मई 06, 2013

तब जो मेला देखा था: किश्त दो

पंद्रह जून शनिवार को हमने चाचा के साथ दरगाह मेला देखने का प्लान बनाया। उस दिन मैं, भाई, संदीप, चाचा मेला देखने गए। हम साढ़े तीन बजे गाँव से चले। चाचा ने अशोक(सरकारी तेल की दुकान) से सरसों का तेल लिया। पंद्रह किलो और किसी मुसलमान अमीन के यहाँ रख कर आए इसी में पाँच बज गए। साढ़े पाँच बजे हम डायमंड पहुंचे। फिल्म अभी चल रही थी।

सवा छह बजे खिड़की खुली। हमने बालकनी की बीस बीस रुपये की टिकट ली। उस दिन हमने 23 मार्च 1931 शहीद देखी बॉबी देओल वाली। फिल्म बहुत अच्छी थी। गाना देस नू चल्लो देस मांगता है कुर्बानियाँ कर्तार सिंह सराबा ने गाया था। भगत सिंह उन्हे अपना प्रेरणा स्रोत मानते थे। भगत प्रताप प्रैस में आज़ाद के साथ क्रांतिकारी आंदोलन में सहयोग करते हैं। फिल्म बीच में तीन बार बिजली जाने के कारण साढ़े नौ बजे समाप्त हुई। फिर हम साइकिल लेकर साइकिल रात भर खड़ी करने के लिए ले जा रहे थे। चाचा ने साइकिल किसी नियामत के भाई के घर खड़ी कारवाई। यूनानी दवाखाना के पास।

दस बजे के करीब हम मेले में थे। सबसे पहले हमने हवाई झूला दो दो रुपये में झूला। हमे लालच आ गया चाचा तो माना कर रहे थे पर हमारे कहने पर ही वह झूले। हमारे तो प्राण ही निकाल गए। लगता था अब गिरे अब गिरे। झूला बड़ा डांवाडोल हो रहा था। तब मुझे पता चला ज़िंदगी कितन्नी मूल्यवान है। यह मेरी ज़िंदगी का सबसे भयानक क्षण था अब तक का। झूला झूलने के बाद हम एशिया सर्कस देखने गए। वहाँ टिकट दस दस रुपये की थी। उस समय तीसरा शो चल रहा था। सर्कस बच्चे चला रहे थे। उनका प्रदर्शन लाजवाब था। बच्चे ही सर्कस में थे। बीच बीच में गाने पर लड़कियां छोटी छोटी नाच करती थी। सर्कस साढ़े ग्यारह बजे खत्म हुआ।

 उसी के पास मौत का कुआं चल रहा था। जिसमे कार और मोटरसाइकिल साथ साथ चल रहे थे। टिकट पाँच रुपये की थी पर हमने यह नहीं देखा। यही मलाल रहा। फिर हमने कोक पी फिर जाकर हमने ओपी सरकार का सड़ा हुआ जादू देखा जो डेढ़ बजे समाप्त हुआ। ज़ंजीरी दरवाजे के पास एसके सरकार का भूत महल था। फिर हमने चाय और सुहाल देश की मशहूर दुकान में खाये। घूमते घूमते दो बज गए। रात में फिर मेले में हमने इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान देखी जिसके यहाँ एरोप्लेन एक सौ पैंतीस रुपये का था। हमने नही लिया। हमने सारा मेला घूमा। हम मोटर साइकल पर भी बैठे तीन तीन रुपये में।

फिर हमने सोने की सोची। हम वहीं पाहुचे यूनानी दवाखाने के पास। पीसीओ के पास हमने पल्ली डाली। वहाँ एक बुड्ढा बाबा बैठा था। वह हमसे सवाल ऐसे कर रहा था की हम चोरी करने आए हों। हम साढ़े तीन पर सोने लगे। पर नींद न जाने पहले तो आई नहीं फिर पता नहीं कब आ गयी। फिर मैं साढ़े चार बजे उठ गया। रात भर कभी ट्रक, ट्रॉली, बैलगाड़ी जाते रहे। सुबह मैं जनरेटर की आवाज़ से उठ गया क्योंकि वह पास ही तीस मीटर की दूरी पर चल रहा था। हम सुबह उठे मुँह हाथ धोया और चल पड़े साइकिल उठाई फिर रास्ते में सारसो का तेल लिया और में चाचा वाली साइकिल पर, भाई संदीप एक पर।

हम छह बजे तक गाँव पहुँच गए। हमने देखा कि मम्मी वहाँ नहीं हैं हमने सड़क पर जाने का प्लान बनाया। रास्ते में बड़े आम के पेड़ के पास बारिश तेज़ हो गयी हम रुक गए। पर बारिश नहीं रुकी। हमने सोचा चलो चलते हैं भीगते भागते हम वहाँ पहुँच ही गए।

{अभी खत्म नहीं, आखिरी किश्त बची है । किश्त पिछली :वो जो गाँव जाना था , किश्त अगली : वो जो साइकिल से जाना था }

आवाज़ें..

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