मई 01, 2013

असल संघर्ष मूल स्थानों को बचाने का भी है

आज तारीख क्या है। एक मई। मजदूर दिवस। क्या मेरे ऐसे लिखने से उसे दिहाड़ी रोज़ के रोज़ मिलने लगेगी। रिक्शे पर चढ़ने से पहले कोई भी सवारी पैसों को लेकर चिकचिक नहीं करेगी। वो जो औरत अपने मरद के साथ इस चिलचिलाती धूप में तपते तारकोल से सड़क बना रही है उसे भी शाम पूरे पैसे मिलेंगे। खेलगाँव की लाल बत्ती पर भाग-भाग किताबें बेचते लड़के-लड़कियों को शाम भर पेट खाना मिल जाएगा। और उन का क्या होगा जो गले में ढ़ोल और सर पर चोटी वाली टोपी पहने करतब दिखा रहे थे। उनकी ख़ुद को ज़िंदा रखने की ज़िद क्या हमसे कहीं भी कम है। या हम जिंदगी जी रहे है और वे सब उसे काट रहे हैं। उनके श्रम का मूल्य इतना कम इतना अमानवीय कैसे है? पता नहीं मुझे भी क्या हो जाता है कभी कभी। शायद उस दिन धूप में घूम लिया था न!! सिर ठिकाने पर नहीं है।

पर ख़ुद पूछा है इसलिए भी पूरी तरह नकार नहीं सकता। कहीं ना कहीं किसी के दिल में कुछ तो ज़रूर बदलेगा। नहीं बदल रहा है यह भी नहीं है। पर कोशिशें इसलिए भी बंद नहीं हो जानी चाहिए के वह बदलाव दिख नहीं रहा है। किसी कंपनी के पंखे के विज्ञापन से प्रभावित नहीं हूँ पर लगता है हवा बदलेगी। उसे बदलने के लिए होना होगा गरम हवा।

सोचता हूँ क्या इसलिए भी मैं कभी रिक्शा नहीं करता उससे लगातार बचता हूँ के वह मुझे अमानवीय लगता है। के किसी की मांसपेशियाँ मेरे बोझ से काँपती कान तक आते-आते फूल जाएँ। उसके फेफड़े जवाब देने लग जाएँ। हाथ जो हैंडल पर है वह पसीने से फिसलने लग जाए। पर तब ऐसा ना करके क्या मैं उसकी दिहाड़ी नहीं मार रहा हूँ। उसका किराया कैसे निकलेगा। शाम दाल के बजाए सूखी रोटी खानी होगी। पर अच्छा है मेरे जैसे उनसे कम ही टकराते हैं। पर फिर अचानक कहीं से मानो और सुकिया याद आ जाते हैं। लगता है वे शायद ही कभी अपना घर बना पाएं। ईंट के भट्टे ने उनके सपनों को झुलसा दिया है। मिट्टी पाथते पाथते उनकी ज़िंदगी ख़ुद मिट्टी हो रही है। गाँव से ना भागे होते तो कबके मार दिये जाते। उनकी कहानी में कभी घर नहीं है। सिर्फ उसका सपना है। अधूरा सपना।

पर कभी कभी मुश्किल होती है उनके चहरे याद करने में। एक बाबा मेट्रो स्टेशन के पास वजन करने की मशीन लेकर बैठते हैं। दिन में कितने लोग उसपर चढ़ कर वजन करते होंगे, पता नहीं। पर उन्होने भीख माँगने का विकल्प नहीं चुना। चुनी दिल्ली विश्वविद्यालय के सुलभ शौचालय की दीवाल। पीठ में बैठे बैठे दर्द होने लगे तो टेक लगा लें। भीख मांगना एक तरह से सभी प्रकार के श्रम कौशलों से स्वयं को च्युत मान लेना है। पर उस शाम हज़रतगंज साहू के सामने लगी बैंच पर बैठे जोड़े से एक नन्ही सी लड़की आकार खाने की गरज से रुपये मांगती है। दोनों बड़ी देर से उसे आसपास घूमता लोगों से मिन्नतें करते देख रहे थे। लड़का जेब से दस का नोट निकालकर उसकी तरफ दे देता है। उस लड़की, उसकी पास ही घूमती माँ के पास क्या और कोई भी मानवीय विकल्प नहीं बचा है।

देर तक सोचता रहा। कोई जवाब नहीं मिला। उल्टे मिले कई सवाल। के जहां के यह मूलनिवासी होंगे क्या वहाँ इनके श्रम का मूल्य लगाए जाने लायक कोई भी परंपरागत कौशल इनके पास नहीं बचा है। पट्टे पर खेती भी नहीं। बँटाई में भी नहीं। या किसी के क़र्ज़े से बचने के लिए वहाँ से भाग लिए। फिर वह सौ दिन के रोज़गार वाली भ्रष्ट योजना ने इन्हे भी बेदख़ल कर दिया।

लगा यह संकट इतना उनका नहीं जितना हमारी बदल गयी उत्पादन प्रणाली का है। वह आपको देती नहीं। छीन लेती है। हमारे विकास के मॉडलों में वह पुराने घिस चुके कलपुर्ज़े हो गए हैं। यह अवमूल्यन इस स्तर तक जा पहुँचा है जहाँ लाभ की कुछ संख्याओं के बराबर पहुँचने में उसे बाधक तक मान लिया गया है। और वह अकेला नहीं है। पूरा तंत्र, पूरी मशीनरी उसके साथ है। तभी किसी मानेसर की घटना में श्रमिकों का पक्ष गायब रहता है। जहाँ से वे आए हैं वहाँ संसाधनों की लूट इस कदर मची हुई है के भूमि-अधिग्रहण उस कथित विकास के लिए अपरिहार्य मान लिया जाता है। वक़्त है अपने मूल स्थानों को बचाने का। वह बचेंगे, तभी हम बचेंगे। उनका होना, हमारा होना है। फिर कभी किसी को किसी का मजदूर होने की ज़रूरत नहीं होगी। तब जो दिन आएगा वह ‘मजदूर दिवस’ नहीं ‘श्रम दिवस’ होगा। पर काश ऐसा हो पाता..हम ख़ुद को बचा पाते!!

आवाज़ें..

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