मई 24, 2013

दिल नहीं भरा था पिछले दिन से..

उसी के दूसरे दिन हमने रेल म्यूज़ियम जाने का फैसला किया। हम यहाँ से मैं, मुनीन्द्र, रामकुमार, राजकुमार, किशोर और हर्षवर्धन तय्यार होकर निकले। हर्ष का जाना लास्ट मोमेंट पर तय हुआ। उसका जाना  तो मुमकिन न था। पर हम उसके लिए थोड़ा रुक गए।

हम यहाँ से पाँच सौ बाईस से शिवाजी स्टेडियम गए। वहाँ से छह सौ बीस नम्बर की बस में बैठे। दो दो रुपये की टिकट कटाई। पर वहाँ तक की टिकट सात रुपये की थी। हम स्टाफ चला रहे थे पर कंडक्टर भड़क गया। उसने हमे जंतर मंतर के पास उतार दिया। थोड़ा पैदल चल कर एक बस में फिर चढ़े। उसमे टिकट ही नहीं ली। स्टाफ कहा तो उसने कहा कोई स्टाफ नहीं चलता। हम अगले स्टॉप पर उतर गए। फिर वहाँ से एक और बस में चढ़े। फिर हमने दो दो रुपये की टिकट लेकर किसी तरह हम रेल संग्रहालय जा पहुंचे।

गेट पर हमने चार बच्चों वाली टिकट लीं और किशोर और हर्ष की अडल्ट की टिकट ली। वहाँ हमने पुराने रेलों के मॉडल देखे। उनके साथ एक बटन था उसे दबाने पर उसके बारे में जानकारी प्राप्त होती थी। हम हर मॉडल में वह बटन खोजने लगे। हमे वहाँ भी वैसे टच स्क्रीन कम्प्युटर मिले जैसे नेशनल म्यूज़ियम में थे। इसमे मेट्रो रेल के बारे में जानकारी दी हुई थी। पर वहाँ एक बच्चा पहले से ही खड़ा था वह हट हही नहीं रहा था। हम वहाँ से आगे चले गए।

फिर हमने मिनी रेल की यात्रा करने की सोची। हम चारों ने तो बच्चों वाली टिकट ली पर किशोर और हर्ष ने फुल टिकट ली। थोड़ी देर बाद बारह बजे ट्रेन चल पड़ी। दस मिनट के अंदर ट्रेन वापस आ गयी। कुछ मज़ा नहीं आया। हमें भूख लगी। हम ट्रेन ट्रैक को पार करके बीचों बीच रेस्टोरेन्ट जो कि ढलान से चढ़कर ऊपर था वहाँ गए। हमने वहाँ स्कूल वालों के लिए मिलने वाली कोक मांगी तो उसने कहा यह स्कूल ग्रुप वालों के लिए है। हमने वहाँ कुछ नहीं खाया। भाग गए।

नीचे आने पर हमने मैगी खाने का प्लान बनाया। दस दस रुपये की मैगी थी। हमने सोचा अच्छी होगी। हम ट्रेन में उसके बनने का इंतज़ार करते रहे। जब वह आदमी दोने में मैगी सर्व कर रहा था तो ट्रेन चल पड़ी। हमारे अरमानों पर पानी फिर गया। मैगी भी बहुत कम कम थी। हमने ट्रेन का मज़ा एक ही टिकट से दो बार उठाया। और फिर हम बाहर आ गए।

फिर बस में सवार हुए। दो दो की टिकट देकर उसने कहा सात सात की लगेगी। हमने कहा स्टाफ है। वह नहीं माना। हम आगे स्टॉप पर उतार गए। फिर हम पैदल ही नेशनल म्यूज़ियम तक आए। एसएस\आरे प्राण निकाल गए। स्टॉप पर हर्ष और किशोर रुक गए हम आगे जाकर नहर पर पाव धोने चल दिये। वह दोनों तो ढाई बजे घर पहुंचे जबकि हमारे सारे सपनों पर गंदा पानी फिर गया। जगह बिलकुल भी बैठने लायक नहीं थी। फिर हम स्टॉप पर खड़े थे हमे फिर वही पाँच सौ बाईस दिखी जिसमे स्टाफ चला कर शिवाजी स्टेडियम तक आए थे। फिर हमे डीटीसी पाँच सौ बाईस मिली जिसमे हमने दो दो की टिकट ली। हम तीन बजे पहुंचे। 

{दिन पिछला यहाँ है }

आवाज़ें..

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