जून 27, 2013

हम पिंजरे में होते तब क्या तुम हमें भी गोद लेते


तब एयरसेल नयी-नयी कंपनी थी। उसे दिखाना था वह उन सबसे कुछ अलग है। उसने ‘टाइगर’ शब्द चुना। ‘सेव टाइगर’। उदय प्रकाश अपने ब्लॉग पर इसी शेर बाघ को लेकर दो ढाई साल पहले किसी की कविता को याद भी कर चुके हैं । इन वन्यजीवों का हम इन्सानों के रहमोकरम पर हो आना ही उस त्रासदी की शुरुवात है जहां से चिड़ियाघर की दीवार शुरू होती है।

दो हज़ार दस मार्च। हम ‘सरिस्का’ में थे। हमसे कुछ पहले मनमोहन सिंह यहाँ टहल आए थे। और बिलकुल उन्ही की तरह हमे भी कोई शेर नहीं दिखा। कतर्निया घाट से लेकर दुधवा नेशनल पार्क तक हलचल मची। खबर आई दो चार बचे हैं। उस कंपनी के दावे खोखले निकले जो चौदह सौ की गिनती को खींचखाँच कर दो हज़ार तक ले गयी थी। अब इधर उसने अपना पैसा आईपीएल की धोनी वाली टीम को प्रायोजित करने में लगा दिया है। और बराबर बता रही है के उसका भी बाज़ार बचा हुआ है।

आने वाली पीढ़ी के लिए इन्हे बचाकर रखने में जो दंभ है उसकी ध्वनियाँ भी हमारे हिंसात्मक समाज में गूँजती रही हैं। इसके शिकार और खाल को पहनने में जो पौरुष फूट फूटकर ओज की तरह बिखरा पड़ा है उसके लिए प्रेमचंद की कहानी ‘शिकार’ पढ़ने की ज़रूरत नही है।

जहाँ कई वैश्विक संस्थाओं की रोज़ी रोटी ही इन जानवरों के बचे रहने पर टिकी हुई हैं। वहीं इन सबके बीच बिना शोर शराबे के काम करते लोग दिखाई पड़ते हैं तब अच्छा लगता है। मैसूर चिड़ियाघर को किसी भी रूप में राज्य सरकार या केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता नहीं मिलती। यहाँ के अधिकांश जानवरों को मैसूर निवासियों ने गोद लिया हुआ है। आपको सिर्फ साल भर का ख़र्चा देना है और सारी जिम्मेदारी इनकी। जहाँ यह चीते रखे गए हैं उसी के बगल में एक बोर्ड भी लगा हुआ है। उस बोर्ड पर लिखा है ‘We are thankful to The Children Of Sri Rahul Dravid Former Indian Cricketer For Adopting Two Hunting Cheetahs From 3 july 2012 to 2 July 2013.’

वहाँ लोग इस जैसे लगे हज़ारों बोर्डों को अनदेखा कर बस चले जा रहे थे। शायद उनके लिए यह कोई गैरज़रूरी चीज़ रही होगी। फिर जब हर पिंजरे के साथ कई कई ऐसे सूचनात्मक बोर्ड लगे हों तब उनका पढ़ा जाना किए जाने लायक काम कैसे हो सकता है। या फिर यह उस टूरिस्ट बस वाले की दी गयी समय सीमा का दबाव जो टीवी पर हैवल्स का ऍड देखते हुए हुए महसूस नहीं होता। वहाँ बस एक जोड़ी बूढ़े माँ बाप ही तो चाहिए। गोद लेने को।

हम ऐसे समय में रह रहे हैं जहाँ हमारा ‘विकास’ हमे अपने जैसे दिखने वाली ‘स्पीशीज’ से जोड़े नहीं रख पा रहा है तब इन जानवरों की कोई क्या सुनेगा। जहाँ हम आसानी से ‘डार्विन के सिद्धांत’ की आड़ लेकर खुद को बचाते आए हैं। इस मॉडल में एक दिन वह ऍड भी बनेगा जब गर्भावस्था को स्टेटस सिंबल की तरह दिखाकर ‘प्रेग्नेंसी रिज़ॉर्ट’ अपना विज्ञापन करेंगे। यही वह जगह है जनाब जहाँ ऐश्वर्या के डिंब अभिषेक के शुक्राणुओं से मिले थे।

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