अप्रैल 16, 2013

हमारे भाटिया सर

{कल ट्रंक के पास जो गोल मेज़ है उसकी सफ़ाई के दौरान दसवीं पास कर चुके लड़के की डायरी हाथ लगी। दस बारह साल पुरानी तारीखों वाली। उसी में से किसी पन्ने पर दिख पड़े भाटिया सर। वहाँ कोई तारीख नहीं पड़ी है। बॉल पॉइंट पेन से लिखा हुआ है। अंदाज़ से लगा के बोर्ड के इम्तिहान के बाद उन दो ढाई महीनो में यह सब लिखा होगा। वाक्य संरचना वही है। बस सहूलियत के लिए पूर्ण विराम लगा दिये हैं। जो वहाँ नहीं थे। }

भाटिया सर का 2002 आखिरी साल था। परंतु लगता नहीं था कि वो इसी साल जा रहे हैं क्योंकि उनका पढ़ाने का ढंग ही कुछ ऐसा था। वो हमे इंग्लिश पढ़ाते थे। मैं तो कंपार्ट्मेंट से दसवीं में आया था परंतु पहले मैं मैथ्स के पीरियड में नाइन्थ में और बाकी पीरियड टेंथ में पढ़ता था। उन्होने फुटप्रिंट विदाउट फीट बहुत ही अच्छे ढंग से पढ़ाया। उनके एक्स्प्रेश्नस बहुत ही सजीव व कहानी के अनुरूप लगते हैं।

उनका बोलने का स्टाइल ही अजीब था जैसे उनका सर्वलोकप्रिय शब्द हरामखोर या हरामखोरी था। गाली जैसा था पर लगता नहीं था। बोलते अरे हरामजादे पढ़ता क्यों नहीं? माँ बाप की परेड करवाऊँगा तब पता चलेगा। जब बेटा फेल हो जाता है तब कहते हैं रिज़ल्ट नहीं आया। आगे पढ़ो। उसको मार डाला। तूफान आता है आने दो हवा आती है आने दो, सब आओ, मोस्ट वैल्कम। वो देखो अभी से मरा पड़ा है, इसे तो मेरे जैसे हो जाने पर चार आदमियों की ज़रूरत पड़ेगी। धमाका कर दिया उनकी कहानी थी। की हमने प्रकटिकल में नीचे जाली नहीं लगाई जिससे धमाका हो गया। ये देखो टॉयलेट का पेपर भी इसे पास नहीं करवा सका। पहले पेज पर ही काटा हरामखोर है न इम्प्रैशन खराब कर दिया।

जब सर पढ़ते थे तब उन्हे पहाड़ गंज थाने से शादीपुर तक के एस्से लिखने में दो महीने लग गए। कभी चोरी करवा दी, कभी हवा निकलवा दी, कभी चेकिंग, कभी पुलिस, कभी झगड़ा, कभी कुछ तो कभी कुछ। सर की एक पूरी किताब भर गयी। रोज़ एक घंटा लिखते। पर उन्होने हमे ऐसा लिखने से मना किया था क्योंकि टाइम कम था बोर्ड क्लास थी न। उनका ये किस्सा साल भर चलता रहा की एक आदमी का घोड़ा था जो हाँ हाँ करने पर चलता था। तो एक बार काँटों के बीच लगे शहतूत के पेड़ से घोड़े पर खड़ा होकर शहतूत खाने लगा उसे खूब आनंद आया तो उसके मुँह से निकल गया हा हा तो घोड़ा चल पड़ा और वो काँटों में गिर पड़ा।

सर ने हमे जो आर्ट बताया कि एस्से, लेटर, पैराग्राफ़ कैसे लिखते हैं वो गज़ब का था। कभी आज तक किसी ने नहीं बताया था। सर ने बच्चों के खेल की तरह हमे सिखाया। लेटर का फ़ारमैट चार नंबर का था पर वो कहते थे की यही मत लिख देना। नंबर नहीं दूंगा। वो कहते जितनी प्रैक्टिस करोगे उतना अच्छा होगा। उन्होने बहुत ही अच्छे ढंग से हमे पाठ पढ़ाये। जैसे लूसी ग्रे, लिटल ब्रदर, आ लेटर टू गॉड, टैगर ट्रबल, द पेरफेक्ट लाइफ, द बेट, द एंड ऑफ द रोप, चेरी ट्री। वो पूरी ज़िंदगी याद रहेंगे कि कभी इंग्लिश हमने भाटिया सर से पढ़ी थी। वो मज़ाक मज़ाक में सब समझा देते थे। नालायक से नालायक बच्चों को उनकी बात समझ आ जाती थी। उनकी कुछ बातें तो कभी नहीं भूलेगी। वो चश्मा, वो हरामखोर कहना, अभी तो हँस रहे हैं बाद में रोएँगे। मैं उन्हे शत शत नमन करता हूँ था भगवान से प्रार्थना करता हूँ की उनके जैसे अनेक टीचर दे जिससे बच्चों का भविष्य न सके।

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