जून 14, 2013

निपट अकेले खाली से ये दो दिन

गाड़ी अभी चली नहीं है, चलने वाली है। यह लिख अभी रहा हूँ पर कहूँगा नौ बजे के करीब। जब सच में ट्रेन की किसी बोगी में समेट अपनी अब तक की सबसे बड़ी रेल यात्रा पर निकलने को होऊंगा। गाड़ी धीरे से सरकना शुरू करेगी। पीछे छूटते जायेंगे ये बोझिल दिन। रातें भी कम अकेली नहीं थीं।

मुझे बीच में कहीं उतरना नहीं है। जहाँ तक वह जाएगी उससे भी एक सौ चालीस किलोमीटर आगे जाना है। कहाँ जा रहा हूँ अभी नहीं बताऊंगा, वापस आकर। ख़ैर, मुझे भी नहीं पता है यह सफ़र कैसा होने जा रहा है। शायद उन सबको पता नहीं होता होगा जिनका टिकट 'कंफ़र्म' न होकर 'वेटिंग' में जूझ रहा हो। अभी तक 'आरएसी' भी नहीं हुआ है। बस सोचे जा रहा हूँ के ढाई हज़ार किलोमीटर कैसे निकलेंगे।

पर पीछे बीते दो दिन छूटते जाने के बीच होने न होने की तरह थे। कुछ-कुछ इस बीतते दिन में अभी भी महसूस कर रहा हूँ। घर की सब चीज़ें वहीँ की वहीँ हैं। खुद घर भी वहीँ डटा हुआ है। पर परसो रात मन ट्रेन पकड़ कर पहले ही यहाँ से चलता बना। मुझे अकेला छोड़कर। बिलकुल निपट अकेला। तुम हो। पर पास नहीं हो। यही सोच और अकेला होता रहता।

कभी कभी लगता यह वह घर ही नहीं है जहाँ मैं परसों आया था। एक अजीब तरह की अफ़रातफ़री थी जो बड़ी धीमे से यहाँ वहाँ रेंग रही थी। उसमे मम्मी-पापा भाई-बहन चाचा-मैं सब थे। पर थोड़ी ही देर बाद ऑटो में बैठ सब मुझसे पहले चल पड़े। उसी क्षण मुझे कुछ लग तो रहा था पर वह तब तक सतह पर नहीं था। रात के खाने में परवर आलू की सब्जी थी। दसेहरी आम थे। अरहर की दाल थी। जो मुझे अगली सुबह दिखी जब धोने के लिए बर्तन उठा रहा था। सब्जी खराब हो गयी थी। दाल की तरह।

मैंने ही कहा था के थोड़ी दाल बचा देना पर खुद ही भूल गया। नौ बजे तो कुछ खाली खाली सा लगा। आधा घंटा बीत जाने के बाद आया के कुछ आवाज़े गायब हैं। टीवी पर कभी रवीश तो कभी अर्नब की तकरार के साथ हम सब भी बात करते करते खाना खा रहे होते थे। ऐसा पहले नहीं होता था। जब भी जाते कोई पीछे नहीं छूटता था। इधर कई सालों से हम इतने बड़े हो गए के छुट्टी मई जून में पड़ना कम होती गयी। जब वो होती तो हम कहीं बिज़ी रहते। हमारे पास वक़्त रहता तब छुट्टियाँ व्यस्त। सब कुछ गड्ड-मड्ड सा।

हम यह तो समझ रहे थे के छुट्टियों का शास्त्र बिगड़ रहा है पर कुछ कर न सके। अभी पीछे मई की ग्यारह तारीख से एक रात पहले ऐसे ही किन्ही भावों के बीच झूल रहा था। तब मैं यहाँ रह नहीं गया था बल्कि अकेले जाने वाला था। उस दफ़े भी टिकट कंफर्म नहीं हुई थी। वेटिंग लिस्ट छह तक आई और चार्ट बन गया। लग ऐसा रहा था के मैं कहीं ऐसी जगह जा रहा हूँ के वापस इन चीजों को कभी नहीं देख पाउँगा। या ऐसा कहूँ कि उन कमरों की आदत मुझे जाने से रोक रही थी। रोज़ सुबह उठकर कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं। सब काम अपने आप होते जायेंगे।

पर इधर यही काम नहीं हो रहा है। मैं यहीं हूँ पर फिर भी मन यहाँ लग नहीं रहा है। इन दोनों स्थितियों में क्या चीज़ बदली है क्या चीज़ सामान है कह नहीं सकता। ऊँगली मेरी तरफ़ आकर रुक जाएगी शायद। सुबह तो यह घर इतना सूना सा लगा के रिमोट उठाया और उसे किसी चैनल पर लगाकर चलने दिया। मेरा देखना ज़रूरी नहीं बस उस वक़्त कान तक समझ में न आने वाली आवाज़ दिल को थोड़ा बाँध कर रख रही थी। बिखरना हमेशा आसान होता है। मुश्किल है ख़ुद को जोड़े रखना।

अभी डायरी वहीँ उसी रात छत से नीचे आकर लेटने पर रुकी हुई है। आगे बढ़ी ही नहीं। कुछ दिन ही ऐसे थे के लिख ही नहीं पाया। बड़ी मुश्किल से तो यह भी लिख पा रहा हूँ। अभी पौने छह हो रहे हैं। एक घंटे बाद घड़ी थोड़ा और पास आ जाएगी और कहेगी चलो। इससे पहले वह कुछ और कहे दो तीन किताबें निकाल लाया हूँ। 'रात का रिपोर्टर' पिछली बार रह गयी थी। और अभी जब घर के दरवाज़े पर ताला लगा रहा होऊंगा, तब यह मुझे सबसे पास बुलाकर यही कहेगा जैसे; कि सबके साथ आना। मुझे भी अच्छा नहीं लगता, तुम सबके बिना।

आवाज़ें..

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