मई 04, 2013

फिर होगी शाम और मैं कहूँगा शाम हो गयी

इतने पर भी दिन खत्म कहाँ हुआ। घड़ी की काँटे अपनी जगह दुरुस्त हैं। पर पता नहीं लगता है जैसे सबके सब किसी कंट्री मेराथन में भाग लेने चले गए हों। जो जितना धीरे चलेगा, देर में पहुँचेगा वही विजेता घोषित कर दिया जाएगा। उनकी रेस चल रही है पर अपनी तो साँस ही अटक जाती है। सोचने लग जाता हूँ जब करने को एक अदद काम सिर्फ़ टाइमपास करना ही हो और करने लायक कुछ न हो तब उससे जादा उबाऊ काम और कोई नहीं हो सकता। पर सारे उड़ कहाँ गए। वैसे इतने पर भी दिमाग चल रहा है। बराय मेहरबानी। इतनी ख़ैरियत है।

तबतक उस कुर्सी, रंग उड़ गए आसमान, डायरी, पैन, कबूतर सब को कई-कई मर्तबा देख-सोच लेने के बाद मुँह लटकाए नीचे आने का वक़्त हो चुका होता है। मतलब अबतक सिर्फ़ दोपहर के खाना खाने का वक़्त हुआ है। रात नहीं हुई है। अभी दिल्ली दूर है की तर्ज़ पर खाना खाने पहुँचते हैं। पर खाना गर्मी के कारण कम खाता हूँ या कोई और वज़ह है समझ नहीं पाता। जबड़ों की जोड़ी बराबर ऊपर नीचे होते हुए अपना काम कर रही है। थाली अपनी जगह गिलास अपनी जगह पहुंचाए जा चुके हैं। आँखें टीवी पर लगी है। और दिल डूबा जा रहा है।

मन करता है जल्दी से ऊपर भाग लूँ और कुछ देर के लिए सो जाऊँ। शायद उसी दरमियानी वक़्त सबसे तेज़ दौड़ लगा ले। पर नहीं तुम बहुत बेरहम हो। तुम्हारी आँखों में पानी नहीं है। सूख चुका है। इस मौसम में कुएं नदियां सूख जाएँ आँखें क्या बला हैं। कातर नज़रों से उसकी तरफ़ देखता हूँ। पर तुम नहीं देखते। थोड़ी देर बाद मैं भी हुंह करके मुँह फेर लेता हूँ। फिर सोचता हूँ करूँ क्या। तुम्हारी कुछ तस्वीरें भी मोबाइल में नहीं हैं के दिन में दो बार देख लिया करूँ। और ये ससुरी आउटगोइंग भी। बंद भी होना था इसे। इस तरह।

बड़ी देर की जद्दोजहद से जूझने के बाद खिड़की पर पर्दा चढ़ा कर लैपटॉप उठाता हूँ। के थोड़ा तो सिनेमाहॉल का फील आए। लेकिन उसके लिए ज़रूरी है कोई धाकड़ सी फिल्म हो। इसी गरज से सारी ड्राइव खंगाल लेने के बाद याद आता है के 'डी' ड्राइव में कभी झउआ भर हॉलीवुड फ़िल्में थीं। पर पिछली बार जब विंडो करप्ट हुई तभी उन्हे डिलीट कर दिया था। 'इ' में जो बची रह गयी थी उनमे से किसी में भी इस तपती दुपहर को काट लेने का माद्दा नहीं। टॉरेंट से कौन सी फ़िल्म डाउनलोड करनी है समझ नहीं आता। कौन सी करूँ। मुँह फिर लटक जाता है। इस बार दुख जादा होता है। पर खैर। सोने के ऑप्शन पर एक बार फिर सोचने लगता हूँ।

पर याद आजाती है पिछली रात। दुपहरी भी सो गया था। जिसकी कीमत रात उल्लू की तरह जाग कर चुकाई थी या कुत्ते की नींद में था इसका फैसला अभी होना बाकी है। इसलिए तुरत ख़ारिज। आज सोएँगे नहीं। भले बोर होते रहें। हिम्मत करके एक फ़िल्म चलता हूँ। पर दिल का क्या करूँ बेचारा कभी-कभी बड़ा कमीनगी कर जाता है। अभी कल ही लो। ठीकठाक फ़िल्म चल रही थी। कि क्या ज़रूरत थी हीरोइन की शक्ल और तुम्हारे नाकनक्श चहरे मोहरे को मिलान करने की। पर नहीं। हुज़ूर करने लगे। अब यही कर लो या फ़िर फ़िल्म देख लो। आधे पर बंद कर दी। नहीं देखेंगे। इसलिए तो बिलकुल नहीं देखेंगे। ऐसा एक रोज़ और हुआ था तब इसे समझा दिया था। लगा था समझदार है। अब नहीं करेगा। पर आदत के मजबूर हैं। क्या ज़रूरत है तोते उड़ाने की। नहीं उड़ाने हमने तोते। तीतर बटेर भी नही।

इन सबसे लड़ते भिड़ते घड़ी देखना भूल जाऊंगा। जब याद आएगी तब तक पौने पाँच बज रहे होंगे। थोड़ी देर बाद पानी भरना है। सप्लाई वाला। साढ़े पाँच तक क्या करूँ। मन किया तो मोबाइल उठा लिया। थोड़ी देर ‘एयर कंट्रोल’ खेलता हूँ। रोज़-रोज़ वही करूंगा क्या। यही सोच किनारे रख देता हूँ। डायरी पास ही पड़ी है। कुछ लिख ही लेते हैं। बस इतना लिखता हूँ के लिखने आ गया हूँ। साढ़े पाँच बज जाते हैं। पानी अब साफ़ हो गया होगा। मयूरजग उठाया। चले गए पानी भरने। वापस ऊपर आते आते छह बज गए। अब इंतज़ार सात बजे का करना है। जब अंधेरा हो जाने वाला होगा। और वो गेट के सामने से गुज़रेगी।

आजतक दो तीन ही बार उसे देखा है। सामने बसस्टैंड से वह इधर ही सड़कपार कर लेती है। आज तक उससे बात नहीं हुई है। और रोड साइड रोमियो बनने का कोई शौक भी नहीं चर्राया है। उसे कुछ बोलूँगा भी नही। सच कहना नहीं चाहता था पर कहे देता हूँ। हिम्मत नहीं है। वैसे बोले जाने की ज़रूरत पर ध्यान दिया जाना चाहिए। बस उसे अपने आगे-आगे चलते जाते देखना चाहता हूँ। उसे बिन बताए। और कल जब मैं वहाँ से लौट रहा था उसने मुझे देखा। मतलब उसकी आँखों ने। वहाँ कोई ‘बलम पिचकारी’ गाना सुन नहीं पाया। जो मेरे कानों के पास बज रहा था। बिना हेडफोन लगाए।

आवाज़ें..

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