मार्च 25, 2013

पिनक यह के बस जो तुम हो मैं नहीं हूँ..

{एक ख़त। पर यहाँ उसे ख़त रहने नहीं दिया है। जहाँ तहाँ सीवन मजबूत की है। तहें लगा दी हैं। कुछ और बातें कही थीं उन्हें रोक लिया है। }

पता नहीं कैसा कैसा होने सोचने के साथ कई-कई विचारों के झोल झाल से खुद को ऊबड़-खाबड़ पठार बनने से रोकता हुआ सोच रहा था तकनीक भी इसी समाज का प्रक्षेपण ही है। उसी को प्रतिबिंबित करती है। और इसी में घुसता मेरा एक विचार यह है के इधर एक दो पल से खुद को ठीक ठाक लिखने वाला मानने लगा हूँ। गलत भी हूँ या गलतफ़हमी जैसा भी हो तब भी 'रिस्क' ले ही लिया है। कुछ पढ़ा लिखा भी है और अपने अस्तित्व को बचा ले जाने की जद्दोजहद में पिल भी पड़ा लगता हूँ। हिज्जे 'क्लिष्ट' होते जा रहे हैं तो वह भी मेरी मानसिक प्रकाल्पनाओं का ही एक रूप हैं जहाँ सरल होने के चक्कर में जटिल होता गया हूँ। कहे। बिन कहे।

और इन सबके बीच जो पीड़ा पीड़ित कर रही है के अपन को कोई पूछ नहीं रहा है। कहीं कोई पुकार भी रहा है तो अपनी भाषा में नहीं होगा। वरना अब तक तो लपक लेता। अस्तित्व पर खतरा जैसा न भी हो तब भी इसी के इर्दगिर्द मंडरा रहा हूँ।

पर अगले पल लगता है ऐसा क्या सब लिख मारा है जिससे कोई जाने। कोई पहचाने। चीन्ह ले। यह सापेक्षता ऐसे ही गुल खिल रही है। यह माध्यम बिलकुल प्रिंट की रूपरेखा पर चलता दिख रहा है। जिन्हें लोग वहाँ पढ़ते हैं, उन्हें ही यहाँ नेट पर खोजते हैं। और जो भी लेखक नामधारी है दूसरे की दिवार पर ऐसी टीप करता है जिससे उसके नंबर बढ़ते जाएँ। भक्तिभाव का उत्तर आधुनिक संस्करण।

पर ऐसा क्यों लिख रहा हूँ। जो उनकी मर्ज़ी वो करें पर यहीं खुद के बारे में सबसे ज़यादा सोचता हूँ। लगता क्या है, यहाँ इन्टरनेट पर एक अदद ठीक ठाक ब्लॉग चला रहा हूँ। इसी खुशफ़हमी से रोज़ दो चार होते लगता है कहीं तो हैं ही जो मुझे पढ़ रहे होंगे। पर नहीं। आज तक मेरी पकड़ में कोई आया नहीं है। आज तक इन दो ढाई सालों में कहीं से कोई नया पाठक मिला हो इसके धूमिल होते संकेत भी नहीं मिले। फिर स्वांतः सुखाय वाले फ़ॉर्मूले पर टिके रहना छीजता है। कतरा कतरा लगने लगता है कहीं भी कोई नहीं है। 'खुद को पढ़े जाने' वाला भाव इधर लगातार हावी होता जा रहा है।

फिर यह भी सोचता हूँ के इसका रास्ता भी वहीँ छापेखाने की बगल से ही जाएगा। अगर इस रूप में देखूं तो यह दूसरों से सर्टिफिकेट लेने जैसा है खुद की वैधता हासिल करने जैसा। संस्थागत हो जाने के अपने लाभ हैं, लेकिन उतने ही मजबूत उनके बंधन भी। क्योंकर यह सब विरोधाभासी बातें लगातार दिमाग की परत-दर-परत टकरा रही है और लगातार कमज़ोर ही कर रही हैं। ऐसा न भी हो तो वैचारिक रूप से लेखन के लिए प्रोत्साहित तो नहीं ही करेंगी। यह 'मोटिवेशन' बाहर से ही आएगा ऐसा नहीं है पर कभी न कभी उसमें जो सम्प्रेषण जैसी प्रक्रिया वाला हिस्सा है उसके आग्रह ऐसा होते जाना चाहते हैं।

लिखना टूटफूट से से ज़यादा मुझे तोड़ता जा रहा है। जो लिख रहा हूँ उसे किसी के सामने लाने की यह जल्दबाज़ी है, आकुलता है, व्याकुलता है या कुछ और समझ नहीं पा रहा। शायद वही सापेक्षता वाला नुक्ता काम कर रहा होगा। यह अपने को साबित करने जैसा ही है। दूसरों के सामने। दूसरा कौन है? वही जो बाहर है। जो अन्दर नहीं है।

पता नहीं क्या सब कैसे कैसे वाक्यों से कह जाना चाहता था। हूँ। जो नहीं भी कहा है उसे कह लेना चाहता हूँ। और सच कहूँ तो कल एक कथित रूप से कविता को समर्पित ब्लॉग पर किसी बीए में पढ़ने वाले लड़के की कुछ कवितायें साझा की थी। कवितायें अनगढ़ भी हो फिर भी वहां थीं। और थीं तीस पार टिप्पणी। उन्हें उसमे संभावनाएँ फूट फूट कर दिख रही थी। और अपन अपने अड्डे पर चुपचाप बैठे लगातार अन्दर की खोहों में उमड़ते घुमड़ते रहे। इसे कुढ़ना भी कह सकते हैं और भाषिक रूप से प्रतिस्पर्धी भाव जैसा कुछ।

बस इसका अंत हुआ एक बार फिर इसी विचार पर के कोई कहानी लिखता हूँ। जो छप जायेगी तब तो लोग मुझे भी जानने लगेंगे। कुछ तो जान पहचान होगी ही। म.श.जो. की पहली कहानी तब छपी थी जब उनकी उम्र तीस के पास थी। बिलकुल हम भी उसी के करीब हैं। तब उन्हें लगेगा कहाँ थे तुम मियाँ अब तक। खुद को तुष्ट करता गालिबाना तुर्रा यह भी सही। दिल बहलाता मुंगेरी लाल का हसीन सपना। पर कब तक। सोचता ही हूँ लिखता नहीं।

पर नहीं लिखना चाहता के किन्ही दूसरों के दबावों में आकर लिखूं। उसमे सहजता होगी सोच भी नहीं पा रहा हूँ। पता नहीं यह सब जो लिखा उसमें मैं कहाँ हूँ। लिखना कहाँ है। बस यही सब था जो कहना चाह रहा था..

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