मई 05, 2013

एक्सट्रीम पर्सनल: इसे ख़त ही समझना बेनामी

इतवार। सुबह। सवा सात बजे।

पता नहीं यों दिल सुबह सुबह उदास नहीं होता। पर आज है। और साथ मौसम भी। रात से ही हम दोनों साथ उदास होने लगे। नींद डेढ़ बजे लेटने के बाद भी आँखों से गायब। सोच रहा था ऐसा क्या हो जाए, जिससे तुम्हारे चहरे पर वही मुस्कुराहट लौट आए। पर तुम्हारे पास नहीं हूँ। सोचता हूँ नागमती ने 'पद्मावत' में जिस काग से अपने प्रियतम को संदेसा भेज लिवा लाने को कहा था, थोड़ी देर के लिए वही बन जाऊँ। उड़ तो सकूँगा। तुरंत तुम्हारे जागने से पहले पहुँच जाता और तुम हैरान होती। के बिन बताए कैसे। और तब हम बिलकुल आस पास होते। अगल बगल।

थोड़ी देर लेट गया। कुछ सोच नहीं पा रहा। खिड़की के बाहर अशोक पर नए आए पत्ते हैं। कोमल मुलायम चिकने। किसी की याद की तरह। तुम्हारी याद की तरह। कभी तुम्हारे गालों को छुआ नहीं है पर लगता है ऐसे ही होंगे। तुम्हारे हाथ भी क्या इतने कोमल हैं के उनमे हड्डी का पता नहीं चलता। और जो रोज़ कहता हूँ के घर से बाहर निकलते काला टीका लगा लिया करो। लगाती हो के नहीं।

कभी पढ़ा याद आया के कामदेव के तरकश में पाँच बाण थे। उनमे से दो को बचपन से देखता बड़ा हुआ हूँ। एक कहानी में अपर्हता ने किसी की पत्नी को अशोक की बगिया में बंधक बनाकर रखा हुआ है। कि वह उसके प्रति कामासक्त होकर अपने पति को भूल जाएगी। पर उसे याद आए अपने पति। कहानी स्किनर या पैवलॉव ने पढ़ी होती तो आज ‘कंडिशनिंग’ की कोई और ही परिभाषा हमारे सामने होती। वह उस समाज में पत्नी थी जहाँ औरतों को सिर्फ अपने खसम से इश्क़ करने के लिए गढ़ा जाता है। वह भी मर्द की शर्तों पर। नहीं तो उसे भी दर्द होता है सबको पता चल जाएगा।

पर यहीं आकर रचियता दखल भी देने टपक पड़ सकते हैं कि ‘नहीं वत्स..!! कामदेव ने अपना काम ही किया। एक स्त्री को पदस्खलित होने से बचा लिया। बड़ी बारीकी से महीन काम किया। प्रेम कहानी इसलिए भी प्रायोजित है क्योंकि कलयुग को थोड़ी देर और टाला जा सके। देवासुर संग्राम रचा जा सके। इसी गरज से वहाँ ‘विरह’ को रचा जाता है।

मिथकों के साथ यही दिक्कत है। उसका जो अर्थ मैं हृदय से लेना चाहता हूँ वहाँ कइयों का दिमाग दौड़ने लगा होगा। इस भाव और विचार के चक्कर में मारा हमेशा प्रेम जाता है। कहानी को अपने तरीके से उसके कई हिस्सों को छोड़ देना चाहता हूँ पर तुम हो के लग्गी से घास खिला रहे हो। वैसे किसी सांस्कृतिकप्रेम में विश्वास नहीं करता जो हमेशा ‘अमूर्त’ बने रहने की कोशिश में रहता है। मेरे हिस्से में जो इधर है वह देह जितना मांसल है। उसे छुआ जा सकता है। और तब प्रेम के नए अर्थ खुलते हैं। दोनों का साथ होना जितना स्वाभाविक है, उससे कहीं पीड़ादायक वह क्षण हैं जब दूसरा संगी सामने उपस्थित नहीं है। उसे कहने के लिए मेरे पास अभी एक ही भाव है ‘करुणा’।

तुम्हारी आवाज़ से लगा कहीं तुम्हारे घर के पास भी तो अशोक के पेड़ नही उग आए हैं। आम के तो शर्तिया होंगे। शायद उस तालाब की तरफ। जहां कभी कभी बगुले बैठे रहते होंगे। आवाज़ कानों में अब मिशरी कम घोल रही है। तुम्हारी परछाईं ने ढक दिया हो जैसे। मुझे। मेरे दिल को। उनसे निकलते भावों को। उन स्पंदनो को। जो बाहर आ रहे हैं रहे हैं उनमे सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारा ही नाम है। वो सारी दुपहरियाँ तुम्हारे हिस्से काटना चाहता हूँ। उसमे हम दोनों साथ हों। सिर्फ़ हाथ से कान की तरफ बोलें नहीं उसे छू भी सकें। कहते हैं वहाँ छूने से कुछ होता है। पर तुम बिलकुल उस वक़्त फिल्मी हिरोइनों की तरह शरमाना मत। और वो तो बिलकुल मत करना। के कान के पास जो लट छोटी जानबूझकर ऐसे ही किनही अवसरों के लिए रहने दी है, उन्हे चुपके से आँखों के सामने से कान के पीछे ले जाना। और पलकों को नीचे झुका लेना।

मैडम हम फिल्मों में नहीं हैं। हमें इज़हार करने के कई कई तरीके खुद से भी बनाने होते हैं। किसी की नकल वहाँ काम नहीं करती। वैसे हम खुद इन मौके बेमौकों पर इसके सख़्त खिलाफ़ है। अभी से बताए दे रहे हैं। उनको ईज़ाद करने में आपकी भी उतनी भूमिका चाहिए जितनी कि हमारी। जाते जाते फिर कहे देता हूँ इन सबको पढ़ लेने के बात तो काला टीका वही कान के पीछे बालों में छिपाकर अब लगाना शुरू कर ही दो। पता है यहाँ सब नज़रों के खेल खेलते हैं। हमने तो लगाना शुरू कर दिया है। आपके भी। हमारे भी। दोनों के।

और देखो..चलो, वो फ़ोन पर..

आवाज़ें..

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