मई 02, 2013

गर्मी-मौसम-विखंडन और मेरी विचार प्रक्रिया का वाष्पीकरण

जैसे जैसे मौसम गर्म होगा वैसे-वैसे देह से कपड़े और छिटकते जाएंगे। अपने आप। उनका न्यूनतम अवस्था में पहुँच जाना ही ध्येय है। मेरा नहीं। उन बहु-प्रचारित विज्ञापनदाता कंपनियों का। इस दरमियान जो पीठ पर घमौरियाँ हो गयी हैं उसपर किसी कंपनी का पाउडर छिड़का जाएगा। वह ठंडा-ठंडा भी है और उसमे 'मिंट' भी पर्याप्त मात्रा में मिला हुआ है। फूलों की ख़ुशबू के साथ। इसलिए फिकर करने की ज़रूरत नहीं। चूंकि धूप में शरीर में पानी की कमी हो जाने का खतरा हमेशा बना रहता है इसलिए भी कुछ शक्तिवर्धक पेय उनका इंतज़ार करते मिलेंगे। जो काम ‘स्वास्थ्य मंत्रालय’ को करना चाहिए था उसे यहाँ बखूबी निभाया जा रहा है।

इतना ही नहीं समाजशास्त्र का कुछ हिस्सा भी उन कक्षाओं से चलकर यहाँ-वहाँ छितर गया है। जो उम्र में थोड़े बड़े है चाहे लड़के हो या लड़कियाँ, वे इन टेल्कम ऍड में आते हैं। पर उन विशुद्ध ‘समाजशास्त्रीय भूमिकाओं’ की रेखा को स्पष्ट करते। यहाँ उपभोक्ता को लिंग में विभाजित कर दिया जाता है। उनकी आदिम इच्छाओं के साथ। भले सिनेमा स्टडीज के जाधवपुर यूनिवर्सिटी और जेएनयू के छात्र फिल्म ‘पर्फ्यूम’ देखकर यह अंदाज़ न लगा पाये हों कि कौन सी गंध से स्त्रियॉं को पहचाना जाने लगा और कौन सी गंध मर्दों के हिस्से आई, तो उन्हे यह विज्ञापन देखने चाहिए। यहाँ इतिहास तो नहीं पर वर्तमान के कई ‘टेक्स्ट’ पढ़ने को मिल जाएंगे।

थोड़ा ध्यान से देखने पर और भी कई चीज़ें साफ-साफ दिख जाती हैं। के यहाँ प्यास का मतलब पानी नहीं है। पानी से तो सिर्फ गला तर होगा। यह पेय तो आपको उससे कहीं आगे की छलांग लगवा कर ही दम लेंगे। वहाँ इसे किन-किन रूपकों से जोड़कर उस पानी को अपदस्थ कर दिया गया है देखने लायक है। पानी तो इसका कच्चा माल है जो इन बड़ी-बड़ी कंपनियों के प्लांटों में जमीन से बेतहाशा निकाल जा रहा है। यह किसी से छिपा नहीं है के इस भू-गर्भीय जलदोहन में वे अव्वल रही हैं। तभी कई साल पहले आमिर खान कुएं की बाल्टी से पानी नहीं निकलते। वहाँ निकलता है ‘ठंडा मतलब कोका कोला’।

जिसने सैकड़ों लोगों से उनके हिस्से से मूलभूत जीवन का आधार छीन लिया वही इधर टीवी पर ‘बेवजह खुशियाँ लुटाने’ को कह रहा है। पानी 'स्पेक्ट्रम' की तरंगों से ज़्यादाह मूर्तरूप में हमारा प्राकृतिक संसाधन है और इस देश के निवासियों का उस पर उन कंपनियों से पहले अधिकार है। फिर भी यह लूट कईयों की नाक मूँछ के नीचे लगातार चलती रही है। लगातार चलती रहेगी।

इधर यह भी देखना मौजू होगा के मर्दों वाली क्रीम का विज्ञापन करते शाहरुख़ खुद तो लक्स साबुन का ऍड टब में नहाते हुए कर लेते हैं पर पुरुषों को रूखी त्वचा पर कौन-कौन सी मलाई पोती जाए इसके भी वे ज्ञाता हैं। पर इन दिनों वे कटरीना के मुकाबले खड़े हैं। आम मलीहाबाद के बागों से बाज़ारों में न पहुँचा हो पर बोतलबंद पेय में 'अल्फ़ान्सो' आम का रस पहुँच चुका है। पूरे बारह मास पहुँचा रहता है। और तब कि जब गर्मीयाँ अपने शबाब पर हो, यह दोनों फ़िल्मी किरदार दर्शक को अपनी भाव भंगमाओं से 'सिड्यूस' कर रहे हैं। इसमे उस आमरस का पिया जाना इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना के उसका इन दोनों का उस क्रिया विशेष को विशिष्ट मुद्राओं के द्वारा किया जाना। एक क्षण के लिए तो उन गंधों के विज्ञापनों और इनकी विभाजक रेखाएँ तक धूमिल हो जाती है। मुश्किल नहीं है के फ़्राएड का ‘लिबिडो’ यहाँ अपना काम करने लगे।

फिर आखिर में जाते जाते एक विज्ञापन मुझ अविवाहित को भी रिझा लेता है। उसकी तरफ खिंचा चला जाता हूँ। जाना न जाना मेरी इच्छाओं से परे है। जहाँ इन गर्मियों के रूखे दिनों में देह पर विशेष कोमलता बनाए रखने का आग्रह लिए वे आते हैं। और तो और उसकी बोतल तक स्त्री देह की बनावट लिए हुए है। ब्लाउज़ और कमर के नीचे लिपटी साड़ी के दरमियान जो खाली जगह है वहाँ हाथ फेरना कितना मुलायम एहसास होगा। तभी मुझे लगता है यही उस विज्ञापन की जीत है। जो मेरी सत्ता को अपदस्थ कर खुद को स्थापित करती है। इतना लिखना पढ़ना सब धरा का धरा रह जाता है।

{पीछे का ज़रूरी पन्ना। इसी नाम से : गर्मी-मौसम-विखंडन और मेरी विचार प्रक्रिया का वाष्पीकरण |यह पोस्ट सोलह मई को जनसत्ता में आई है। वहाँ पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ। }

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