मई 08, 2013

परसो रात की अधूरी पोस्ट..(कुछ लेने न लेने के बीच)

शाम लौटा तो पता नहीं बैठने का मन नहीं हुआ। लगा कुछ है जो अभी भी चल रहा है। अंदर ही अंदर। कई फ्रेम एक साथ आगे पीछे हो रहे थे। चकरघिन्नी की तरह घूम रहे थे और उनके हाथ लगा एक लट्टू मैं था। धूप कुछ ज़यादह ही थी। सीधे खोपड़ी को चीरती हुई। अन्दर तक धँस जाये। पर तब भी चलना तो था। चल रहा था। शुरू हुआ था मेट्रो ट्रेन के डब्बे से।

दो लड़के। दोनों साथ-साथ बैठे थे। एक के हाथ में कोई बड़ा सा 'सैमसंग' का टचस्क्रीन फोन था। और शायद 'वॉट्स ऐप्' पर किसी लड़की से बात कर रहा था। ऐसा इसलिए लगा क्योंकि वो जो दूसरा था बीच-बीच में ऊपर बीत गयी लाइनों को पढ़ कभी अपने उस दोस्त को कनअँखियों से देखता और देख मुसका देता। या फिर थोड़ी देर बाद जब गाने से ऊबता तब फिर फिर यही क्रिया दोहराता। उसका ऊबना कहीं दोनों की बातों का बहाना तो नहीं था। बहरहाल।

इस दरमियान अपन खुद उधेड़बुन में लगे हुए थे। पढ़ने के लिए कौन सी किताब दें। लड़की को कुछ देने की भी सोची तो किताब!! दिक्कत क्या थी। कि कुछ लड़की को देना है। या हम उस समय में लड़की के लिए कुछ लेने की सोच रहे हैं जहाँ 'किताब' किसी मीना बाज़ार की ड्रेस या हाईटेक मोबाइल फोन या तनिष्क की पाँच हजारी एअररिंग के मुकाबले कहीं पिछड़ी आउटडेटेड सी चीज़ है। या मेरा ऐसा सोचना खुद को हीन भावना से भर लेना है। या कोई तीसरा तर्क। कोई जवाब नहीं मिला। बस दिखी अपनी जेब। उसमे चिल्लर की तरह पड़े कुछ नोट। जिनसे अपने आप को आसानी से साहित्य अनुरागी कहलवाया जा सकता है और उन व्यवस्थाओं के प्रति मुखर प्रतिरोध भी किया जा सकता है। कमज़ोर का सच्चा साथी। उसका विचार।

एकबारगी मेट्रो में चढ़ने से पहले तो मन यह भी हुआ के फोन करता और कमला नगर जाता। लड़कियों को लड़कियों के बारे में जादा पता होता है। पर तब तक पेपर निपट चुका था और मैं कैवलरी लेन की तरफ़ से माल रोड पहुँच रहा था। लगा ठीक ही किया जो फोन हाथ में लेने के बाद नंबर काट दिया। धूप में किन्ही मैडम के साथ निकलना ठीक नहीं। तुरत ख़ारिज। अगली बार। सोचेंगे नहीं। फोन कर ही देंगे। या वहीं खड़े हो जाएंगे। कमरे के बाहर। या उस बैंच पर बैठे पाये जाएंगे।

पता नहीं कैसे 'सतनाम स्टेशनरी' पर नज़र नहीं पड़ी। एक पैन तो ले ही लेता। जब 'अरुण वस्त्र भंडार' दिखा तो लगा वो दुकान तो टाउन हाल के पास ही थी। आज गायब कहाँ हो गयी। पीछे लौटा नहीं। लौटकर जाने का मन नहीं किया। पैदल था न। फिर चल कर इतना ही मुझे खुद आना पड़ता। इसलिए टाल गया। पर वहाँ जो लोग थे सारंग की तरह भिनभिना रहे हों जैसे। सड़क को खाली तो बिलकुल नहीं कह सकते। यही तो सीज़न है। खूब खूब शादियाँ हो रही है। ढेर ढेर झोले ढोये जा रहे हैं। बेखटके। रिक्शों पर बच बच बैठे निकल रहे हैं। और उचक उचक रिक्शे वाला उन्हे खींच रहा है।

अब खुद को मैं नई सड़क पर देख रहा था। क्या करने के आया हूँ। किताब लेने।नहीं लूँगा किताब विताब। शायद मेरे अंदर का साहित्य थोड़ी देर के लिए कहीं कूच कर गया। अब खाली हाथ जमा मस्जिद के बिलकुल तीसरे गुंबद के पीछे था। चावड़ी बाज़ार शुरू हो रहा था। वहीं सुदर्शन की दुकान पर तीस रुपये दिया केसर मिल्क बादाम वाली बॉटल ली। दिमाग जो गरम हो गया था उसे ठंडा कर रहा था। चल नहीं रहा था। ठहर गया था। उसका रेंगना भी बंद था। पर अब क्या। क्या दिया जा सकता है।यह सवाल उतना ही बड़ा था जितनी छोटी मेरी जेब।

पर उस फूल को भी ले जा सकता हूँ जिसे रोज़ गिरते देखता हूँ। उसकी कीमत कोई नही लगा सकता। देखा दिमाग काम करने लगा। सच कहूँ तो बड़ी जल्दी अपनी 'औकात' पर आ गया। कम धनी का दिल ऐसे ही तो सोचेगा..

सोच रहा हूँ..पता नही क्या..लिखने का मन नहीं है..

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...