मई 07, 2013

फ़ोन की लहलहाती खूंटीयों का उत्तर पाठ

मन तो कर रहा है अपना बीस हजारी फोन दीवार पे दे मारूँ। और फिर जो टुकड़े हो जाएंगे उन्हे उठाऊंगा भी नहीं। फोन होता किसलिए है। कम से कम वक़्त पड़ने पर किसी से बात की जा सके। किसी का फ़ोन आए तो बिलकुल उसी क्षण घंटी बजे। न के घंटेभर बाद उसपर पैबंद लगते ‘छूटी कॉल’ के एसएमएस आएं। मतलब तब फ़ोन सिर्फ डिब्बे में तब्दील हो जाता है जब उसके मूलभूत प्रकार्य भी उससे संभव न हो सके। उसकी सारी ‘स्मार्टनेस’ धरी की धरी रह जाती है। जब आपका सेवा प्रदाता ‘एमटीएनएल ’हो।

यह कोई एक दिन में उपजा ज्ञान नहीं है। भईए पाँच साल से भी ज़ायदह का अनुभवजनित ज्ञान है। हालत तो यहाँ तक पहुंची हुई हैं के इतनी बड़ी छत होने के बावजूद हफ्ते दो हफ़्ते में वह जगह खुद तलाशनी होती थी कि कहाँ फ़ोन से सिग्नल टकरा रहा है। तब कोई मैसेज उसके दक्षांश अक्षांश की सूचना नहीं दे पाता था। कब कहाँ से बात करते करते फ़ोन कट जाए फ़ोन धारक को पता ही नहीं चल पाता। पर जब कट जाता है तब सोचता है घंटे भर पहले तो इसी बक्से पर चढ़ उससे बात की थी।

कल ही संचार हाट पर एक विद्वान टकर गए। लगा गलत जगह हैं। उन्हे तो कोर्ट में प्रैक्टिस करनी चाहिए। बोले देखिए बात दरअसल यह है के हम तो उतनी फ्रिक्वेन्सी पर फ़ोन चला रहे हैं जितने पर सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट है। आप तो देख ही रहे हैं कितना रेडिएशन मोबाइल टावरों से हो रहा है। कैंसर के केस बढ़ गए हैं। और रही बात प्राइवेट कंपनियों फ़ोनों की तो साहब जिस दिन कोर्ट का डंडा चलेगा उस दिन सब बंद। मतलब सत्ता पक्ष की जो मोबाइल सेवा हैं उनकी भागीदारी गौरैया के विलुप्त हो जाने में नगण्य है। क्योंकि जब टावर होंगे तभी सिग्नल पकड़ेगा। तभी नीचे के माले पर भी फ़ोन की घंटी बजेगी। तभी रेडिएशन होगा। तभी कैंसर की संभावना बढ़ जाएगी। मतलब एक तो इतनी लचर सेवा उसपर परम तार्किक हो जाने के खतरे।

किसे नहीं पता है के यही वह सत्ता के गलियारे हैं जो ‘स्पेक्ट्रम’ औने पौने दाम में बेच किनारे हो चुके थे। लगातार सेना पर दबाव बनाया जा रहा था के वह अपने हिस्से की तरंगों में कुछ ढील करे। इस देश के नागरिकों के हिस्से पड़ने वाला संसाधन कैसे बंदरबाँट का मौका लेकर आया था। किसे नहीं पता के इस दिल्ली के बाहर ‘बीएसएनएल’ क्या खेल खेलता है। दुर्गम से दुर्गम स्थानों पर उसकी उपस्थिती व्याप्ति सत्ता के उपकरण के रूप में अगर ढीली हुई है तो उसकी अर्थशास्त्रीय, समाजशास्त्रीय व्याख्याएँ क्या कह रही हैं।

अभी केरल के ‘रेन फॉरेस्ट’ की बुकिंग देख रहा था। जिन भी रिज़ॉर्ट की वैबसाइट खंगाली वहाँ किसी ने भी इस सरकारी उपक्रम का नाम नहीं लिया। वहाँ या तो ‘आइडिया’ है या ‘वोडाफोन’। देश में जितने भी सर्कल हैं वहाँ क्या स्थिति इसके उलट है? बिलकुल नहीं। बल्कि खुद वह अपने आपको लगातार पीछे खींच वहाँ निजी सेवा प्रदाताओं के लिए जमीन बनाई जा रही है। कि सरकार या ऐसे किसी तंत्र कि वैधता से लगातार खिलवाड़ किया जाये कि जिससे कि ‘उपभोक्ता’ इनके खंबों से परेशान होकर खुद ही खिसक जाए। वहाँ अगर बिजली न होने को बहाना बनाया जा रहा है तब क्यो किसी ‘एयरटेल’ कि खूंटी सबसे जादा दिखाई पड़ती है।

इसे दूसरे रूप में भी देखने कि ज़रूरत है के जिन खेतों में उनके बड़े-बड़े टावर अढ़री की बालियों की जगह लहलहा रहे हैं तो क्यों। जो काम सरकारी उपक्रम नहीं कर रहा उसकी अनुमति उन प्रदाताओं ने कैसे प्राप्त की। अपने आप को लगातार ‘अविश्वनीय’ करते जाना इस रूप में भले अल्पकालिक लाभों को सृजित करे। पर एक स्वस्थ्य लोकतन्त्र का निर्माण करने में उसकी भी एक अपरिहार्य भूमिका है। जिसे बारीकी से धूमिल किया जा रहा है।

लगातार सार्वजनिक प्रतिष्ठानों की साख का गिरते जाना कभी भी उस ‘जनहित’ में नहीं होता जिसे मुखौटा बना उसे रचा जाता है। फिर बिजली से लेकर पानी सबको निजी हाथों में सौपने के नए दरीचे खोले जाएंगे। इन अव्यवस्थाओं से उपजा असंतोष उस तंत्र के प्रति जुगुप्सा ही निर्मित करेगा। सवाल है सरकार किस कीमत पर अपने निकम्मेपन को सहर्ष वहन कर रही है। यह हमें उसी गली में ले जाएगा जहां होगा यही के जो धनपति हैं उनके पास विकल्पों की लंबी फेहरिस्त होगी और जिसकी फटी जेब है वह बस उन पाँच सितारा अस्पतालों के चमकते शीशे से डरता रहें। कि इतने महंगे चिकने फ़र्श पर अपनी गंदी टूटी चप्पल कैसे धर दे।

आवाज़ें..

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