अप्रैल 30, 2013

क ख भाषा संवाद वाया फ़ेसबुक

आगे की सुविधा के लिए लिख दूँ के 'क ' आलोक है और 'ख ' मैं। 'क' इन दिनों अपने घर हैं। अपन दिल्ली।  बात हो रही है फ़ेसबुक के ज़रिये। वहाँ की अपनी समस्याएँ हैं, फिर भी बातें होती हैं।  कुछ सूत्र हैं। आगे कभी काम आएंगे। इसलिए आज की आज इसे यहाँ पोस्ट किए दे रहा हूँ। क्या पता आपके भी कुछ काम आजाए..इसलिए थोड़ा ध्यान से..और बात अभी खत्म नहीं हुई है..

: कहाँ हो पंडित ?

: यहीं अभी तो दिल्ली ही हैं..जल्द कूच करेंगे।

: ये कूच करना भी हद शब्द है ! पहले सेना आदि के अभियान के लिए प्रयुक्त होता था और आज तुम्हारे जाने के लिए !

: अब क्या कीजे। भाखा है।

: नहीं नहीं ये हम हैं जो भाषा को बरतते हैं फिर कहते हैं कि ये बहता नीर है !

:  बरतने को ही तो कहा वह बह रही है।

: किस प्रकार ? विस्तार दो ! और छात्रवृत्ति और स्कॉलरशिप के अर्थ अलग अलग हैं क्या ?

:  अगर मैं या हम सब भी उन शब्दों को पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी जुबान बनाते हैं उसका उपयोग करते रहे हैं उन्हे बेदखल नहीं करते हैं, तब वे हमारे साथ है। हमें नव भारत टाइम्स नहीं होना।

: अर्थ में अंतर है नहीं ये बताओ..और भाषा के संबंध में मेरा कहना है कि उसकी काट छांट हम ही करते हैं और उसमें भी सत्ता की भूमिका मुख्य होती है !

: अर्थ तो भिन्न हैं ही छात्र किस संस्कृति का शब्द है किन संदर्भों में उपयोग होता रहा है। स्कॉलर कहाँ से किन संरचनाओं का मामला है..आगे तो आप विद्वान हैं..

सत्ता कैसी यह देखना होगा। और सिर्फ इतना ही नहीं। हम उन लोकों से किन तरहों से बरतते हैं। उससे जुड़े रहते हैं या नहीं। तकनीक, समय, परिस्थिति से हम कितने मौके उनके लिए निकाल बना पाते हैं। सब बातें उतनी ही ज़रूरी हैं। जहां तक मुझे लगता है..

: तुम्हें नहीं लगता सत्ता किसी भी तरह की हो उसका सत्ता होना ही पर्याप्त है ! दूसरे ये सब तो सत्ता से जुड़े ही हैं शायद ही बाहर के किसी तत्व की इतनी भूमिका है !

: यहाँ फिर यह देखो के हमारे यहाँ वाचिक परम्पराएँ किस रूप में पहले थीं। क्या उनका स्वरूप वही रह पाया है। या यह के जो छात्र छात्राएँ इधर दिल्ली के स्कूलों में आरटीआई के आने के बाद दाखिल हुए हैं उनके भाषिक कौशल कैसे हैं। उनमे पैनापैन है। मतलब शिक्षित होकर ही हम इन दिनों सत्ता में बने रह सकते हैं।

: आज के समय में भी यह भाषा को अपने ही तरीके निर्धारित कर रहा है ! आरटीई को भी सत्ता ने ही अपने तरह से सब कुछ निर्धारित करने के लिए लगाया !  अन्यथा इसका शैक्षिक महत्व तो जाहिर ही है ।

 : पर जो बात ऊपर शिक्षा के अधिकार के अलावे भी थी उसका नज़र अंदाज़ हो जाना क्या इस बात का सूचक नहीं है के हम हमारी वरीयता में उसका मूल्य और स्थान अब बात करने लायक भी नहीं रह गया है। इसे ध्यान से पढ़ने और जवाब देने की ज़रूरत है..

: मैं इसे शिक्षा को बेदखल करना नहीं मानता हूँ बल्कि शिक्षा पर से बोझ हटाना मानता हूँ ! हाँ लेकिन यह इतना मासूम हो ऐसा नहीं है । शिक्षा को यदि इस तरह से परे किया जाता कि इसके बदले कौशलों के विकास पर ध्यान हो और स्थानीय ज्ञान को समृद्ध किया जाए तो शिक्षा का हटना बुरा नहीं लगता । बल्कि इसे अपूर्ण तकनीकी ज्ञान और अस्थाई वैश्विक बाजार के माध्यम से बेदखल किया गया !

: साजिन्दे जो गली गली कूचे मोहल्ले आते जाते थे, नौटंकियाँ होती थी। लिल्ली घोड़ी से लेकर दैवीय चरित्र हो आते जाते लोगों से मांगना। लोबान जला कर दुकानों पर जाना उन फकीरों को क्या भाषा के साथ रखा जा सकता है..??

: बॉस इसे रखने में क्या परेशानी है ! बस हमारे आपके बरतने से बाहर होने से इसे बाहर मान लिया जाए ? और इसे बाहर कर के हम लेकर क्या आए हैं ये देखो न !

: इस बेदखल किए जाने में कहीं न कहीं समाज की भी मौन स्वीकृति उतनी ही है जितनी सत्ता की मुखर उपस्थिति। देखते ही देखते कौशलों को स्थापित कर दिया गया जो सिर्फ किसी फर्म के लिए ज़रूरी काम कर दिया करें। दिक्कत यहीं से शुरू होती है जो इधर दिल्ली विश्व विद्यालय तक जा पहुँची है..

आवाज़ें..

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