अप्रैल 06, 2013

कुछ रीडिंग्स 'मुन्नी मोबाइल' की: उर्फ़ ये जो शहरों के किनारे रहना है

मुन्नी मोबाइल। शुरू कहीं से भी कर सकते हैं। शहर से। मुन्नी से। मोबाइल से।साहिबाबाद गाँव से। इलाहाबाद की लायब्रेरी से। वहां इंतज़ार करती आँखों से। लन्दन की किसी नामचीन गली में अवध के ग़दर में क़त्लेआम करने करवाने वाले अँगरेज़ नायक की प्रतिमा से। महँगी होती ज़मीन से। गुजर्र त्यागी समीकरणों से। संबंध विच्छेद के बाद उपजे खालीपन से। मोदी के गुजरात से। दो हज़ार दो के दंगों से। पत्रकारीय मूल्यों के अवमूल्यन से। खुद आनंद भारती से। एक अर्थ में यह शुरू इन सभी बिन्दुओं से एक साथ होता है। यह इकहरा न होना ही इस समय की पहचान है। यह एक साथ कई-कई छवियों को लेकर चलता है उन्हें लगातार बनता बिगाड़ता रहता है। यही इसे कॉस्मोपॉलीटिन रियलिटी बनाते हैं।

कहानी शुरू नहीं होती है के बिंदू यादव के हाथ मोबाइल आ जाता है। नाम के बदल जाने से या शास्त्रीय शब्दावली में उसके अपभ्रंश हो जाने से। मुन्नी कैसी गढ़ी जा रही है। खुद को कैसा बना रहा है। यह पहचान का मिट जाना भी है और उसका नए सिरे से गढ़ा जाना भी।

के 'बिन्दू' होकर वह पुराने अर्थों से चिपकी रहती। उसके 'बिन्दू' बने रहने की कहानी के फ़्लैशबैक कुछ कम हैं मुन्नी मोबाइल हो जाने के बाद की कहानी फ़्लैश फॉरवर्ड में। दिलचस्प यह देखना भी है के मुन्नी जहाँगीर पुरी, नन्द नगरी, खिचड़ीपुर, मुनीरका, खानपुर, त्रिलोक पुरी, से नहीं आ रही है। वह दिल्ली की परिधि उस एनसीआर के एक औद्योगिक बसावट से ताल्लुक रखती है जहाँ रेल की रफ़्तार धीमी होते ही बक्सर से लौटते वक़्त वह आसानी से कूद पड़ती है। उद्द्योगों को खदेड़ा भी इस दिल्ली ने ही है। वहाँ पटरी के किनारे गंधाते हगते देखना जिस विष्टि से आँखों को भर देता है वही हेयता उस वर्ग के प्रति हमारे रक्तबीजों में समायी हुयी हैं।

यह किसी प्रवासी कॉलोनी में रहना नहीं है। न स्वेछा से इस शहर में दाखिल हुई होगी। काम का लगातार इन जैसी संरचनाओं के इर्दगिर्द सिमट जाना एक संकट ही है। उस संकट से कई और संकट लगातार निकलते रहे हैं। ज़मीन के दाम कई गुना बढ़ गए हैं उसे बेच कर त्यागी गुजर्र खूब पैसे भी बना रहे हैं। जो अपने बेटों को उसमे हिस्सा नहीं दे रहे उन्हें दराती गंडासे से काट मार डाला गया है। नैशनल हाईवे के पास से गुज़रती मेढ़ पर मूतने का पैसा आज नहीं लग रहा है। कल भी नहीं लगेगा कह नहीं सकते। आबादी का बड़ा हिस्सा मुन्नी की तरह ही बाहर से आया है। उसके पास कोई कौशल नहीं। सिवाय इसके कि किसी काम को करने में वह झिझकती नहीं है। बस ख़ुद को झोंक देती है। सोचना बाद का काम है।

सवाल उठता है के हेमा मालिनी जया प्रदा के गालों वाली सड़कों के बिहार से पलायन करके वह अपने साथ लौंडा नाच तो लाये पर छठ पूजा का उदय बिहारी अस्मिता के साथ वज़ीराबाद के पुल और यमुना किनारे नहीं दिखता। फिर यह भी के जो विकास के दावे निज़ाम बदलने इधर आज हो रहे है तो क्या साहिबाबाद जैसे गाँव, वे जगहें क्या अब खाली हो गयी हैं..?? पर इसे दूसरी तरह भी देखा जाना चाहिए के ज़मीन खरीदने में कम पड़ रहे पैसे पूरे करने के लिए तो वह अपने गाँव जाती है। जो लडकियाँ वह सेक्स रैकेट के तहत सप्लाय करती है उनमे भी अच्छी खासी तादाद में बिहारी मूल की लडकियाँ थी। पर कहीं से भी राजनीतिक रूप से वह खुद को नहीं जोड़ती। इस राजनीति-रसूख-पहचान-पहुँच वाले हिस्से की भरपाई के लिए शायद आनंद भारती हमेशा वहां मौज़ूद रहते हैं। राजनीति के मॉडल में इसे पहचाना जाना बाकी था।  

अब जबकि ब्लू लाइन बसों का कहर दिल्ली की सड़कों से गायब है यह मौजू है के एक खिड़की से हमें यह दिख जाए के उन दिनों की मारकाट खून से रंगे पहियों के बीच प्यार जैसा भी कुछ उन बोनटों स्टेयरिंग के बीच भी हो जाता था। बोनट उसके आस पास की विशेष जगह लड़कियों के लिए हमेशा खाली रहती। बस के भरे होने से इस क्षेत्र का कोई लेना देना नहीं। यहीं है जस्सी-सतिंदर की प्रेम कहानी। 'जस्सी एक्सप्रेस' का दौड़ना उसका पटरी से उतर जाना। कि कैसे नॉएडा रूट के अधिकतर ड्राइवर कंडक्टरों ने अपनी बस में आने जाने वाली लड़कियों से शादी कर रखी है। कईयों ने दो दो तीन तीन। कर्नल पिता और भाई के विरोध के बावज़ूद बस ड्राइवर से वह शादी करती है। सतिंदर भी बस का ड्राइवर था। एक इतवार 'पंजाबी बाय नेचर' में दोनों शादी का फैसला करते हैं। शादी हो जाती है। जस्सी बस खरीदकर सतिंदर को देती है और सतिंदर उसकी जस्सी एक्सप्रेस को हड़प लेता है।

बिहारी होना गाली की तरह है पर मुन्नी उसे पेरीफरी से मुख्यधारा के बीच दख़ल की तरह दाखिल होती है। अपने बलबूते। नामराद बनती है। खटकने की हद तक। जहाँ सिर्फ हत्या हो सकती है। क्या बिन्दू यादव यहाँ स्त्री विमर्श के लिए कुछ नए दरीचे खोलती है उसमे से नए झोंके हवा वेंटिलेशन से निकलते हैं। या उसके मुन्नी मोबाइल हो जाने के बाद से इसे समझा जा सकता है। मतलब पावर डिस्कोर्स के रस्ते से। सवाल टेढ़ा है जहाँ उसे उसके पति के संदर्भ में देखें तो उसके हिस्से दारु पीना है या बक्सर रहते रंडियों का नाच देखना है या खुद लौंडा नाच करना। या मुन्नी को लगातार छह साल तक गर्भधारण करवाकर पुरुष कर्म से मुक्त हो जाना। उसके मुन्नी हो जाने में मुख्य भूमिका निभाई उसके हाथ आये मोबाइल ने। तकनीक यदि उसे ऐसा बना रही थी तो जिस स्त्री को देख दिवाली के इनाम में वह भी मोबाइल मांगती है वह दृश्य क्यों नहीं होती। या होती है पर हम उसे देखना नहीं चाहते। डॉक्टरनी शशि खोखरा अवैध गर्भपात करवाने का क्लीनिक चला रही थी। क्या हमें उसके मरने या उसकी हत्या के संकेत यहाँ दिखते हैं। नहीं।

वैसे इस उपन्यास में मौतें प्राकृतिक न होकर प्रायोजित ज़यादा रहीं। गाजियाबाद के पत्रकारपुरम आने से पहले गोधरा काण्ड की रिपोर्टिंग हो या लन्दन प्रवास के दौरान खुद मुन्नी के फोन से उसकी बेटी की नकली दवाई से हुई मौत की खबर हो या बाद में रेखा से उसकी मर्डर की खबर हो। सब जगह संदेह। संशय। लेकिन जो बात रह गयी वह यह के मुन्नी की हत्या क्यों होती है?

एक कारण स्वयं आनंद भारती भी हैं और इस विकास के साथ उग आई प्रकारांतर संस्थाएं। पत्रकार महोदय मुन्नी के प्रतिरोध-जिसे ज़िद भी पढ़ा जा सकता है- को शह देते हैं तभी मुन्नी कहीं भी टांग अड़ा देने में झिझकती नही है। उसने बड़े बड़े अधिकारियों को उनके घर पर हाथ जोड़े देखा था। उसे हमेशा लगता आनंद भारती उसे बचा लेंगे। उसकी मदद ज़रूर करेंगे। वे करते भी। पर कुछ तो मुन्नी में था जिसके बलबूते वह कई-कई घरों में कई-कई औरतों को लगवा चुकने के बाद। घर बना लेने के बाद। बच्चों को पढ़ाने की तरफ़ मुडती है। उन्हें अफ़सर बनता देखना चाहती। पर इन सबके साथ उसकी महत्त्वकांक्षा ही थी जो उसे पुरुषों का प्रतिस्पर्धी बना रही थी। बस खरीद उसे गाजियाबाद मोरी गेट के बीच चलवा लेने के बाद ही यह हुआ होगा। ऐसा इसलिए भी के उसकी बस में ही उन कॉल गर्ल्स से उसकी पहली मुलाक़ात होती है। हर्र लगे न फिटकरी रंग चोखा के खांचे में जो सोचने लगी थी। पर इस रास्ते पर आगे अंधी गली भी हो सकती है जहाँ से वापसी संभव नहीं।

फिर इस मुन्नी की कहानी के बीच कई चोर दरवाज़ों की आवाजाही भी खूब है। अगर आप कलकत्ता लन्दन इलाहबाद अहमदाबाद देखना चाहता है तो इसमें बहुत स्कोप है। कईयों को यह विषयान्तर लग सकता है। कुछ हद तक लगते भी हैं। पर कई सूत्र थे जिन्हें पकड़ने की ज़रूरत भी है। एमिरेट्स की फ्लाइट में माँसाहारी भोजन को शाकाहारी कह कर परोसना। सोहो के ओल्ड कॉम्पटन स्ट्रीट के 'गे क्लब' में आगे 'तीसरी ताली' की आहट। फ़िर लन्दन की किसी गली स्क्वायर पर ब्रिटिश जनरल हेनरी हैवलॉक का आदमकद स्टैचू आज भी लगा है। 1857 के स्वतंत्रता आन्दोलन को कुचलने वाले खलनायकों में से एक। आनंद भारती उस बुत पर थूककर औपनिवेशिक जुए को उतार फेंकने की थोथी कोशिश करते हैं जिसे लखनऊ के लोग आज भी ढो रहे हैं। इधर जलियावाला बाग़ आकर ब्रिटिश प्रधानमन्त्री यही कोशिश कर रहे हैं। उसके भी कई पाठ हैं। खैर।

ऐसा ही विषयान्तर पाठकों को डायरी-रिपोर्टिंग शैली में आनंद भारती का अहमदाबाद प्रवास भी लग सकता है। जहाँ नतमस्तक बिरादरी है तो दूसरी तरफ उनके जैसे जुझारू पत्रकार भी। एस-छह बोगी में आग के बाद की घटनाओं का घटाटोप भी है। शाहआलम कैम्प से लेकर मज़ारों को तोड़े जाने तक। इसकी रेंज 'हाथ में बीड़ी पान, नहीं बनेगा पाकिस्तान' से लेकर साबरमती के आरपार विभाजन की सामजिक गतिकी भी नए अर्थ देती है।पर दंगों के बाद वैश्यावृति में उन्ही राहत कैम्पों से हिन्दू बहुल इलाकों में पहुंचाई जा रही लड़कियों को लेकर कोई साम्प्रदायिकता आड़े नहीं आती। जिसे भुला देने पर इधर बल दिया जा रहा हो और खुद उसके दोषी भाग लेना चाह रहे हों किसी उपन्यास में इतनी सशक्तता से आना उस सच को उघाड़ देने की तरह है। उस राजनीति से असहमति है। अनन्तर वहाँ बदलता प्रेम भी है जहाँ मानसी और आनंद कभी नहीं मिल पाते पर उन्ही की भांजी अपनी मर्ज़ी से शादी कर लेती है। जातीय बन्धनों को तोड़ता है आजीविका का स्रोत। कॉल सेण्टर का धमक के साथ हिन्दुस्तानी युवा पीढ़ी की जीवन शैली उसके मानस को परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण भूमिका में आ जाना।  

ऐसा नहीं है इन सब से गुज़रते हुए लेखक नहीं बताता के हम ऐसे कैसे होते जा रहे हैं। इस होते जाने का एक अंदाज़ा एक जवाब ख्रुशचेव की इस बात लगता है( पृष्ठ 131) जहाँ वे कहते है कि पूँजीवाद से समाजवाद में शांतिपूर्वक संक्रमण संभव है। उसी पल माओ ने इसका ज़ोरदार खंडन करते हुए कहा था कि वर्ग-समाज में वर्ग-संघर्ष अवश्यंभावी है। ख्रुशचेव की थीसिस वर्ग-सहयोग की और ले जा रही है और वर्ग-संघर्ष से दूर कर रही है। यह एक प्रकार का संशोधनवाद है। यहाँ सवाल हमें खुद से पूछना है हम वर्ग संघर्ष की तरफ हैं या संशोधनवाद की तरफ। मुन्नी की पूरी ज़िन्दगी उस वर्ग संघर्ष को वर्ग-सहयोग बनाने के कई पैटर्न है। लेकिन आखिरी पन्ने तक आते आते हमें दिख जाता है के सौन्दर्य के प्रचलित पूंजीवादी मानक कैसे रेखा के चहरे पर उभर आये सफ़ेद दागों के कारण उसे किनारे कर देते हैं। जिस वर्ग से वह आ रही थी वहाँ शिक्षा भी कोई मदद नहीं कर पाती। उल्टे उसका लैपटॉप कैसे उसे कॉल गर्ल वर्ल्ड की नयी अवतार बना देता है, क़ाबिले गौर है। रेखा चितकबरी। जो इन्टरनेट के जरिये अपने कस्टमर बनती है। लड़कियों की तस्वीरें उसने अपने ब्लॉग पर डाल दी हैं। पर उन पैटर्नों- ढर्रों में सेंध की तरह उसकी लड़की को देखा जाना चाहिए।

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