जून 28, 2013

तुम मैं और शाम के बाद

अभी शाम हुई नहीं थी। हो रही थी। उसका अंधेरा कुछ देर से मेरे अंदर जाये इसलिए भी छत पर जाकर बैठ गया। अकेला। किसी को उस वक़्त वहाँ होना भी नहीं चाहिए था। था भी नही। एक अजीब तरह की अफरातफ़री के बीच कुछ देर खुद से बात करना चाह रहा था। पर शुरू कहाँ से करूँ इसी उधेड़ बुन में कटता सा लगा। घड़ियाँ रुक नही गई थी। मैं रुक गया था। उन्हे कोई बोलता भी तब भी नहीं रुकती।

छत छत न होकर मेरा मन हो गयी जैसे। उसकी मुंडेर पर एक ईंटिया दीवार थी। कभी तो वह भी गायब। जैसे कुछ देर के लिए मैं भी हो जाना चाहता था। पर गायब हो न सका। या कहूँ, होने का मन था भी नही।

इन सारी बातों में जितने भी ‘थे’ हैं सब साल भर पुराने हैं। बिलकुल इसी दिन मैं वहाँ छत पर अकेला हो जाना चाहता था। कुछ देर के लिए था भी। आज न छत है, न मन वैसा हो रहा है। घड़ी तब नहीं रुकी तो अब क्या रुकेगी। पर उसकी रफ़्तार थोड़ी धीमी तो हुई ही है। ऐसा दिन में रात में शाम में कभी भी कई-कई बार लगता है। चाह कर भी उसके कान नहीं उमेठ सकता। सिर्फ़ इंतज़ार कर सकते हैं, कर रहे हैं।

यह जो ‘एक’वचन का ‘बहु’वचन में बदल जाना है, आज तक की मेरे हिस्से की सबसे कोमलतम अनुभूति है। उसके लिए दिल का कोई कोना नहीं पूरा दिल कम पड़ जाता है कभी-कभी। तब की रात है और आज का दिन है रोज़ थोड़ा थोड़ा तुम्हारे करीब होता आया हूँ। छिन भर के लिए भी भूला नहीं हूँ। हम दोनों को।

थोड़ी देर और बैठना चाहता था। उतना ही शायद तुम भी। क्या बात करते पता नहीं पर करते ज़रूर। कुछ तुम पूछती, कुछ मैं पूछता। कुछ तुम कहती, कुछ मैं कहता। कुछ-कुछ और पास आते-जाते।

एक दिन हम बिलकुल अगल बगल बैठे होंगे। तब किसी की पूछती आँखों को आँखों से कुछ बताने की ज़रूरत नहीं होगी। उन आँखों में तब सवाल नहीं, शरारत होगी। आज भी है पर तब उसे छुपाएंगे नहीं। डरेंगे नही। झिझकेंगे नही। बस तुम बैठी रहना। तुम्हारा हाथ हाथ में लेकर धीरे से चूम लूँगा। सब बस देखते रह जाएंगे। कह कुछ नहीं पाएंगे।

पर फिर ख़याल आता है दिन अभी कुछ दूर है। हम पास नहीं हैं। पास है फ़ोन। एक दूसरे की आवाज़ें। एक दूसरे के कान। उस कान में घुलती खट्टी मीठी यादें बातें। शामें। रातें। सब थोड़ी थोड़ी हैं। हर बार पहचान कुछ नयी बात से होती है।

बस इन दिनों में हमे कमज़ोर नहीं होना है। सबसे जादा मजबूत इन्ही दिनों में होना है।

उस दिन भी फ़ोन ही था हाथ में। नंबर मिलाया। उधर राकेश था। जितनी देर भी बात की उसका हासिल बस यही के अब दिन पुराने दिनों की तरह नहीं रहने वाले हैं। उनमे हम कुछ बदले बदले से होंगे। कह लेना चाहता था अपने अंदर की सब बातें। बे-तरतीब-वार। थोड़ी कही भी। फ़िर फ़ोन रख दिया।

मैं अभी भी वहीं था छत पर। के पता चला रवि आया है। चाचा के साथ। बड़े सालों बाद मिल रहे थे। बिलकुल इसी क्षण तुम सीढ़ियाँ चढ़ रही थी और मैं नीचे आ रहा था। इसके बाद दिमाग की नही दिल की सुनी। अब तुम्हारी सुनता हूँ। उस अदलाबदली में सबसे पहला काम यही हुआ। थोड़े-थोड़े एक दूसरे के पास रह गए हैं। अपने में कुछ कम, तुममे कुछ जादा।

उस दिन के बाद से लगता है, जितना तुम्हें जानता हूँ जानने लगा हूँ, उतना ही खुद से पहचान कुछ नयी हुई है। इसी नयी मुलाक़ात के नाम थोड़ा मैं, थोड़ी तुम।

कहना तो बहुत कुछ चाहता हूँ पर इस मीडियम की भी अपनी लिमिट है। उन बातों के लिए कलम वाली डायरी ही ठीक लगती है। कभी मौका लगा तो वही फ़िर पढ़ लेंगे। यहाँ अभी इतना तो कह ही सकता हूँ, ‘डिस्टप कर दिया म ड म..!!’

आवाज़ें..

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