जून 10, 2013

जहाँ कुछ देर सही हम अपनी किताबों से तो मिल सकें

विश्वविद्यालय का मूल चरित्र क्या है? क्या उसे यथा-स्थितिवादी होना चाहिए। प्रतिगामी होना चाहिए। निरंकुश होना चाहिए। हम कम से कम उस विश्वविद्यालय से यह अपेक्षा तो बिलकुल नहीं करते जिसका आदर्श वाक्य निष्ठा, धैर्य, सत्य को साथ लेकर चलने की बात करता हो। पर इधर लग यह रहा है ‘सत्यमेव जयते’ वाला मुहावरा यहाँ अपना रंग दिखा गया। उस आदर्श चित्र में ही इसके संकेत भी थे। वहाँ एक ‘विरासत पशु’ इंगित है। जिसका अर्थ हुआ दाँत दिखाने के और, खाने के कुछ और।

दिल्ली विश्वविद्यालय इधर चार साल के डिग्री प्रोग्राम को लागू करने के लिए अधीर होता दिख रहा है। शायद हम जैसे तीन साल की डिग्री से जो नौकरी नहीं लपक पाये वो इन चार सालों बाद बेलों पर अंगूर की तरह लटकी पायी जाएंगी। खैर, इसकी ख़बरें तो लगातार मुख्यधारा मीडिया और समानान्तर मीडिया में आ रही हैं। पर चुपके से एक बड़ी ख़बर को वहाँ से गायब ही कर दिया गया।

यदि हम विचारों का आदान प्रदान करना इन संस्थानों का एक मौलिक कर्म मानने की भूल करें तब यह अपेक्षा सहज ही ऐसे किसी संस्थान से होगी कि लगातार उसके लिए ‘स्पेस’ बनाएँ। पर आश्चर्य कि दिल्ली स्थित ‘पेस सेटर यूनिवर्सिटी’ इस विश्वविद्यालय में किताबों के लिए कोई जगह नही है। जो जगह थी भी उसे खाली करवा लिया गया है और अब वहाँ ताला लटक रहा है।

यह हमारी उन अभिरुचियों की तरफ इशारा कर रहा है जहाँ यह संस्थान मात्र परीक्षा पास करने के की टकसालों में तब्दील हो चुके है। उस खाँचों साँचों से अलग जो एक दुनिया और हो सकती थी उसके लिए अब वहाँ जगह नहीं है। आप पुलिस को हफ़्ता देकर सालों वहीं छात्रा मार्ग पर भेलपूड़ी बेच सकते हैं पर आप किसी बने बनाए ढाँचे के अंदर किताब नहीं बेच सकते।

यह आश्चर्यजनक है कि नॉर्थ कैंपस, ‘यूटिलिटी सेंटर’ स्थित स्पिक मैके का ‘हॉलिस्टिक फूड सेंटर’ और ‘यू-स्पेशल बुकशॉप’ दोनों को खाली करवा लिया जाता है और कुछ समय बाद खाने पीने की जगह भारतीय रेल के ‘आईआरसीटीसी’ को सौंप दी जाती है पर किताबों वाली जगह अभी तक अपदस्थ है।

जिन हिन्दी विभाग के उत्तर-आधुनिक विद्वान से हम पढ़े थे वे इस कैंटीन के पुनः उद्घाटन पर चाव से खाते पीते फ़ोटो खिंचवाते देखे गए थे। उन्ही को श्रद्धांजली देते हुए यह बात लिखने का मन कर रहा है -गुरु दक्षिणा देने में अंगूठा हाथ से जाने का खतरा है इसलिए श्रद्धासुमन- कि यह पूरा परिदृश्य एक ऐसे ‘पाठ’ का निर्माण कर रहा है जहाँ विचारों के लिए कोई नहीं खड़ा है जो ठीहे प्रायोजित थे भी उन्होने अपनी दुकाने या तो बढ़ा ली हैं या अब उनके ताक पर अब विचार नहीं पाये जाते।

यह सोचनीय स्थिति है के अब सीधे विश्वविद्यालय आगामी भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने का दंभ तो भरते हैं पर एक सिरे से चिंतन का अवसर देने वाले पैबंदों को भी उनकी जगहों से हटा लेना चाहते हैं। यह सिर्फ़ इन संस्थानों का पतन नहीं है अपितु वैचारिक रूप से खोखलापन है। जो इस समय की राजनीतिक आवश्यकताओं को भले पूरा करता हो पर आने वाले भविष्य में कमज़ोर दिमागों की एक बड़ी भारी फ़ौज इकट्ठी होती जाएगी। जो सोचने से लेकर जीवनशैली के स्तर पर समरूप होंगे। यह विविधता को बड़े बारीकी से मिटाना है। उन जातीय आग्रहों से खुद को वंचित करना है जो हमारी पहचान हो सकते हैं।

प्रायोजित रुचियों-अभिरुचियों के युग में आपका स्वागत है जहाँ आपसे जुड़े निर्णय आप नहीं करेंगे। कर पाने की स्थिति में होंगे ही नहीं। इन संकटों से बच पाने के लिए हम भी किन्ही खुराना जी को याद करेंगे। जो जुबली हॉल से लेकर मानसरोवर, ग्वॉयर हॉल तक हॉस्टल के कमरों में किताबों के साथ हाज़िर हो जाते थे। यह निर्णय हमे करना है कि हम किधर हैं। जिन जगहों को खत्म किया जा रहा है उन्हे वापस हम लोग ही बना सकते हैं। चलिये चलें क्रिश्चन कॉलोनी, विजय नगर, बंगलो रोड या आसपास कोई किराये की जगह देखते हैं जहाँ कुछ देर सही हम अपनी किताबों से तो मिल सकें।

{यह पोस्ट 'जनसत्ता में 'अठारह को आई है। जाते जाते एक गलती यह हो गयी के वो जो आदर्श वाक्य वाली बात है उसमे निष्ठा, धैर्य, सत्य की जगह ‘धैर्य’ और ‘विनय’ चला गया है। बाकी सब वही है। पीडीऍफ़ में पढने के लिए यहाँ चटकाएं और वर्ड के लिए इधर। }

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