मई 03, 2013

इतने पर भी दिन ख़त्म कहाँ हुआ है

तारीख तीन मई। साल यही दो हज़ार तेरह। बिस्तर से जागे हुए यही कोई चार घंटे चार मिनट के लगभग हो गए हैं। और सुबह की किश्त के सारे काम निपटा चुका हूँ। एक बार ब्लॉग डैशबोर्ड खंगाल लिया है। दो बार फ़ेसबुक खोलकर देख चुका हूँ। कोई नया नोटिफ़िकेशन नहीं है। सब वही ग्रुप अप्डटेस। इनबॉक्स भी खाली। कोई इंतज़ार नहीं कर रहा है। और जिसके इंतज़ार मे हूँ वो एक तारीख़ की रात बारह बजे के बाद से गायब है। आखिरी बार तभी उनका फोन आया था। इधर कल शाम मेरा मन था तुमसे बात करने का। करता भी। पर ‘आउटगोइंग’ बंद है। दो महीने से बिल नहीं भरा।

इन सारी बातों को एक बार फिर दोहराने के बाद भी मेरे पास कोई ऐसा काम नहीं बचा है जिसे काम कह सकूँ। थोड़ी और गर्मी बढ़ेगी, लेट जाऊंगा। छतपंखा खराब है इसलिए भी नींद आएगी नहीं। उठकर बैठ जाऊंगा। फिर यहीं मेज़ के सीधे हाथ पर असगर वज़ाहत का ‘बरखा रचाई’ उठाऊंगा। पढ़ने लगूँगा। हफ़्ते भर से ज़्यादह हो गया है। पर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। उल्टे मेरी स्पीड धीमे कर दी है। सच कहूँ तो पका रहा है। शुरू में लगा दिल्ली ने कमर पर लात मारी है उठने में वक़्त लगेगा। बाग बगीचे में लगे हैं तो उसके तफ़सरे होंगे। पर साजिद मियां वहाँ से भाग लिए। एक लड़की से चाँदनी रात में बेपरदा होकर मिलते थे पर पलंग के सिवा उसे कुछ न दे सके। बस कैंसर से मरते वक़्त उसकी माँ की हथेली में कुछ नोट धर दिया। खुद पत्रकार बने देश दुनिया बघार रहे हैं।

सच में इतना ख़राब इधर कम ही पढ़ा है। इसलिए भी मन नहीं होता। हरबार कोशिश करता हूँ। लेकिन दस बारह पन्नों बाद किनारे। अधलेटे कमर भी कुछ पिराने लगती है। उसे सीधा करने बाहर निकाल जाता हूँ। एक कुर्सी रखी है। बैठ जाऊंगा। थोड़ी देर उन कबूतरों को छत पर पानी पीते देखता रहूँगा। नहीं हुआ तो उस चौंधते आसमान को ही थोड़ा देख लूँगा। बारिश अभी कई दिन दूर है। ‘फेड ब्लू’। आसमान से रंग भी उड़ गया हो जैसे। उसका भी वहाँ रहने का मन न हुआ तब क्या होगा। तब शायद मैं उसकी जगह और वो मेरी इस कुर्सी पर। पर पता है वो दिन भी बरसात की तरह नज़दीक नहीं हैं।

पता नहीं कबूतरों के साथ कउवे क्यों नहीं हैं। इधर सुबह भी नज़र नहीं आते। हाँ उस दिन उस डाड़ पर कोई नन्ही सी चिड़िया थी। अपन सलीम अली होते तो नाम पता होता। पर जाने दो। हटाओ। वह किसी को बुला रही थी। मैं भी सुन पकड़ने की कोशिश में था के क्या कह रही है। पर समझ नहीं पाया।

तो हम कुर्सी के इर्द गिर्द थे। वहाँ इस तपिश में और देर बैठा भी नही जा सकता। मन किया तो अंदर जाकर मुँह पर पानी के छींटे मरूँगा। पर सोच रहा हूँ, आज तक मन हुआ नहीं है। शायद आज हो जाए। तो खैर, वापस अंदर आकार जो भी मन में खुराफ़ात चल रही होगी उसे डायरी में लिखने क मन होगा। पर लिखना इतना आसान है क्या। कलम की स्याही इस गर्मी से सूख चुकी होगी। क्योंकि पिछली मर्तबा कब जनाब लिखने बैठे थे ठीक से उन्हे भी याद नहीं। फिर तो वो बेचारी 'चीन' में बनी मामूली सी कलम है। उसकी क्या गलती। गलती इन हाथों की है।

वहाँ तारीख़ देख खुद को कोसने को होऊंगा। कि क्या बीते दिनों में एक भी बार यहाँ नहीं आया जा सकता था। या साहब उबासी लेने में इतने बीजी थे के नज़र नहीं पड़ी। पर क्या करूं। बीते दिन वापस तो आ नहीं जाने वाले हैं। इसलिए चुपचाप स्याही कि बोतल खोल इंक भरने लगूँगा। फिर भी पैन चलेगा नहीं। मेज़ पर कहीं कागज़ दिख गया तो उसकी शामत। निब पर इस तरह दबाव पड़ेगा के लगता उसकी नटई होती तो वहीं नसे ज़रूर उभर आतीं। इतना होने पर कौन लिख सका है। मुँह लटक जाएगा। उसका ही कोई पन्ना पलट पढ़ने लगूँगा। कुछ शक भी होने लगेगा। पर खुद को मना लेता हूँ। कि लिखाई मेरी ही है।

पर अभी फिर याद आ जाएगा इतने पर भी दिन ख़त्म कहाँ हुआ है। तारीख़ वही है। साल वही है। तीन मई। दो हज़ार तेरह।

आवाज़ें..

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