जून 25, 2013

जब हम वापस आते थे, तुम्हे देखते थे

फूल हमें तुम्हारा नाम नहीं पता

जून ख़त्म होने वाला है और बरसात है के अभी तक दिल्ली पहुँची नहीं है। पर पहले ऐसा नहीं होता था। उनका होना न होना कहीं न कहीं हमें भरता है तो खाली भी करता है। उन सबमें कुछ चीजें अभी भी वैसे ही हो रही हैं। उनको स्वाभाविक मान हम टाल नहीं सकते। बस ऐसा लगता है के सिर्फ़ देखते रहने को अभिशप्त हैं।

इस तस्वीर में जो फूल है उसका नाम नहीं मालुम। पर बचपन से इन्ही दिनों गाँव से छुट्टियों के बाद लौट इनसे मिलते थे। अब इधर मुलाक़ात थोड़ी मुश्किल से होती है। थोड़े हम बिज़ी हो चले हैं, थोड़ी इस मौसम की काहिली खून में घुस गयी लगती है जैसे।

जिस जगह यह आज है वहीँ कल भी था। तभी से देख रहे थे। बस इसके कुछ संगी साथी पास ही जाली में लगे हुए थे, उनका रंग थोड़ा अलग था; वो ऐसे भी थे और थोड़े लाल-लाल गुलाबी से भी थे। बारिश की बूंदे बरस जाने के बाद भी यहाँ रुकी रहती। हमारा इंतज़ार करती। उनको छू भर लेने से जो ठंडक मिलती उसे इधर मिस कर रहे हैं। हम सब। जो इसके नीचे खड़े हो जाते और हममे से एक उसकी टहनी को हिलाकर उन छोटी नाज़ुक बूंदों को फिर से बरसाते।

इधर महीने तो वक़्त से आते जाते रहे रहे हैं। खुद यह फ़ूल वाली डांड़ पूरे साल अपने को सुखाये रहती है। माली इसको छेड़ता नहीं है। ऐसे ही रहने देता है। उसे पता है यह अखुआएगी। और हर साल हर बार यह हमें निराश नहीं करती। बताती है, इसमें अभी जीवन बचा है। ऐसा करके वह थोड़ा हमें भी बचा लेती है। अभी दो महीने बाद अगस्त आएगा, शायद तब हम फिर इसे वैसे ही देख पायें। पर..पता नहीं क्या..

हम सब बचपन से देखते तो आ रहे हैं पर इनके लिए कुछ कर नहीं पाए। क्या करना इसका कोई कच्चा ख़ाका भी नहीं है। बस यही घूमता रहता है कि बागबानी कैसे परम्परागत थाती है और उसका हस्तांतरण माता पिता अपने बच्चों तक करते हैं। समझ में थोड़ा थोड़ा आता भी है। तब भी यह सवाल वहीँ का वहीँ है के इसे ज्ञान की वैधता क्यों नहीं मिली। जिनके पास यह ज्ञान परम्परागत रूप है या था तब उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि इतनी पिछड़ी कैसे रह गयी कि दिल्ली की गलियों कॉलोनियों में सायकिल भाँजते, दो अदद पैर, सुबह सुबह पीछे झउआ बांधे फिरते हैं। सच कहूँ तो इसका जवाब उन फूल पौधों की नर्सरियों में छुपा है जिनके मालिक सुजान सिंह पार्क जैसे इलाकों में भी ज़मीन वाले बने रहे और उस वर्ग को अपने यहाँ बतौर माली तनख्वाह देते रहे हैं।

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