मार्च 09, 2013

गुमशुदा पेट की तलाश


तीसरा क्षण

1.
अगर वहाँ रेड लाइट नहीं होती 
तब उसे ढूंढ़नी पड़ती कोई नयी जगह
जहाँ से वह मिल सके अनजान भीड़ से 
भीड़ से वह न भी मिलना चाहे
पर उनकी जेबों में
खनकते पैसों से ही दूध आएगा
जो उसके स्तनों में इस बार भी नहीं उतरा है

किसी ने मुझे बताया नहीं है 
कि इस बार भी वह मरते मरते बची है
इस गोद में लिए बच्चे को जनते हुए
लेकिन जब से देख रहा हूँ, यही लगता है

और इस बार भी नहीं कहूँगा के 
उसका पेट पीठ को छूता दिख रहा है
बहुत पुराना लगता है
मैं कहूँगा के उसके पेट में पेट ही नहीं है 

बस है एक गर्भाशय

पेट का यूँ गायब हो जाना 
किसी शेर के जंगल से गुम हो जाने से भी बड़ी त्रासदी है 
त्रासदी नहीं। उसमे तो शास्त्रीय दुःख होगा। पीड़ा होगी।
और इस पर तो उसका अधिकार भी नहीं है।

वैसे यह ऐसी पीड़ा भी नहीं है 
कि कोई कम्पनी उसे अपना ब्रांड अम्बेसडर बना ले।

इसे कुछ और कहूँगा। फिर कभी।

वैसे किस कोतवाली में इस गायब हुए पेट की रिपोर्ट लिखी जाएगी??

2.
यहाँ मेरी भूमिका किसी फिल्म के हीरो की तरह 
हो जानी चाहिए थी। पर नहीं हुई। 

होती कैसे? 
जेब में रियायती पास लिए सरकारी बस की खिड़की पर डटा रहा

कुछ दिन लगातार उसे देखता रहा 
सोचा
मुक्तिबोध जिसे रचना का तीसरा क्षण कहते हैं
उसके पास पहुँचने ही वाला हूँ 
तब लिखूंगा एक कविता

और यहाँ तक पहुँचने में लग गए चार साल
रेड लाइट वहां अब भी है 
कभी कभी खुद भी उसी रस्ते पर चलना हो जाता है 
पर नहीं दिखाई देती वह 

पता है आज भी कुछ नहीं कर पाउँगा 
पर कुछ देर उससे बोलता बतलाता ज़रूर

पूछता नहीं कौन है उसके बच्चों का पिता 
पूछता कहाँ है उसके बच्चे 

3.
वह कोई नायिका नहीं थी
जो मेरे सपनों में आये
जैसे कई लोगों के सपनों में रोज़ नायिकाओं की हाज़री लगती आई है
उसके चहरे का बचपन याद आ जाता है कभी-कभी
मेरी ही उम्र की रही होगी
या मुझसे कुछ छोटी ही।

एक रात अचानक उठ बैठा 
इसे सकपकाना लिखूं या हड़बड़ाना या कुछ और 

पिछले ही पल दिखाई दी थी वह मुझे 
अपने बच्चों के साथ

जन्तर मन्तर पर मिली
अनशन पर बैठने नहीं जा रही थी
पूछने से पहले ही बोली 
सीधे जहाँगीर पुरी से आ रही हूँ, एक सौ इक्यासी में

और कहने लगी मैं भी जा रही हूँ संसद
घेराव करने नहीं। सवाल पूछने नहीं।
जवाब देने।

आगे कुछ लिखुँगा तो मुझे भी पकड़ ले जायेंगे 
जैसे उन्हें ले गए। और थोड़ा डरता भी हूँ।
इसलिए 
बस इतना कहूँगा, उनके हाथ खाली नहीं थे। 
न उनके हाथों में जो थे वो दिवाली के खिलौने लग रहे थे।

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