अप्रैल 24, 2013

सपनों की डाड़ के सहारे कुछ देर सुस्ताते मील के पत्थर

तो हमारी बस ऐसे ही किसी दिन सड़क किनारे खड़ी है। शायद पेट्रोल ख़त्म हो गया है। गर्मियों के मौसम में इस बार फ़रेन्द खूब आए हैं। इस दरमियान जबतक किसी गाड़ी को रोककर उसपर सवार होकर कंडक्टर खाली पीपा भर कर लाये तब तक क्या किया जाए। यही सोच अधिकतर पुरुष यात्री बस से नीचे उतर गए। लगे उठा उठाकर अद्धा मारने। कुछ समझदार किस्म के दिमाग वाले लोग भी थे जो बस की छत पर चढ़ गए और डाड़ हिलाने लगे। पता नहीं जब भी यह चित्र मेरे सामने आता है तब उसमे न जाने कहाँ से बादल भी आ जाते हैं। बरसते नहीं हैं। बस ढलते सूरज को ढक लेते हैं। हवा बहने लगती है। कुछ ठंडी ठंडी सी।

उन दिनों हम भी बहुत छोटे हुआ करते थे। पर मौका लगे डरते डरते नीचे उतर लिए हैं। सड़क का डर अभी भी है। के कहीं से भी गाड़ी आ जा रही हैं। इसलिए पार नहीं करते हैं। जिस तरफ़ बस खड़ी है उसी तरफ खड़े नज़रों से एक दो बच गए फ़रेन्द उठा लेते हैं। खाते हैं या नहीं देख नहीं पाते। आज जब भी इस तरह किसी जगह को सोचता हूँ या बेमौके खयाल आ जाते हैं। तब यह बस मुझे खाली सड़क के किनारे थोड़ा नीचे उतर के दूर पीछे से खड़ी दिखाई देती है। और शायद तभी से दिल में बैठ गया है के कभी मौका मिला तो ऐसी ही कहीं सुनसान सड़क किनारे अपनी गाड़ी खड़ी कर देंगे। आराम से फुर्सत के कुछ पल समेटते वहाँ थर्मस में भरी चाय की चुसकियाँ होंगी। कुछ दिल के करीब साझेदारियों वाले लोग होंगे। कहीं पहुँचने की जल्दबाज़ी नहीं। खूब इतमीनान के साथ।

सड़कें हमेशा ऐसे ही खींचती रही हैं। कहीं कोई तस्वीर देखी नहीं के जगह का पता लगाने लगता। चार पाँच मर्तबा ऐसा हुआ भी है पर उसमे मेरी भूमिका नगण्य सी ही रही है। इस फ़रेन्द वाली याद के आस पास वाले दिन होंगे। हमारी बस अहमदाबाद पहुँच चुकी थी या कोठपुतली के आस पास से गुज़र रही थी। हम सबसे पीछे वाली सीट पर थे। बस टू बाय थ्री थी। खिड़की साफ़ इतनी नहीं भी थी पर पीछे भी शायद कोई बस थी। और हम हाथ हिला हिला कर उन्हे सड़कीय अभिवादन कर रहे हैं। खूब चिल्ला भी रहे हैं। तभी हमारी तरफ से कोई बुज़ुर्ग कहते हैं ऐसे नहीं चिल्लाते। घुड़की खा कर हम सब चुप्प। अब सिर्फ देख रहे हैं। घुटने के बल। मुँह अभी भी पीछे की तरफ़ है। सड़क कैसे भाग रही थी। मुड़ रही थी।

उसी याद में संगमरमर के पहाड़ों के बीच इतनी तेज़ी से ड्राइवर बस मोड़ता कि सवारियों के दिल बैठे से जाते। पर हम मज़े में थे। रात को ड्राइवर बादल जाता तब लोग सुकून से सोते। वे पुलिस में हवालदारी से रिटायर हुए थे या ड्राइवर ही थे वहाँ। इतमीनान से गाड़ी भागती। सड़क से चिपके चिपके। वे उसे उड़ाने के पक्ष में थे ही नहीं। फिर अलवर वाले दिन हैं। जहां अरावली हमारे साथ साथ चलती। बड़ी दूर दूर तक। हमारे स्कूल की मेटाडोर छोटी थी पर उसमे होते सब जान पहचान वाले। कन्या गुरुकुल दाधिया। कई साल लगातार ऐसे इतवार अक्तूबर नवंबर में आते रहे। बेनागा। दिन ठंडे इतने नहीं होते थे। फिर भी सुबह पाँच छह बजे के हिसाब से स्वेटर पहन लेते थे।

ऐसे ही एक सड़क है। उसे सुनसान कहना ठीक नहीं होगा। फिर भी बहुत खाली है। हमारे सिवाय वहाँ कोई नहीं है। हम भी कम नहीं पूरे तीस के आसपास थे। मनाली रात रुककर अगली सुबह मढ़ी होते हुए रोहतांग पास पहुँचे। पर वो जो सड़क किनारे बस खड़ी करने वाली छवि थी वह यहाँ की नहीं नीचे उतर कर कोक्सर की हैं। जहां से रोहतांग की बर्फबारी से ठंडी हवाएँ नीचे आरही थी। और हम चन्द्र नदी के किनारे रुके हुए थे। बिलकुल जैसे सपनों में होता है। दूर दूर तक सिर्फ और सिर्फ हमारी बस खड़ी है। न कोई आ रहा है न जा रहा है। हम कभी नदी की तरफ हो रहे हैं, तो कभी पहाड़ को काटकर बनी जगह में ढाबे में मैगी खा रहे है और कई उस ठंड में पाउडर के दूध की चाय पी रहे हैं। बाहर सड़क का रंग बिलकुल काला है। धूप पड़ती है। पर उसे भूरा नहीं कर पायी है। दिल्ली की सड़कों से जायदा खुरदरी है। आवाजही कम है न।

आगे कुछ लिखने का मन नहीं हो रहा। कुछ देर वहीं रह जान चाहता हूँ। बिलकुल अकेले। उनमे जो मेरे आस पास हैं भी उनकी आवाज़ सुनाई नहीं दे रही है। बस वहाँ नहीं का बहना है। मैं हूँ। हवाएँ हैं। थोड़ी देर रुके रहना चाहता हूँ। भूरा बादल जू डरवावय, काला बादल पानी लावय। उन सारे सपनों उन सारी छवियों में सीधे एक बारगी कैसे चला जाऊँ। थोड़ा ठहर कर देख लेना चाहता हूँ। उन सबको। वे सब बिलकुल थम से गए हैं। जैसे फूलों का खिलना थोड़ी देर स्थगित हो गया हो। सूरज उग नहीं रहा है। मुझे देख रहा हो जैसे।

लिखना विखना तो चलता रहता है फिर कभी आऊँगा अभी जारहा हूँ छत पर..जो पीछे जाना चाहें ज़रूर जाएँ..

आवाज़ें..

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