मई 09, 2013

वो जो साइकिल से जाना था: किश्त तीन

इक्कीस जून शुक्रवार की चन्द्र्भान गाँव आकार हमे कहते हैं कि गिलौला चलोगे। हम तैयार हो गए। साढ़े आठ बजे हम वहाँ से चले। हम चले ही थे कि चंद्र को शौच लगा। वह पल के बाद वाले खेतों में करने बैठ गया और हम आगे बाग में उसका इंतज़ार कर रहे थे। फिर हम रत्नापुर पहुँचे। हमने वहाँ हवा भरी और गाँव गाँव के रास्ते हम नहर पर पहुँचे। मैंने ज़िंदगी में तावे नहीं देखे थे वो भी एक साथ तीन तीन। हम उसपर चढ़ गए। वह दो तीन मंज़िला तो था ही। हमने दो पर चढ़ कर देखा।

उस दिन खास बात यह थी की उल्टी हवा चल रही थी। हम पूरब की तरफ़ जा रहे थे और हवा भी पूरब की तरफ़ से आ रही थी। एक जगह से आठ पल पार करने पर गिलौला वाली सड़क आती थी। एक पल को पार करने पर लगता हम कितनी दूर आ गए। पुल तो पास लगते पर चलने पर पता चलता की कितनी दूर है। हम आरा मशीन पर रुके और हाथ पैर मुँह धोया। फिर चल पड़े। हम गिलौला साढ़े ग्यारह पर पहुँचे।

चंद्रभान को किरायेदार से पैसा लेना था छह सौ रुपया। उसने वहाँ पीपल के पेड़ की गर्दन तोड़ दी। वह किरायेदार बड़ा चालू था उसने कहा की रुपया कल दूंगा। बाईस को बैंक से रुपया निकलवाकर। तो हमें एक दिन गिलौला ही रुकना पड़ा। हम सदासिव तरफ़ निकाल पड़े। नहर के पल पर हमने बैठकर बड़ी बातें करी। राज़, जानी दुश्मन, जोड़ी नंबर वन आदि फिल्मों की। फिर रात को खाना खाया और फिर मामा की दुकान पर चले गए। साढ़े दस बजे घर पहुँचे। वहाँ पर डेढ़ रुपये का पान देते थे और डाली ज़्यादा डालते थे।

उसी रात को बारिश हो गयी हम टीवी वाले कमरे के बगल में गली के बगल वाले कमरे में सो गए। सुबह छह बजे उठे। बारिश के कारण सब जगह पानी पानी कीचड़ कीचड़। सुबह सौच करने एक पुराने भट्टे के पास गये। हम एक किलोमीटर ही दूर तो चले ही गए होंगे। बीच में सुबखा किसान कॉलेज था और इंडियन ऑइल पेट्रोल पम्प भी था। हम वहाँ से खा पीकर ग्यारह बजे चले। इस दिन साढ़े नौ बजे आशुतोष गोवारीकर का इंटरव्यू हैलो डीडी में आया था।

बहराइच में मुझे चप्पल भी लेनी थी। पहले हमने तेरह तेरह रुपये वाली लस्सी पी। कचहरी रोड पर। फिर पक्का तलाव के पास (चाँदनी स्टार चप्पल्स) दो जोड़ी चप्पल खरीदी। फिर हमने कहा चलो फिल्म की सीडी लेते हैं हमने नदिया के पार की सीडी तो उसी रात चलायी। फिल्म अच्छी थी। उसी दोपहर हम तीन साइकिल पर छह बहिनों को मेला दिखाने लाये। मेरी साइकिल पर के भाई की साइकिल पर दो, चाचा की साइकिल पर तीन। उन्होने मेले से बीस बीस रुपये वाली गुड़िया खरीदी, दो दो रुपये वाला गाड़ी वाला झूला झूला। और दो दो रुपये वाला ही इंडिक चलता फिरता सरकस देखा। जिसमे हम बड़े छोटे मोटे दिखते हैं। मेला देख लेने के बाद हमने चाट खाया। टिक्की दो दो रुपये की। उसी दिन पापा बीस को चलकर इक्कीस को आए थे।

तेईस को 'राज़' लगाने की बात थी पर भाभी और भईया में झगड़ा होने के कारण और बैटरी देर में लाने के कारण राज़ नहीं लगी। झगड़ा नीतू के साथ बीना को ले जाने पर हुआ था। यह हमारी गाँव में आखिरी रात थी इसलिए यह रात मैंने सड़क पर बिताई। और भाई ने गाँव में बिताई। रात को हमने अंताक्षरी खेली। संदेप और मैं तथा बीना और नीतू। वह हार गए फिर हमने भूत भूत खेला। पहले मैं और संदीप बने फिर वे। इसके बाद हमने खाना खाया और सो गए। सुबह उठा चक्की पर गया मंजन शौच किया चाय पी।

हम दो बजे घर से चले। उस दिन भोला मामा और मामी भी आए हुए थे। और खास बात यह की रीना यहाँ थी ही नहीं। तीन बजे हम तांगे से रोडवेज़ पहुंचे। बाबा भागते भागते हमसे मिलने आए। चार सवा चार बस चल पड़ी। साढ़े छह बजे लखनऊ तिरतालीस किलोमीटर रह गया था पर ड्राइवर ने हमें साढ़े आठ पर चारबाग पहुंचाया। हमने प्लेटफॉर्म पर खाना खाया। हमारा डब्बा एस-स छह था। दस बजे ट्रेन चल पड़ी और हम आठ बजे दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर पचीस को थे। 


{बकाया दो पीछे की कन्नियाँ ; पहली : वो जो गाँव जाना थादूसरी : तब जो मेला देखा था..}

आवाज़ें..

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