक्षा के गिरते स्तर के लिए उत्तरदायी माने लेकिन यह शहरी क्षेत्र का भी उतना बड़ा सच है। इस शहर-जो इस देश की राजधानी भी है- के विद्यालयों में उसके घुटने के बल होने के प्रमाण लगातार मिलते रहे हैं। इसी संदर्भ में आशीष की पोस्ट 'शिक्षक बनाम (?)' और नीचे लिखे अनुभवों को पढ़ा जाना चाहिए। जो पाओलो फ्रेरे  के इस कथन को दोबारा से गढ़ने की तरफ चले जाते हैं जहाँ वे विद्यार्थी के फेल हो जाने को विद्यालय की विफलता कहते हैं।  कब? आज नहीं। सत्तर के दशक में।

फौरी तौर पर भारतीय सन्दर्भों में यह विद्यार्थी के साथ विद्यालय की भी विफलता लगती है। पर ध्वनियाँ और भी आगे तक जा रही हैं, उनपर अभी नहीं। अभी बस वे दो दिन। जहाँ मैं क्या कर रहा था, मुझे नहीं पता..

शनिवार दो मार्च, तीन बजकर सात मिनट। पेपर शुरू हुए आधे घंटे से ज़यादा हो चुके हैं और दसवी क्लास एक दूसरे का मुँह ताक रही है। कभी कभी हमारी तरफ भी देख लेते हैं। क्वेश्चन पेपर पढ़ने के बजाय इंतज़ार कर रहे हैं उन घड़ियों जब नक़ल शुरू होगी। दसवी कभी बोर्ड की क्लास हुआ करती थी। इनकी परीक्षा स्कूल  में इसलिए हो रही है क्योंकि नीति निर्माताओं को डर था कि कहीं भावी संसाधन आत्महत्या न कर ले। टिक कर बैठ नहीं रहे हैं। बार बार बहाना बनाकर बाहर जाना चाहते हैं।

जो बाहर से लौट आये हैं वे बता रहे हैं कि अगल बगल की क्लासों में क्या हो रहा है! आप भी उसी रास्ते पर चलो सरजी। दूसरा बोला के कोई चश्मे वाले सरजी आपको बुला रहे हैं। इसी बीच विषय अध्यापक आये उन्होंने पहले नौ बहु-विकल्पीय प्रश्नों में खाली जगह का महत्त्व बताया और यह भी के नक़्शे में कौन जगह कहाँ है।

ऐसा नहीं है सवाल किसी और जमात की किताब से आये हैं। यह तो वे बच्चे हैं जिन्हें परीक्षा उपयोगी सहायक सामग्री भी मुहैया करवाई गयी है। पर साल भर कुछ पढ़ा हो, किसी घंटी में रुके हों तब न कुछ कर पाएंगे। पता नहीं की पायलट प्रोजेक्टों, एक्शन रिसर्चों के बाद यह फैसला लिया गया होगा कि दसवीं के बोर्ड को वैकल्पिक बना दिया जाये। शायद उनकी चिंता का एक ही कारण था। उन्हें चाहिए ऐसे ही अधकचरे दिमाग।

अभी अभी पैरवी आई है। कि ढील दे दी जाए। इतनी सख्ती पर तो बेचारे साँस भी नहीं ले पायेंगे। साँस उनकी नाक नहीं उनके कपड़े लेंगे। जहाँ चिटें फँसा रखी हैं। एक-एक कर निकलेंगी। तब कुछ जवाब देते बनेगा।..

सोमवार अट्ठराह मार्च, चार बजे करीब। मोर्चे पर डटे हुए काफी देर हो चुकी है। पर आज शांत होने का नाम नहीं ले रहे हैं। बेचैन हैं। सब। ग्यारहवीं तो ग्यारहवीं, दसवीं भी उन्ही के क़दमों पर। इधर जाओ तो उधर। दंगा ग्रस्त इलाके को संभालो। तभी किसी तीसरी तरफ से। बैठ नहीं रहे हैं। पेपर पर रोल नंबर के सिवाय कुछ लिख नहीं पाए हैं। जब बोलो के कुछ लिखो तो कहते हैं अभी सर जी आयेंगे। उन्होंने कहा था। तभी एक लड़का अंदर आया। कहने लगा सर दिवार की पिछली तरफ हैं। वहां से अभी आयेंगे।

मैं थोड़ी देर नीचे गया। वापस आया तो मास्टर जी ब्लैक बोर्ड पर अपना काम कर रहे थे। यही वे मास्टर हैं जो पीजीटी क्लासों में लगे अरेंजमेंट इसलिए लेने नहीं जाते क्योंकि बच्चे इनसे संभलेंगे नहीं। खुद इनकी नौवी दसवी देखी हैं जहाँ बच्चे बिन बताये बिन पूछे अंदर बाहर होते रहते हैं। कान पर मोबाइल लगा है। क्लास क्लास कम भिन्डी बाज़ार ज़यादा लगती है। खैर।

आज इनकी परीक्षा हो जैसे। एक-एक सवाल ब्लैक बोर्ड पर करते जा रहे हैं और वहीँ पड़े किसी अनाम बस्ते से चौक मिटाते जा रहे हैं। ऐसा नहीं है के इस पूरी प्रक्रिया में सब ध्यान लगा कर सामने देखते रहते हैं। नहीं। बल्कि अपने पड़ोसी के यहाँ ताँक-झाँक करते पाया जा सकता है। क्योंकि लिखने का कौशल उन्होंने अर्जित नहीं किया। न किसी अध्यापक ने इसे अपनी जिम्मेदारी समझा।

यह दृश्य देख किसी बाहरी को यह लग सकता है कि शायद सत्र के दौरान कक्षाएँ कम लगी होंगी। पर ऐसा नहीं है। कुल आध घंटे बाद हम अभी अंदर दाखिल हुए हैं। चुप नहीं बैठा जा रहा है उन सबसे। नक़ल का कोई सवाल रह न जाए। इसकी बेचैनी बढ़ गयी है। कुछ जिनके हाथ तेज़ चलते हैं वे अलग अलग तरह की भाव भंगिमाएँ मुख मुद्राएँ बनाकर पर्चियाँ चलने की अनुमति माँग रहे है।
***

2 टिप्‍पणियां:

  1. bhaiya kam se kam nvs ke sath bord par likhne ya batane jaise baat to nhi hai par preekshopyogi samagri hi saal bhar idher bhi di jati hai

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  2. चलो कुछ विद्यालय इससे बचे रहें. पर देखना दिलचस्प होगा के यह बचना कहीं विचारधारात्मक रूप में किसी मुखौटे के रूप में तो काम नहीं कर रहा..खैर, दिल्ली के स्कूलों की तो बुरी हालत है. अध्यापक पर कुछ कुछ सोच रहा हूँ, के उनकी क्या भूमिका है. या वस्तुस्थिति परक उभे कहाँ स्थित किया जा सकता है. कुछ उस तंत्र के बारे में अध्यापक को लेकर लिखो तो मेरे लीये भी अच्छा रहेगा.

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