अप्रैल 15, 2013

बस जो जाती है चारबाग़

पता नहीं कितने साल पहले की बात है जब हम सब पूरा परिवार दरगाह मेला घूमने बहराइच गए थे और घूम घूम कर थक लेने के बाद दरगाह में अस्थायी पुलिस चौकी के बगल से पीछे की इमारत को दिखाते हुए पापा ने कहा था यह बहराइच की भूलभुलल्या है बिलकुल ऐसी ही एक लखनऊ में भी है। साल बीतते गए पर हर साल की तरह रोडवेज़ से कानपुर वाली बस में बैठते। लखनऊ वाली में नहीं। कानपुर वाली बस की खासियत यह होती की यह आलमबाग़ या क़ैसरबाग़ जाती भी तो भी चारबाग़ रेलवे स्टेशन से होते हुए। इसलिए भी सहूलियत होती। कि अगर बस थोड़ा लेट फेट भी हो जाए तब भी स्टेशन के सामने ही उतरें। जिससे कि भागकर लखनऊ मेल पकड़ी जा सके।

खैर वैसी नौबत कभी आई नहीं। हम हमेशा वक़्त से पहले पहुँचते रहे। वहीं प्लेटफॉर्म पर ही चादर बिछा कर खाना खाते गाड़ी के लागने का इंतज़ार करते। इस इंतज़ार की दरमियानी में कभी किताबों की दुकान तक चले गए या और कुछ खाने के लिए कुछ खरीद लाये। प्लेटफॉर्म हमेशा प्लेटफॉर्म ही बने रहे। वहाँ की आपाधापी कभी कम नहीं होती। उसका अपना ही चरित्र होता। वहाँ मौजूद लोगों में कई ऐसे भी होते जो अपनी पत्नियों बच्चों को लेकर पहली बार परदेस को निकल रहे होते। उनके चेहरों पर अजीब सा भय भी उतना ही तैर रहा होता जितना विस्मय और रोमांच। इनलोगों की पहचान इनके सामान से हो जाती। या फिर पैरों से। उनमे पहनी चप्पलों से। और इनसे कई गुना बड़ी संख्या में वे लोग थे जिनहे उनके कपड़ों से चीन्हा जा सकता था। उन लोगों के लिए लखनऊ मेल वहाँ के नवाबी ठाठ बाट की तरह ही एक और स्टेटस सिंबल थी। है।

मुझे हर बार दिल्ली आने में जो सबसे अच्छी बात जो लगती वो ये के हम पांच सात घंटे बस से होते हुए लखनऊ पहुँचते। बस का सफर कभी डराता नहीं था। छुटपन से ही। हम उस बस में चढ़ते ही नहीं जिसमे भीड़ होती या मन मर्ज़ी की सीट नहीं मिलती। ऐसी सीट होती कौन सी। जो खिड़की के बिलकुल बगल हो। इसके लिए एक डेढ़ बस छोड़ी जा सकती थी। सफर रहता इसलिए भी पानी की बोतल खरीद लेते या फिर खाली बोतल भर ली जाती। पर पानी का स्वाद उसके गरम होने के साथ ही उसे गले से नीचे उतरने की सारी योग्यताएं जाती रहती।

मरी माता मंदिर का बड़ा सा गेट पहले था या इधर नयी शताब्दी में बना कुछ कह नहीं सकते पर जवाहर नवोदय विद्यालय शुरू से दिखाई देता रहा। बुद्धा रिज़ॉर्ट भी एक नयी चीज़ ही था। फिर फखरपुर क़ैसरगंज कुंडासर(कुडासर) तक तो बस रोते पीटते चलती। बीच में बहराइच पार करते रोक लेते कि जब तक सब सवारियों कि टिकट कट नहीं जाती तब तक बस चलेगी ही नहीं। पर एक साल ऐसा हुआ जब हम पवन हंस बससेवा में बैठे। नॉन स्टॉप। इसका भी अपना वर्ग चरित्र है जिसकी नज़र में यह छोटे मोटे हॉल्टकिसी ज़रूरत के नहीं थे। कंडक्टर शुरू से ही चिल्लाता रहता कोई भी सवारी रामपुर से पहले उतरने वाली न बइठे। उसे उतारा नहीं जाएगा। यह शायद तब की बात है जब लखनऊ रोड पर डामर की चोरी के बाद भी चिक्कन सड़क बनी थी। उसे वकार अहमद ने गड्ढामुक्त सड़क कह कर प्रचारित भी किया होगा। वाकई सड़क शानदार थी। सरपट भागती हुई। तब से लखनऊ पहुँचने में घंटा पउन घंटा कम लागने लगा। और इसी वक़्त फैज़ाबाद वाला लखनऊ हाइवे भी दुरुस्त हो रहा था।

कई सालों तक तो हम जब जरवल रोड पहुँच जाते तब पता चलता के जरवल क़स्बा कई किलोमीटर पीछे छूट गया। उस क्रॉसिंग के बाद उधर गोंडा वाली बसें भी मिलने लग जाती। इसी फाटक पर फ़रेन्द वाले बस यात्रियों को खीरे खाने नहीं देना चाहते और समानुपात में खीरे वाले पानी वाले पाउच से बाज़ी लगाते दिख जाते। पानी के पाउच वालों की भीड़ वाली बात वैसे काफी बाद की है। इनकी जगह भुट्टे वाले आसानी से दिख जाया करते थे। पहली बार पानी के पाउच एक-एक रुपये में दो हज़ार आठ वाले दरगाह मेले में मिलना शुरू हुए थे। आम इतनी गर्मियों में कम ही लोग खरीदते। बस में उसे खाये जाने से जायदा मुँह ललचाने वाली बात होती है। वही समान लो जो कम लोगों को दिखे ख़त्म हो जाए। पता भी न चले।

पर हम लोग इंतज़ार करते थे घाघरा नदी का। हम बस वाले पल को नहीं रेल वाले पुल को देखते और देखते उसके खंबे कितने डूबे हुए है। कोई रेल उस पर से गुज़रते हुए दिख जाये तो कहना ही क्या। पहले मम्मी से सिक्के लेकर नदी में फेंकते भी थे। शायद घर वालों के हिस्से की कोई बाकी दुआ रहती होगी। उसी के लिए। पुल पार करते गनेसपुर की तरफ जो ढाबे भोजनालय थे। यात्री सुविधा केंद्र थे पिछले साल सब पर धूल जमी दिखी। कोई भी चालू स्थिति में नहीं था। वो बंद रिलायंस के पेट्रोल पंप के बाद रोडवेज़ वाले ने वहीं रोका था। सब बस वाले वहीं गाड़ी लगा रहे थे।

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