अप्रैल 01, 2013

मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना

कभी कभी सोचता नहीं हूँ फिर भी तुम ख्यालों में आ जाती हो। बिन बताये। जाने अनजाने। कोशिश नहीं करता कि तुम चली जाओ। बस देखता रहता हूँ। तुम्हारी आँखों में। कहीं मैं छिपा होता। उसी क्षण के इंतज़ार में जैसे। पर नहीं। तुमने शायद मुझे बंद कर लिया होगा। अपनी पलकों में। अगर ऐसा नहीं भी है तो तुम मुझे बताना मत। नहीं तो टूट जायेगा सपना। खुली आँखों वाला सपना। तुमने न भी देखा हो पर मेरे हिस्से में उसे बने रहने दो। पर अगले ही पल ख्याल आता है कब तक? शायद तुम आती रहोगी मैं जाता रहूँगा। पर उसे अभी कुछ देर भूल याद कर लेना चाहता हूँ वो सारे बहाने, वो सारे पल-पल बीतते दिन। बेतरतीब होते जाने के खतरों के बावज़ूद।

बिलकुल तुम्हारे कानों के पास से। छूता हुआ। हवा के झोंके जैसे। पता नहीं ऐसा कुछ भी तुमने कभी सोचा भी नहीं होगा के नहीं। उसमे तुम हो। मैं हूँ। और कोई नहीं। हम चुप हैं। कभी बोल भी लेते हैं। पर ज़यादातर हम एक दूसरे को देख रहे हैं। क्या करूँ उस दिल का जिसकी कई किश्तों में से एक तुम तक छोड़ आया था। तब।

मुझे बराबर लगता मैं सवालों जैसा था। तुम जवाबों जैसी। पर पता है हम दोनों कभी-कभी अदला बदली भी कर लिया करते। बिन बताये। जब जिसका मन करे। पर ये तो बताओ क्या हम दोनों कभी एक दूसरे को देख पिघलने लगते थे। शायद तुम नहीं। पर मैं ज़रूर। हर बार। उन दिनों ज़यादा ही। जब दिन ख़त्म हो रहे थे। जब हम पास थे बिलकुल। जब भी तुम्हे देखता लगता तुम भी उतना ही मुझे भी देख रही हो। और लगता अगर मेरे पास से गुज़रते हुए तुम्हे सुनाई देगया तुम्हे तुम्हारा नाम तब क्या होगा। सुनाई दे जाता तभी अच्छा होता। दिल की धड़कन के साथ तुम्हारी तरफ़ खिसकता चला जाता।

यह खिसकना सिर्फ मैं देख पा रहा था। क्योंकि खिसक फिसल मैं ही रहा था। हर शाम मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों पर बैठे रहने की कई-कई किश्तें सिर्फ तुम्हें देख भर लेने के लिए वहाँ थीं। शायद देख लेना उस प्रेम जैसे शब्द के इर्दगिर्द अपने को रच रहा था। इससे पहले कभी किसी के लिए ऐसा नहीं होते जा रहा था। कोशिश कर रहा था तुम्हारे पास आने की। बहाने जितने कम बनाने आते हैं उतने ही कम मौके हम दोनों को  मेरी तरफ से मिले। तुमने कुछ जब बनाये भी होंगे, तो उन्हें मैं समझा नहीं। या न समझने की..

उस बार मुझे विश्वविद्यालय किसी किताब के लिए नहीं जाना था। यह बस छोटा सा झूठ भर था। तुम्हारे साथ कुछ पल बिताने का। और मैंने भी क्या सवाल किया था। तुम्हारा सेल्फ़ प्रोफाइल बन गया। इतनी झिझक थी के हम दोनों के बीच आकर कोई बैठ भी गया। वो तो किसी तरह बोल कर उसे वहाँ से उठाया था। के हम अगल बगल बैठ सकें। बात कर सकें। इस पास बैठने पर जो हरारत होती उसी से कहीं डरता सा रहा। फिर ऐसे ही एक दुपहरी हम लोग क्लास शुरू होने का इंतज़ार कर रहे थे। वहीँ दरवाज़े पर। और अचानक तुमने कहा था। अरे!! तुम बोलते भी हो। और उस बार तुमने बिन बोले उस सुबह जब हमसब बस में बैठने ही जा रहे थे के उसके पहले सब फोटो खिंचवा रहे थे। तुमने अपनी सहेली को कैमरा दिया और झट से मेरे बगल में आकर खड़ी हो गयी।

ऐसी ही सेकेण्ड से भी छोटे पल से भी छोटी बातों को दिल के किसी कोने में सहेजे रखे हूँ। उस शाम बस से उतरने के बाद पता नहीं तुम्हारी चप्पल कब टूट गयी। पहले लगा के कहीं पैर में चोट तो नहीं लग गयी। पर नहीं। वहाँ मोची कहाँ बैठते हैं मुझे नहीं पता था। अजनबी जगह थी। खैर। बाद के दिनों में वैसी ही चप्पल फिर बल्लीमारन से लाया था। किसके लिए। यह मत पूछना। ऐसे ही उस रात वहाँ से निकलते निकलते कुछ ज़यादा ही रात हो गयी थी। इस बार बस का स्टीरियो ठीक था। फ़रहान की आई नयी फिल्म का गान बज रहा था। सब नाच रहे थे। और मैं जयपुर की सड़कों और दिल्ली की सड़कों में कोई अंतर खोजता खिड़की के बाहर देखने की कोशिश कर रहा था। पर देख नहीं पाया। हवा तेज़ थी। आँख में लग रही थी। के तभी तुम जो के बड़ी देर से पास ही खड़ी थी। बोली। थोड़ा बैठ जाऊं। मैं खिसक गया। तुम बैठ गयी।

पता नहीं मेरे हिस्से कितने ही ऐसे छोटे छोटे पल समेटे रखे हैं। डायरी के पन्नो में। उन जगहों पर। किसी मोड़ पर। किसी सीट पर। किसी पेड़। किसी पत्थर के पास। कई कई जगह तो उन दिनों के बाद मन भी नहीं करता। के जाऊं। वहाँ जब तुम नहीं मिलोगी तब क्या करूँगा। यही सोच बचता हूँ। ऐसे ही उस दिन के बाद कई-कई बार रिक्शे पर बैठने से मना करने लगा। और बैठता तो दिल्ली में तो बिलकुल नहीं। किसी लड़की के साथ तो और नहीं। वैसे अगर आज तुम न मिलती। न ऑटो वालों की हड़ताल होती। तब न तुम किसी दूसरे का इंतज़ार करती। न मैं वहाँ टपकता। और जाता भी तो अकेले ही। पैदल। कॉलेज तक।

सच कहूँ उस दिन किसी बॉलीवुड की फिल्म के हीरो की तरह मैंने तुम्हे बोल तो दिया पर उसके बाद कभी हिम्मत जुटा ही नहीं पाया। यह बिलकुल वैसा ही था जैसे किसी चोर की चोरी सबके सामने आजाये। जैसे काले सफ़ेद या किसी भी रंग की बिल्ली रास्ता काट जाये। जैसे साँप सूंघ जाए। बिलकुल सूंघ ही गया। चुप लगा गया। कुछ बोल ही नहीं पाया। कुछ भी। कभी भी। कमज़ोर से डरे हुए। सहमे घुन्ना साइड हीरो की तरह। लव स्टोरी में भांजी मारते शरीफ से दिखते विनोद मेहरा की माफ़िक। जिसकी सारी ऊर्जा जैसे ख़त्म हो गयी हो। प्रेम ऐसे कमज़ोर लोगों के हिस्से नहीं आता।

मेरे हिस्से से भी कूच कर गया। आज भी वह क्षण कभी-कभी कौंध जाता है जब तुमने बिन बोले अपनी पलकों को उठाकर पूछा था। कैसे हो? और मैंने गर्दन हिलाकर कहा था। ठीक हूँ। इसे अब कुछ समझ भी लूँ। पर। अब देर जैसा कुछ हो गया है। जिसमे पीछे लौटकर जाना मुमकिन नहीं है। न उन दिनों को फिर से दुरुस्त किया जा सकता है। तुमने भी सोचा होगा कैसा फट्टू लड़का था दिन भी कौन सा चुना? और अगर दिल से ही बोल था तो फिर बोलती क्यों बंद हो गयी?

तो मेरी 'तुम' से इतना ही कहना चाहता हूँ के मैंने जितना तुमसे प्रेम नहीं किया उससे ज़यादा उसपर सिर्फ विचार किया। फिर तब तो एक ही चीज़ होगी। जो हुई भी। हम दोनों कभी नहीं मिले। इधर यह सब लिखने की बजाये तुम्हे बता देता तब क्या होता। क्या हम साथ होते। या ऐसे ही मैं यहाँ कीबोर्ड पर किटिर पिटिर कर रहा होता। मालुम नहीं। शायद मुझ जैसे चुप्पे को याद रखने की कोई ज़रूरत होती भी नहीं। धीरे धीरे दिन पीले पन्नो की तरह पुराने होते जायेंगे और छवि धुंधली। जितनी जल्दी यह होगा उतनी ही जल्दी कोई नयी याद वहां अपनी जगह पर दुरुस्त होकर दिल के पास रहेगी। धुंधला होना खोते जाना है। और मैं खो जाना चाहता हूँ। उन सभी जगहों से जो मेरी सही जगह अब नहीं रहीं। शायद तुम्हारा दिल भी ऐसी जगह है।

पर आज यह सब इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि पीछे किसी सुबह उठा तो तुम सपने में थी। उठकर याद भी कर लिया था। के लिख लूँगा। पर भूल गया। जितना याद रह गया उसमे सिर्फ हम दोनों थे। बातें कुछ कम थी। एक दूसरे को देख ज़यादा रहे थे। जैसे फिर कभी न मिलने के लिए अपनी अपनी खोहों में लौट जाने से पहले की कोई तय्यारी। कैसे कैसे होते जा रहे थे कुछ समझ नहीं पा रहा था। यहाँ हम असहज नहीं थे। बिलकुल नहीं। बस पिछले कई मिनिटों से बोल नहीं रहे थे। के अचानक तुमने कहा 'तुमने ऐसा किया ही क्या के मैं तुम पर विश्वास करूँ। सिर्फ बोल भर देना ही प्यार नहीं..। यहाँ यह बात बेमानी हो गयी के हम दोनों एक दूसरे को जानते ही कितना हैं। शायद कुछ-कुछ जान भी गए हों। पर अब आगे नहीं। तब मैं बोला 'जितना भी मैं तुम्हें याद हूँ उसे अपने मन की किताब से मिटा देना..' जैसा मैं नहीं हूँ वैसा क्यों कह गया समझ नहीं पाया..और वहीँ सपना टूट जाता है..

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