जून 03, 2013

अकेले हो जाने के बीच

सोमवार, ‎मई 13, ‎2013, ‏‎9:37:28 बजे 

रात पता नहीं कैसा कैसा हो रहा था। उन्हे बीतते हुए लगा जैसे मैं खुद को गलत समय पर गलत जगह पाने की बात से अंदर ही अंदर पनपे भावों से लगातार हारता जा रहा था। उन्हे लिख देने मेरे लिए शायद कुछ देर का बच जाना होता। पर नहीं। उस हारे दिल को संभाल पाना मेरे उतना ही मुश्किल होता जा रहा था जितना कि यह के कहीं भी अट नहीं पा रहा हूँ। मेरे हिस्से की साझेदारियाँ दूसरे बटोरे ले रहे हैं। या छिटक कर चली गयी हैं। कह नहीं सकता। उनमे खुद मेरे क्या भूमिका रही। नहीं पता। यह सब लगातार इकट्ठा होता रहा है अचानक हुआ। यह भी नहीं पता। या जान कर भी अंजान बन जाना ही ठीक होगा।

उन लगातार सालों में इधर के हिस्से वाली ऊष्मा अगर कम हुई है तो क्या उसकी ज़िम्मेदारी दोनों के हिस्से बराबर आती है या किसी के हिस्से में कम बेसी हैं। फिर वही पुरानी लाइन याद आई के..पता नहीं क्या लिखने जा रहा था। दिमाग में थी पर टाइप करने की दरमियानी में गायब।

यह कहना उस वक़्त तो बिलकुल फ़िजूल जैसा ही है के जब हम सात छह सौ किलोमीटर चलकर उनमे शामिल होने आए हैं तब हमारी तरफ वाला उत्तर दायित्व थोड़ा तो कम हुआ ही होगा। ऐसा लगना गलत भी हो सकता है पर यहाँ के दिन किसी तकनीकी यंत्र के साथ तो गुजारने आया नहीं हूँ उसकी सही जगह शायद यह है भी नहीं। वहाँ ये लोग नहीं हैं, इसलिए मैं यहाँ हूँ। अगर ऐसा मुझे लग रहा है तो मैं कब हसीन बहाना बन गया के मुझे टाला जा सक्ने वाला मान लिया गया। या यह सब उल्टियाँ यहाँ कर रहा हूँ उनका कोई मतलब है ही नहीं। ऐसा सोचे जाने के प्रस्थान बिन्दु के समय से।

क्या यह मेरे यहाँ का न होना अपना खेल रहा है। जहां मैं अजनबियों के बीच फंसी साँस की तरह हो गया हूँ। जहां खुद मेरे साथ मैं न्याय नहीं कर पा रहा हूँ। यह सब कह देना..

[इसके बाद भी बहुत कुछ लिखना था पर कई लोगों के एक साथ आने के बाद लैपटॉप बंद कर दिया था। जल्दी से। और तुमसे बात तो बीती रात हो ही चुकी थी ]

आवाज़ें..

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