अप्रैल 20, 2013

नमक इश्क़ का

अपूर्वानंद रंगभूमि में शायद प्रेम पर ही कुछ कह रहे थे। सुचिता को स्पर्श से जोड़ बोले सोफ़िया और विनय दोनों एकांत में मिलना टालते हैं और एक दूसरे को छूते भी नहीं हैं। फिर उसके कई सालों बाद राकेश मिला। उसने कहा प्रेम छूने और न छूने के बीच का द्वंद्व है। खुद मैंने कितनों को छुआ या नहीं छुआ या कितना किससे कितनी बार प्यार किया इस पर पहुँचने से पहले कई और बातें हैं जो ज़रूरी हैं। इधर जितनी भी दो चार कहानियाँ पढ़ी, अढ़ाई-पौन उपन्यासों से गुज़रा, फ़िल्में देखी उन सबमे साला प्यार- माफ कीजिएगा 'प्यार' मेरी प्रेमिका का भाई नहीं है फिर भी उसे यही कहने का मन किया- हमेशा कोने में दुबका खड़ा रहा। छुपा छुपा।

वह शुरू होता है स्कूल में। ट्यूशन क्लास में। लड़की को देख भर लेने की चाहत के साथ। आकर्षण है। उसके पास थोड़ी देर अकेले में मिल छू लेना है। कुछ तो अपने मन की कह लेने का मन है। कि क्या सब सोच रहा हूँ तुम्हारे बारे में। तुम्हारी किताब के बीच में क्या रखने को जी कर रहा था। तुम्हें देखते ही कैसा कैसा होता रहता हूँ। 'जानकीपुल ' का किशोरवय लड़का आगे पढ़ने की गरज से कस्बेनुमा शहर से निकाल पड़ता है। पीछे रह जाती है किताबों के पन्नों पर छूटी कहानी। वो लड़की वैसे ही फ़र्स्ट आती रही। उसकी ख़बरें भी लगातार मिलती रहीं। जो पुल तब तक नहीं बना था अब बन गया है। और जो मन की जानकी थी उस तक जाता पुल अब इतने साल बीतने जाने के बाद भी दिल की किसी धड़कन के साथ वहाँ चहलकदमी करने लगता है। 'शाला ' फ़िल्म है इसलिए भी कुछ कुछ इसकी तरह होते हुए भी अलग है। यहाँ लड़का साथ पढ़ती लड़की को एक सुबह रोककर लड़का अपने दिल की बात कह देता है। वह अपने पिता को कह देती है। और लड़का अपने बाप से खूब पीटा जाता है। वह प्रेम नहीं कर रहा था लड़की को राह चलते छेड़ रहा था। प्रेम मारा जाता है। कि कहीं अम्मा को न दिख जाए। बाप को पता चल जाएगा तो पता नही..

प्यार कुछ कुछ हमारे हिस्से ऐसा ही है जैसे शहर में अचानक दंगे भड़क जाएँ और नायक बदहवास सा यह जुगत भिड़ाने में लगा रहे के किसी भी हालत में बुद्धा गार्डन कैसे पहुँचे। जहाँ उसकी प्रेमिका कुछ ही देर में पहुँच रही होगी। खतरा तब और बढ़ जाता है जब दोनों विधर्मी हों। 'अँधेरा ' कहानी ऐसी ही है। ज्ञानरंजन इस इंतज़ार वाली बात को छिपा ले जाता है और साइबर कैफ़े मालिक से इसी क्षण घर पहुँचने और पिता की बीमारी की आपातकालीन अपरिहार्यता को स्पष्ट करता है। हम हमेशा से ऐसे ही प्यार करते आए हैं। मो॰ आरिफ़ की 'चोर सिपाही ' तद्भव में काफी पहले पढ़ी थी। एक डायरी ऐसे ही दंगों की छाया में लिखी जा रही है। उसमे जिससे मन लग गया है उसके सकुशल घर पहुँचने की दुआएँ माँगी जा रही हैं। ऐसा नहीं है के एक ही धर्म के होने से प्यार में कोई बाधा नहीं आती। धर्म इतनी सरल संरचना तो नहीं है। उसमे जातियों के उपवर्ग है। अभी कथादेश के मार्च अंक में हुस्न तबस्सुम की कहानी 'तय्यब अली प्यार का दुश्मन ' पढ़ रहा था। लड़का लड़की दोनों मुसलमान हैं पर जिंदगी भर साथ नहीं रह रह सकते। सद्द्न कसाई का लड़का अबरार सेंडो बानियान में भागते भागते ही नसीम खाँ की बेटी नूरा से छुपकर मिलता। वह एक जगह कहता भी है दादी अम्मा, ये जातें मजहब से ज़यादह खराब होती हैं। यहाँ सारा मामला कसाई के खान न होने और खान के कसाई न होने का है।

पर इस प्यार की दिक्कतें और भी है। शायद पंकज मित्र की कहानी है। 'पप्पू कांट लव साला '। पता नहीं कहाँ पढ़ी थी। जिन जिन संभावित पत्रिकाओं में लगा उन्हे खंगाल लिया पर मिली नहीं। खैर। लड़का जो है उसका उड़ीसा (तब भी उड़ीसा ही था, ओड़ीशा नहीं हुआ था) के किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला होना है। पैसे की तंगी है। पिता का गैराज इतना उठा नहीं सकता। यहाँ दोनों प्रेमियों के पास मोबाइल है। सम्प्रेषण की कोई समस्या नहीं। नंबर भी ठीक ठाक जुगाड़ से मिल गया लगता है। दोनों के बीच बातचीत मैसेज मैसेज से हो रही है। यह सीधे बात न होना ही इसका ट्विस्ट है। प्रेम आपको संकटकालीन अवस्थाओं में संबल देता है। वह नायिका भी दे रही है। पर वहाँ प्रेम तभी तक रहता है जब तक वह पर्दे के पीछे है। जैसे ही पता चलता है फोन बंबई से नहीं आ रहे थे और जिस लड़की को वह भाव नहीं देता था वही उसी के मोहल्ले की लड़की है तब उसका पारा चढ़ जाता है। कहानी खत्म। मतलब जिससे हम प्यार करना चाहते है उसका भी उधर से वैसा ही रिसपॉन्स न मिले तब दिक्कत है।

पर मन में यह सवाल बना रहता है के इस प्यार की परिणिती कहाँ होगी। मतलब किस मुकाम तक यह पहुंचेगा। यह प्रयोजनवादी हो जाना है के किस ध्येय को लेकर आप प्रेम करने चले थे या इस रूप में ही यह आकार लेता है। मतलब यह दोनों को कहाँ तक लेकर जाएगा। अगर मान लें शादी उनमे से एक अनंतिम लक्ष्य है तब 'दुष्यंत की कहानी  ' में नायिका शादी से इंकार क्यों कर देती है। उसका तर्क था के वह अपनी गर्भावस्था को वैध बनाने की गरज से उसे शादी नहीं करनी। यह कॉल सेंटर में काम करने वाली पीढ़ी की एक लड़की कहती है। उसकी नयी तरह की नैतिकता किसी अपराधबोध को ढोने के मूड में नहीं दिखती। जैसे शादी के टैग बिना दैहिक संबंध उसके लिए कोई मैने नहीं रखते वैसे ही गर्भपात उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। फिर उसी उधेड़बुन पर वापस लौटे तब यह भी दिखता है के ज़रूरी नहीं के दोनों साथ रह भी पाएँ। कुणाल की 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे  ' ऐसी ही कहानी है जहां लड़की तो शाहरुख़ की फिल्मों के साथ बड़ी हो रही है और उसके पिता उन नवउदारवादी सालों के बाद एनसीआर हुए गुड़गाँव और कंपनियों के उग आने के बावजूद खुद को नहीं बदल पाये। यह मानसिकता के साथ आधुनिकता का संकट भी है जिसके चिह्न सिर्फ गाड़ी बंगले बड़ी-बड़ी कोठियों में ही दिखाई दिये। उसके आगे नहीं जा सके। पर निहारिका राहुल के साथ लिवइन में भोगल आश्रम के वन बेडरुम अपार्टमेंट में शिफ्ट हो जाती है। जिसके बाद सिर्फ उसकी हत्या ही हो सकती है। और आखिर में होती भी है।

वैसे जो साथ रह भी रहे हैं और फ़ेविकॉल के मजबूत जोड़ की तरह चिपके भी हैं उनके बीच 'दांपत्य ' (मो॰ आरिफ़) जीवन की अपनी जटिलताएँ जो कि पितृसत्ता के ढाँचे के चलते है, लगातार स्पेस को खत्म करती जाती हैं और तब आती है संवादहीनता। फुर्सत के दो क्षण भी नहीं मिलते। मिलते भी हैं तो आकस्मिक किसी की मृत्यु हो जाने के बाद। पति का घर पर ही रह जाना किसी भी तरह उमंग से नही भरता। उल्टे पत्नी के रोज़ाना को बाधित ही करता दिखता है। जब पति उसे छत पर कुछ देर साथ बिताने को बुलाता है तब वहाँ बचती है सिर्फ़ झुंझलाहट। खीज। अनमनापन। वहाँ पत्नियों को 'मंजू फालतू ' होते जाना है। या उसे प्रौढ़ावस्था में अपने पति को यह समझाना है के प्रेमिकाएं और प्रेम रसोईघर में जाते ही उड़ जाते हैं। वह प्रेम का हत्यारा है। भले प्रेमिका सुगंधा जैसी हो पर बूढ़े होते पति के देवदास हो जाने को भी पहचानती है। नन्दिता को पता है ऐसे पति के साथ क्या करना है।

हमारे समाज में ज़िंदगियाँ 'जब वी मेट ' की तरह हैप्पी एंडिंग नहीं होती वहाँ सच कहें तो प्यार है ही नहीं वहाँ प्यार के दुश्मन ही हैं। तभी तो बार बार 'पीली छतरी वाली लड़की ' पढ़ पढ़कर बार बार उसे सच मानने की कोशिश करता हूँ। पर काश ऐसा हो पाता। शायद यह कृति से कुछ जायदा की मांग करना है। पर फिर दिख जाती है भागती रेलगाड़ी उसमें बैठे दोनों। अंधेरी सुरंग की तरफ जाती। कहाँ जा रहे हैं। पता नहीं। शायद पता है। उसे याद नहीं करना चाहता। पर याद आ जाता है जिस समाज में रह रहा हूँ वह मूलतः यथास्थितिवादी ही है और यही सब समाजों की गति उनका डायनेमिक्स एक सा लगता है। इसलिए आगे जाकर जहां की कहानी हमारे पास नहीं है वहाँ की स्थितियों के अनुमान अंदाज़े लगाए जा सकते हैं। शायद यह दिक्कत मेरी भी है जितना जब प्यार करना था, मैं इन्ही किन्ही नुक्तों पर रुक सोच रहा था। प्यार कर रहा होता तो आज जिंदा नहीं होता..यही सोच रुक जाता हूँ हर बार..डरे हुए दीवाने की तरह..

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