अप्रैल 09, 2013

ऊब बनते जाने के बीचों बीच: चाँद@आसमान डॉट कॉम

चाँद@आसमान डॉट कॉम॰ शुरुवात दो जगहों से होती है। पहला पन्ना: नन्दिता सुगंधा और मिहिर के लिए/ जो प्रेम पाने के लिए तूफ़ान से जूझ रहे हैं। दूसरा पन्ना दो उक्तियाँ। मैन इस फ्री एंड एव्रीवेयर ही इज़ शकलेस: रूसो। "मेरे लिए प्रेम एक लालटेन है/ जिसे अँधेरा होते ही जला लेना चाहता हूँ"

कुछ कुछ अंदाज़ ज़रूर लगता है पर पढ़ने से पहले कयास लगाना कुछ ठीक नहीं। पर अभी जब पहली पंक्ति को दोबारा देख रहा हूँ तो लगता है सब इसी के इर्दगिर्द है। इसे विखंडित करते चलते हैं जिससे दरीचे शायद और खुलें। पढ़ते लगता है यह प्रेम कहानी होने जा रही है जहाँ कोई त्रिकोण-चतुर्भुज जैसी गणितीय आकृति बनेगी। प्यार की प्रमेय जितना सुलझेगी नहीं उससे ज़्यादा उलझ जाएगी। इस समय कम होते जा रहे स्पेस के कुछ बयान होंगे। प्रेम का वर्ग-चरित्र होगा। कोई मिलेगा। कोई पीछे छूट जाएगा। आहें होंगी। बाहें होंगी। और चलताऊ भाषा में कहें तो क्लाइमैक्स तक आते आते भी पत्ते नहीं खुलेंगे।

पर सारा रूमानीपन एक एक पन्ने के साथ उड़ता जा रहा था। नन्दिता मिहिर की पत्नी हैं पर वहाँ मिहिर का नाम सुगंधा के साथ है और योजक है 'और'। कहानी नन्दिता से नहीं मिहिर के चाँद को लिखे पत्र से शुरू होती है। मतलब यह प्रौढ़ो की प्रेम कहानी जैसा कुछ है। जिसे लेखक मिहिर के प्रति सचेत आदर और स्पष्ट कर देता है। यहाँ ऊब का कारण वैवाहिक जीवन मे एक ही साथी के साथ बिताए साल हैं या शहर लगातार बेगाना होता जा रहा है या दोनों कहना मुश्किल है। जहाँ मिहिर को लगातार लगता है के अब यह पुराना वाला शहर तो बिलकुल नहीं रहा। जिन सपनों के साथ वह यहाँ फ्रीलांसिंग पत्रकार के रूप में अपने जीवन की पारी शुरू करते हैं खुद उस अख़बार का चरित्र कॉर्पोरेट बिजनेस कंपनी की तरह होता जा रहा है। सरोकार दरवाज़े के आस पास फटकने भी नहीं पाता है। उल्टे उनकी स्टोरी की एडिटिंग कर दी जाती है। उन्हे यह भी लगने लगता है के गलत लाइन चुन ली। पर अब हो कुछ नहीं सकता। वे अपना स्पेस बचाने के लिए जूझ रहे हैं।

भाग रहे है सामना करने से। पर शहर को भी क्या किसी के लिए रुके रहना पड़ेगा। के वह किन्ही लोगों के लिए वैसा ही बना रहे। क्योंकि वे उसे वैसे ही प्यार करते रहना चाहते हैं। या यह स्थापना ही गलत है। जैसे मिहिर वहाँ रहते हैं वैसे ही कई और भी होंगे। लेकिन सब एक जैसा नहीं सोचते। यह सोचना शहर को रोके रहना भी है और उसे कथित रूप से आगे ले जाना भी। लेकिन मूलतः उसे बदलता कौन है इसका एकरेखीय जवाब मिलना इतना सरल नहीं है। फिर सवाल उठता है के इतनी साझेदारियों के बीच में, हमारी मौजूदगी में ही वह क्षण-क्षण परिवर्तित होता रहता है और हम कहते हैं हमारी आँखों के सामने वह बदलता रहा। पर इसमे अपने हिस्से ढूंढने की कोशिश या तो हम करते नहीं हैं या फिर इतने पस्त हो चुके होते हैं के लगातार उससे पीछे खिसकते रहते हैं। फिर एक दिन ऐसा आता है के हम मिहिर हो जाते हैं।

मिहिर के हिस्से सपनों की एक पोटली भी थी। जैसे हम सबके होती है। उसमे उसके पुराने दिन थे। पुराना मतलब मुग्धाभाव वाली यादें। यादों में याद आई रुचिका। डीएन झा की शिष्या। करियरिस्ट निकली। इलीटिस्म से पीड़ित। जेएनयू ऑस्ट्रेलिया पीएचडी के बाद बड़े आदमी से शादी। उधर मिहिर अपने कस्बाई पिता के आईएएस वाले सपने को पलीता लगाते हुए एसएफ़आई की सदस्यता ले ली। और सीआरएल के दरवाज़े पर एक संवेदनशील युवा आज भी उसे देख जाता है। नन्दिता से प्रेम उन्हे प्रायोजित सा लगता है। क्योंकि उसे उन्होने नहीं चुना। चुना मतलब प्रेम पहले नहीं शादी के बाद की निर्मिति के रूप में वहाँ उत्पन्न होता है। यह भी सहचर्य से उपजा प्रेम है पर शायद मिहिर उसमे आकस्मिकता वाला रोमांच थोड़ा कम पाते हैं।

ऐसा नहीं है के इस दंपति में आपसी समझ नहीं है। उसका स्तर ज़ायदा सुलझा हुआ लगता है। पत्नी जानती भी है के इन बीतते सालों में दोनों के बीच दैहिक ऊर्जा ही नहीं और भी बहुत कुछ है जो अब पहले सा नहीं रहा। वही है जो मिहिर को अब तक संभाले हुए है। बराबर साथ है। उसे सुगंधा के बारे में भी पता है। यह भी के इन पिछले सालों में वे उसकी तरफ खींचे चले गए हैं और उसकी जगह लगातार कम होती गयी है। फिर भी वह उनसे बात करना बंद नहीं करती। उल्टे मिहिर को समझाती बुझाती रहती है। बुढ़ाती उमर में देवदास होना क्या है उसे पता है।

उसे यह भी पता है के रसोई ऐसी जगह है जहाँ प्रेमिकाएं जाते ही साधारण औरत में बदल जाती हैं। आटे दाल का भाव पता चल जाएगा। किचन सारे प्रेम का हत्यारा है। वह तो यह भी कहती है के पुरुष होने के नाते ही मिहिर इतनी स्वतंत्रताओं का उपभोग कर पा रहे हैं। यदि स्त्री भी समानुपात में यही करने लग जाये तब परिवार चल नहीं सकते। टूट कर बिखर जाएंगे। एक रात कई दिनों मन ही मन जूझने के बाद वह उस लड़के की कहानी भी कह डालती है जो शादी के पहले उसे प्यार करता था। वह मिहिर को कहती है पुरुष ऐसे ही महीन जाल बुनते हैं जहाँ कोई स्त्री आकार वापस न लौट पाये।

मिहिर की समस्या यह है के अपने सुख दुख के भागीदारीके साथ वह बिन जिम्मेदारियों वाला प्रेम चाहते हैं। जिसे नन्दिता अच्छी तरह जानती है। पर वह बौद्धिकता को आड़ बनाकर बरतते रहते हैं। वेवलेंथ का मिलना बहाना है। उन्हे पता है सुगंधा कल्पना में ही ठीक है, नन्दिता की तरह यथार्थ के रूप में ठीक नहीं। मिहिर को लगता है वे दो उदासियों के बीच फँस गए थे जहाँ पहिया धँस गया हो। वह बस इसी पहेली को सुलझाने में लगे रहते हैं के पुरुष स्त्री में क्या चाहता है। शरीर मन या बुद्धि, या तीनों।

पर महत्वपूर्ण सवाल यह है के फिर स्त्री क्यों नहीं? क्या स्त्री को संपूर्णता नहीं चाहिए? चाँद तो ठीकठाक बहाना है खुद से बचने का। आसमान में उड़ने की खवाहिश जितनी पुरुष के हिस्से है उतनी ही स्त्री के भी।

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