मई 23, 2013

मई का वो दिन जब पता नहीं कितनी गर्मी थी

{वही पुरानी डायरी जिसमे पूरे ग्यारह साल पहले आज के दिन हम खूब  ऊब चुकने के बाद छोटे छोटे से नन्हें मुन्ने निकले थे दिल्ली घूमने। वो भी दो दिन लगातार। गर्मी तब भी इतनी पड़ती थी। उसके बावजूद..और हाँ उसी कॉपी में आगे तेईस मई की नेशनल म्यूज़ियम की टिकट चिपकी मिली जिससे पता चला के वो कौन सा दिन था ..!! }

24॰07॰2002
मई के किसी दिन हमने चिड़िया घर और नेशनल म्यूज़ियम घूमने का इरादा किया। उस दिन हम छह लोग थे। हम ने पंचकुइया से 851 पकड़ी और तिलक ब्रिज पर उतरे। हम वहाँ से चिड़िया घर पैदल आ गए। हम तो आने में ही तड़प गए। हमने सोचा अब चिड़िया घर क्या घूमेंगे। हमने पाँच पाँच रुपये की पाँच टिकट और चिड़िया घर के अंदर गए। 

वहाँ सबसे पहले हमने कच्छुआ देखा। फिर हम सड़क पर बने हुए तीरों के साथ चलना शुरू किया। तब हमने हिरण, जंगली गाय, बारहसिंघे, भेड़िये, कबूतर, तोते, बंदर, जिराफ, हलाकू बंदर देखा। वहाँ एक बंदर बाघ की माँद (बाघके खुले पिंजरे) में आकार उसे चुनौती देकर नहा कर भाग गया। बाघ सफ़ेद थे, वह उसका कुछ नहीं बिगाड़ सके। हमने लकड़बग्घे भी देखे। पर वहाँ सबसे ज़्यादा हिरण ही थे।

हमे बीच बीच में प्यास लगती थी हम थोड़ा रुक जाते आराम करते चलते। हमने भालू, बब्बर शेर भी देखे। उनके आगे ही एक कमरे में साँप शीशे की शेल्फ़ में रखे हुए थे। वहाँ पर नागराज, अजगर, पानी वाले साँप रखे हुए थे। एक साँप दस फुट का था। कुछ साँप जहरीले भी नहीं थे। कुछ साँप पेड़ पर रहते थे। हम घूमते घूमते बहुत थक गए। बहुत अधिक जानवर देख कर जा रहे थे परंतु राजू की तमन्ना चिम्पांजी को देखने की था। वो हम नहीं देख सके। वहाँ हलाकू बंदर चिल्ला रहा था। वहाँ रंग बिरंगेपंख वाले तोते थे। कुछ के रंग तो बहुत ही सुंदर थे।

इसके बाद हाँ एक बजे के आसपास चिड़िया घर के बाहर आगए। हम चिड़िया घर की कैंटीन में गए वहाँ डोसा पच्चीस रुपये का था। हम वहाँ से चुपके से खिसक लिए। फिर हमने बाहर पाँच पाँच रुपये की माज़ा पी। वह तो बिलकुल रसना की तरह लग रही थी। लिखा था आखिरी के तीन दिन। हम लालच में आ गए और छह बोतल ले ली। पता चला की यह तो रसना है। फिर हमने कुछ खाने की सोची। हमे दुकान वाले पकड़-पकड़ कर ले जा रहे थे। हम एक दुकान पर बैठे। हमने वहाँ छोले भटूरे लिए। उस छोले में इतनी मिर्च थी की लग रहा था छोले कम मिर्च जायदा थी। लग रहा था मिर्च में छोले मिलाये हों। दस या पंद्रह रुपये का छोला भटूरा था। फिर हम यह खाकर बाहर आए। बाहर हमने एक कॉमिक्स अंगारा खरीदी दस रुपये की। क्योंकि छुटकी चाहती थी। उस पर जानवर बने हुए थे।

फिर हम चिड़िया घर से राष्ट्रीय संग्रहालय पैदल जा रहे थे। बीच में इंडिया गेट पर हम रुके। वहाँ पैर डालकर कुछ देर बैठे रहे। सारी थकावट दूर हो गयी, पर मंजिल अभी दूर थी। मेरे खयाल से संग्रहालय वहाँ से एक दो किलोमीटर होगा। हम ढाई बजे वहाँ पहुंचे। वहाँ एक पंगा था। स्टूडेंट्स एंट्री फ़ी एक रुपया, पब्लिक टेन रूपीज़ पर हैड। हमने काउंटर पर टिकिट वाले को किसी तरह पटाया और पाँच रुपये की टिकट ली और अंदर आ गए।

अंदर जाते ही हमने देखा टॉयलेट। हमने सोचा इसका प्रयोग कर लिया जाए। सारे उस पर टूट पड़े। वहाँ हमने हैंड ड्रायर देखा। जिसमे हाथ आगे आते ही गरम हवा आने लगती थी। सारे उसके पीछे पड़ गए। हाथ हटाते ही वह बंद हो जाता था। फिर हम सबसे पहले हड़प्पा संस्कृति के कमरे में पहुंचे। हमे सबसे पहले टच स्क्रीन कम्प्युटर दिखा जिस पर हाथ लगाने पर ऐरो इधर उधर होता था। जिसके बारे में जानकारी चाहिए वहाँ ऐरो को लाओ और उसके बारे में जानो। ऐसे हम एक कमरे से दूसरे कमरे तक दूसरे से तीसरे तक पहुंचे। वहाँ कमरे के अंदर कमरा था। वहाँ उनके जीवन के बारे में, रहन सहन के बारे में, व्यवहार के बारे में, पूजा के बारे में, बर्तनों के बारे में पता चला।

चार बजे हम वहाँ की कैंटीन में पहुंचे। वहाँ पाँच रुपये में खाना था। हमने सोचा खाना खा लेते हैं। लेकिन खाना नहीं था। हमने वहाँ तीन कोल्डड्रिंक (कोक) ली। वहाँ सिर्फ मट्ठी थी दो दो रुपये की। हमने वो नहीं ली। इसके बाद हम वहाँ की दुकान (म्यूज़ियम शॉप) में गए। वहाँ एक किताब डेढ़ सौ की। पतली पतली किताबें बहुत महंगी थी। वहाँ क्राफ़्ट,  फ़र्नीचर, शतरंज, आदिवासियों द्वारा बनाए गए समान रखे थे। हमने सिर्फ देखा, लिया कुछ नहीं। यह सब देख दाख कर हम साढ़े चार बजे तक बाहर आ गए और वहाँ से पाँच सौ बाईस पकड़ कर पाँच साढ़े पाँच तक हम घर आ पहुंचे। हमने खूब एंजॉय किया। हमने पप्पू पर पैट्टी भी खाई।

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