अप्रैल 23, 2013

पर्देदारियों वाली साझेदारियाँ मतलब जो बातें छिपाता रहा हूँ

कमरा था। मेज़ थी। मेज़ पर डायरी रक्खी थी। मैं नहीं था। यही था शनिवार। घर पर थोड़ा देर से पहुँचने वाला था। एक तरह से आकस्मिक तौर पर मुझे लौट आना पड़ा। मना क्यों नहीं किया समझ नहीं पाया। चलो कोई नयी, चलता है। कुछ साझेदारियाँ ऐसी भी सही। पर दिक्कत मुझे यहीं हैं। और इस बार जितना व्यक्तिगत तौर पर मुझे महसूस हुआ उसके पीछे जाने के लिए ‘पर्सनल’ हो जाना होगा। दिल विल भी दुख सकता है। कमज़ोर दिल वालों से अनुरोध है के आगे एक क़दम न बढ़ावे। पुलिहा कमज़ोर है।

तो कभी नहीं चाहा था के मेरी गैर-मौजूदगी में कोई मेरी उन बातों को जान जाएँ जो हिम्मत करके लिख दी हैं। उनका वहाँ ऐसे सुविधाजनक अवस्था में होना कई स्वतंत्रताओं का खुला निमंत्रण नहीं था के पीठ पीछे उन पन्नों से गुज़रा जाए। वह कोई बाग बगीचा या एमसीडी का म्यूनिसिपल पार्क का बैंच नहीं है जिसपर वक़्त गुजारने की गरज से बैठ गए। उनका वहाँ होना ‘पब्लिक स्फेयर’ में आ जाना नहीं है। वह सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए ही थी कम से कम जबतक ऐसा कुछ करने का मेरा मन न हो। वह मेरा ‘स्पेस’ है। इसका एक मतलब तो यह भी हुआ के जो बातें मैं तुम्हें या किसी को नहीं बता रहा हूँ उसमे लगातार तुम्हारी दिलचस्पी बनी रही है। वो तो अच्छा हुआ के पीछे की सारी डायरियाँ वहाँ से हटा ली हैं।

पता है बात यहाँ से क्यों शुरू की है क्योंकि पीछे भी ऐसा हुआ है। तुम्हारी हमेशा आकुलता व्याकुलता इसी बात को लेकर बनी रही है के इस लिखे हुए में तुम्हारी मौजूदगी कितनी है। कितनी बार कहाँ कैसे कब मैंने तुम्हारे बारे में लिखा। अगर तुम्हें कहे पर यक़ीन ही नहीं होता तभी तो तुम उसके पीछे जाने को आतुर रहते हो। के कई सारी बातों पर परदेदारी है। जो असल है वह बताया नहीं जा रहा है। छिपाया जा रहा है। मुझे पता है मैं कभी भी तुम्हारा राज़दार नहीं था। तुम तो नीम हकीम खतराय जान के संपर्क में ज़ायदा रहते हो। दाँत कटी रोटी बोटी का साथ है। मैं तो वैसे भी क्षेपक की तरह एक चिप्पक ठहरा।

और तुम। तुम कहते हो के मित्रता में परिसीमन हो जाना चाहिए फिर तो। तब मेरे दोस्त बेचारे अगर ऐसा न करके यदि तुम चलते हो तब तो गड़बड़ है। वैसे लगता नहीं है के तुम ऐसा नहीं करते। उस दिन तुम कह रहे थे के मैं तुम्हारी बातों को तो जानने के लिए बार बार कुरेदता हूँ पर जब अपनी बात आती है तो चुप मार लेता हूँ। ऐसा है क्या। मुझे नहीं लगता। हाँ यह ज़रूर है के उसकी टाइमिंग थोड़ी दुरुस्त न हो पर कहता सब हूँ। वैसे यह मैं तय नहीं करूंगा के किसे क्या बात बतानी है, किसे कब क्या नहीं बोलना है; तब तुम हठ कर रहे हो के मैं तो खुली किताब हो जाऊँ। जिसे जब चाहे कोई भी पढ़ ले। ऐसा शायद तुम चाहोगे। मैं नहीं।

पता नहीं मैं सही लिख रहा हूँ के गलत पर हम सब दोस्तियों में लगातार एक दूसरे को नापते तौलते रहते है। किससे कितना निकट होना है किसे क्या बात कहनी है किसे अभी नहीं कहना है। यह दूरी जितनी भौतिक है उससे कहीं ज़ायदह मानसिक। कम से कम मेरे लिए तो यही है। उस दिन जा तुमने कहा के मैं अपनी बातें छिपा रहा हूँ तो समझ नहीं पाया क्या छिपाया है। यही के उस दिन दिल्ली किसके साथ घूम रहा था। चलो एक रात पहले नहीं बताया ना सही। पर फोन पर तुम्हें मालूम तो चल गया था ना। फिर इतनी तरह से पूछने का मतलब क्या था। खैर। फिर तुम जो कह रहे थे के मैं अपनी तरफ़ से छिपाता हूँ, तो मित्र अगर हम लगातार इतना मिलते हैं। हर बात कम से कम तुम तो मुझे बता ही देते होगे। फिर जिस पर्चे को देकर तुम आरहे थे वह क्या तब भरा गया था जब हमारी मित्रता शैशवकाल में थी। फिर ऐसा कई मर्तबा हुआ के तुम लोग पर्चे देते रहे और उन नतीजों के इंतज़ार में पतराते रहे। यह तो बहुत ही छोटी सी बात है। मुझे फरक नहीं पड़ता के तुमने नहीं बताया। पर दोस्त यह कहना नहीं था के मेरी तरफ से बाड़ेबंदी कुछ मज़बूत की हुई है।

इतना ही नहीं तुम तो भविष्यदृष्टा बनकर आने वाले दिनों की कल्पना करने में भी तल्लीन हो गए। मैं कैसा होने जा रहा हूँ। कैसा नहीं रहूँगा। तुम सब बोले जा रहे थे। बेजान दारुवाला ने तुमसे ट्रेनिंग ली है उसी दिन पता चला। मैं स्वार्थी लीचड़ आत्मकेन्द्रित और पता नहीं क्या क्या हो जाने वाला हूँ। इसलिए मुझे लिखना भी छोड़ देना चाहिए। एक तरफ़ तो समाज को कंधे पर लिए डोलता हूँ ऊपर से खुद वैसा नही हूँ तो यह फाँक तुम्हारी कोमल आँखों में गड़ रही है। तुम्हारी तरह के दो-चार शुभचिंतक पहले मिले होते तब तो अपना बेड़ा पार कब का हो चुका होता। तुम आ गए हो तब भी नहीं कर पा रहा हूँ तो कुछ कमी मुझमे रही होगी।

वैसे यह मुझे तुम्हारे साथ रहकर ही पता लगा के मैं कम से कम इस गुण से सम्पन्न हूँ के मेरे सामने तुम्हारे जैसे अपनी सारी निजी बातों को -कथित तौर पर- आसानी से रख सकने में कोई झिझक नहीं करते। रखते। तुमने अपने सारे प्यार के कसमें वादे मुझे बता दिये हैं। अब कुछ भी बताने को नहीं है। अगर है भी तो वह मेरे हिस्से मेरे जिम्मे है। वहीं तुम गच्चा खा गए। गलत पात्र को सब बता दिया। अब वो तुमसे सब छिपा रहा है। ऐसा उसे लगे ना लगे तुम्हें ज़रूर लग रहा है। तो भईया किस मुगालते में जी रहे हैं। तुम्हें खुद पता है के तुमने कितना बताया और कितना कभी ना बताने के लिए रख छोड़ा। वो जो तुम्हारा मरीज़ है जिसे तुम बेनागा सलाह-पे-सलाह चेप मारते हो उसे जितना तुम्हारे बारे में पता है क्या उन सारे किस्से कहानियों को तुम मुझे कह गए हो। चलो हटाओ।

कभी कभी लगता है अभी भी हमारी साझेदारियाँ किशोरवय लड़कों की तर्ज़ पर राग आलाप रही हैं। उसमे किन्ही के पीछे छूट जाने की संभावनाएं भी लगातार बनी रहती हैं। और अगर ऐसा हुआ तो अपनी दोस्ती ‘रॉक ऑन’ बनाने से पहले तुम मुझे वहाँ नहीं पाओगे। इस सबके लिखे जाने के बाद जिसके खतरे सबसे अधिक जान पड़ते है। जहाँ हमें सबसे ज़ादा समझदार होकर रहना था वहीं हम लगातार बेवकूफी पे बेवकूफी करते चले जा रहे हैं। हम समझ नहीं रहे। अपने को जताने के न-मालून कम उम्र के नुस्खों पर अटके पड़ें हैं। बस यही लगता है मेरे हिस्से से यह दोस्ती अब कुछ कम ही रहेगी। आगे पता नहीं। और मेरी दिक्कत भी है जैसा सोचता हूँ बोलने से कई-कई साल पहले उसे लिख लेता हूँ। याददाश्त ठीक-ठाक काम न भी कर रही हो तब की यादगारी के लिए भी दिक्कत नहीं होती।

आवाज़ें..

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