जून 04, 2013

उधर अनाम दो दिन

दिन पहला: इंतज़ार

10:07 बजे, 15.05.2013
मुझे इंतज़ार करना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता। खासकर किजब इंतज़ार धूप में करना पड़े। इंतज़ार वहाँ पर अच्छा लगता है जब चारों तरफ़ हरियाली, शांत वातावरण, ठंडी हवाएँ चल रही हों।

मेरे भतीजे का मुंडन था मैं अपने परिवार के साथ वहाँ पर गयी हुई थी। मुंडन तक तो मुझे बहुत अच्छा लगा पर उसके दूसरे दिन से मुझे वहाँ पर बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। मैं यही सोच रही थी कि कितनी जल्दी शाम हो और मैं अपने घर जाऊँ। दिन भर मैं कभी बड़े फूफ़ा तो कभी छोटे फूफ़ा के घर मुस्कान के साथ राउंड लगा रही थी।

यही करते-करते शाम के चार बज गए। तब मैं और मुस्कान लूडो खेल रहे थे। फिर मेरी दीदी आई मेरे जीजा को घर ले जाने के लिए तो उन्होने कहा कि मेरा झोला फटा हुआ है। तो दीदी ने उनका झोला सिला। फिर पाँच बज गए। फिर भी मैं इंतज़ार नहीं कर पा रही थी कि कितनी जल्दी मैं अपने घर आ जाऊँ। फिर सवा पाँच बजे संदीप भईया ने ऑटो रुकवायी और हम सब असपे बैठ गए। फिर भी मेरा इंतज़ार खत्म नहीं हुआ। फिर हम सब घर पहुँच गए और मेरा इंतज़ार खत्म हुआ।

दिन दूसरा: मेरे मन की बात

01:10 बजे, 16.05.2013
कल रात से मैं यही सोच रही थी कि साढ़े आठ बजे मुझे स्कूल जाना है क्योंकि आज मेरा रिज़ल्ट निकालने वाला था। ये सोच कर कि मेरा रिज़ल्ट निकलेगा थोड़ा ख़ुश हो जाती थी और दुखी भी।

खुश इसलिए कि मेरा पेपर बहुत ही अच्छा हुआ था। और दुखी इसलिए कि हो जाती थी कि हर साल की तरह इस बार भी मेरे साथ बेईमानी न हो। ये मैंने महसूस किया है कि मैं चाहे जितना पढ़ूँ, कितनी भी मेहनत करूँ पर मेरा रिज़ल्ट अच्छा नहीं आता है। पता नहीं ये मेरे साथ ही क्यूँ होता है।

मैंने कई कंपटीशन के पेपर दिये हैं और नवोदय के पेपर को छोड़ के मेरा सारे पेपर में नाम भी आया है। नवोदय के पेपर में मैंने कितनी तैयारी की थी ये में और मेरे घरवाले ही जानते हैं। लेकिन फिर भी मेरा नाम उसमे नहीं नाम नाम नहीं आया। यहाँ तक कि मैं नवोदय में पहुँचने के बाद जब तक कि पेपर शुरू नहीं हुआ तब तक मैं पढ़ती ही रही। मैं आज भी नवोदय की किताब देखती हूँ तो मैं दुखी हो जाती हूँ। और कोई मुझसे पूछता है कि तुम्हारा नाम आया तो मैं नही का जवाब दे देती हूँ। पर बाद में जब मुझे अपना नहीं का जवाब याद आता है तो मैं रो पड़ती हूँ।

सोचती हूँ कि काश मेरा जवाब हाँ होता। पर जीतने भी पेपर में मेरा नाम आया है मैं उन पेपरों के पुरस्कारों को देख उत्साहित हो जाती हूँ। 

आवाज़ें..

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