अप्रैल 28, 2013

वो जो गाँव जाना था : किश्त एक

{एक एक कर उन पुराने पन्नों से गुजरना थोड़ा रूमानी तो करता ही है। हम इस जल्दी में होते थे के जल्दी से जल्दी वो गाँव जाने वाला दिन आ जाए। फिर तो बस..इंतज़ार को पहली मर्तबा हमने तभी जाना होगा..उसी पुरानी डायरी से तबकी गाँव गए थे उसके बारे में आकार लिख लिया था। उसे लिखने का पहला प्रयास ही कहेंगे, उससे ज़ायदा कने पर रिस्क हमारे जिम्मे नहीं । आप भी देखिये हमारा बहराइच। पर इस बार इसकी किश्त तीन बन पड़ी हैं। आगे उनका लिंक भी लगा दूंगा। फिलहाल दिल्ली से चल पड़ते हैं..}

24.07.2002 यह तारीख़ सबसे आखिरी में लिखी थी। दिन पता नहीं।

हमारा सुबह सुबह तालकटोरा जाना तो छूट ही गया था। टीम टूट ही गयी थी। हम पार्क में खेलते थे। इसमे कुछ मज़ा नहीं आता था। हम गाँव चार मई मंगलवार को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से रात आठ चालीस पर गोरखधाम एक्सप्रेस से गए। हम गोंडा सुबह साढ़े सात बजे तक पहुँच गए। उन दिनों रेलों का आना जाना शायद नही हो रहा था। उसी दिन से दुबारा प्रारंभ हो रहा था।

पापा टिकट लेकर आए फिर हम छोटी लाइन वाले प्लेटफॉर्म पर गए। वहाँ एक ट्रेन पहले से खड़ी थी। जिसमे लोग पहले से बैठे हुए थे। पर हमें यह मालूम नहीं था कि ट्रेन कभी जाएगी भी या नहीं। तभी नौ बजे के आस पास एक नयी ट्रेन प्लेटफॉर्म एक पर आती है। पर हमें डिब्बे में जगह नहीं मिलती। हम लगिज (माल वाले) डिब्बे में चढ़ गए। मैं ज़िंदगी में पहली बार इसमे सफर कर रहा था। कोई खिड़की नहीं कोई दरवाजा नहीं। मैं अटैची पर बैठा था। मेरे बगल में एक व्यक्ति कन्नौज इत्र लेकर जा रहा था। वह मज़े से सो रहा था।

हम ग्यारह साढ़े ग्यारह बजे तक बहराइच पहुंचे। फिर एक रिक्शे वाले से हमने बस स्टैंड तक पहुंचाने को कहा। वहाँ से हमें गाँव की तरफ़ जाने वाला तांगा मिल गया। वह केले लेकर जा रहा था। उसका मालिक भी हमारे साथ था। केले का झाऊआ था। केले छोटे थे पर खूब मीठे थे। माने ही आठ केले खा डाले। 

हम साढ़े बारह एक बजे तक सड़क पहुँचे। हमने वहाँ वीसीडी प्लेयर देखा। उस पर उन्होने धर्म-काँटा फिल्म लगा कर हमे दिखाई। डेढ़ बजे लाइट ही चली गयी। हमें पहले कुछ दिन मज़ा नहीं आया। लेकिन धीरे धीरे मज़ा आने लगा। वहाँ पर सुबह और रात तो बड़ी जल्दी कट जाती थी पर दोपहर काटना और वो भी एक से चार बजे तक का टाइम काटना बड़ा मुश्किल हो जाता था। दो दिन हम परसौरा वाली रोड पर गए। हम वहाँ एक गिरे पेड़ पर बैठे जोकि जीवित था। एक दिन मैं और भाई गए। भाई आठ जाजू वाले लेकर गया था। और गरी, सौफ़ वाली डिब्बियाँ। दूसरे दिन संदीप भी हमारे साथ था।

कभी-कभी हम भई सड़क पर चले जाते थे। एक सुबह हम पापा को चाचा के साथ छोड़ने गए। वहाँ एक सड़क थी अभी अभी अभी बनी थी वहाँ आम के पेड़ पर लटककर मैं झूलने बड़ा मज़ा आ रहा था। फिर आधे घने बाद हम पापा को छोड़ रतनापुर गए। वहाँ चाचा ने समोसा सुहाल चाय पिलाई। फिर हम वापस हो गए। हम बारह एक बजे घर पहुँचे। जब मैं गाँव पर सोता था तब पौने सात सात बजे ही उठ जाता था। और जब सड़क पर सोता था तो साढ़े पाँच छह बजे ही उठ जाता था। तब उठकर मैं चक्की पर जाकर डब्बा लेकर मैं शौच करने चला जाता था। एक घंटा वहीं चक्की पर बिताता था।

पापा एक हफ़्ते बाद काम पड़ने के बाद दिल्ली वापस आ गए। उसी बीच भाभी की बहन वहाँ आई घूमने। हमारा भी मन था दिल्ली आने का। लेकिन पापा इलाहाबाद होकर दिल्ली आए थे। मैंने वहाँ वीसीडी प्लेयर पर कई फिल्में देखी जैसे जानी दुश्मन, धरम काँटा, नदिया के पार। डीडीएलजे की कैसेट ही खराब थी तीनों। हमारा प्लान राज़ देखने का भी था पर बैटरी न आने के चक्कर वह रह गयी। हम उसके अगले दिन वापस आने वाले थे दिल्ली। हमने सोचा अगली बार देखेंगे। जानी दुश्मन मैंने पूरी तथा पहली सीडी फिर से देखी। हम तो स्पाइडर मैन लाने के चक्कर में थे पर किसी कारण नहीं ला सके।

{आगे की दो कड़ियाँ: दूसरी: तब जो मेला देखा थातीसरी: वो जो साइकिल से जाना था }

आवाज़ें..

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