जून 07, 2013

शायद इसके बाद हम कुछ नए होकर मिल सकें

खुद नहीं पता है क्या लिखने बैठा हूँ। जैसे ही कमरे का पंखा बंद किया है पसीना बहने लगा है। खिड़की से हवा तो आ रही है पर वो नाकाफ़ी है। बेचारी। दिल्ली लौटे आज एक हफ्ते से एक दिन ज़ायदह हो गया। मज़ा बिलकुल भी नहीं आ रहा। बोरियत भरी दोपहरें हैं। उनमे बस कमरा बंद कर सोया जा सकता है। और वही कर भी रहा हूँ। बाहर झुलसने से तो कई गुना दिमागदारी वाल फैसला है।

इस गर्मी में दोस्त बुलाएँ तो भी बाहर न निकलूँ। निकल नहीं भी रहा था। पर आया बीता इतवार। चार चालीस के करीब। कहने को तो दोस्त है पर इधर से ‘हैलो’ बोलते ही गाली कान को छूती दिल में धँस गयी। धँसी इसलिए नहीं कि यह श्रीसंत के स्पॉट फिक्सिंग में गिरफ़्तार होने जितनी अप्रत्याशित घटना थी। बल्कि इसमे मेरी भूमिका गुरुनाथ मयप्न जितनी भी नहीं दिख रही थी। पर गाली थी। दी जा चुकी थी। इसके पीछे आत्मीयता, निकटता, बंधुत्व वाला नुक्ता समझने का मन नहीं हुआ। बहरहाल।

मैं कहाँ जाता हूँ, किन लोगों से मिलता हूँ, कितना समय निकाल लेता हूँ, इस गर्मी में भी बाहर पाया जाने लगा हूँ; इस पर इनकी नज़र बराबर बनी हुई है। और इन सबमे उनकी मदद कर रहे हैं मार्क जुकरबर्ग। फ़ेसबुक पर अपना भी एक अदद अकाउंट हैं। उस बस्ती में अपनी भी रिहाइश है। इसी तुर्रे पर वे थोड़ा अर्थशास्त्री होकर बोले कि उन मुलाकातों कि ‘अवसर लागत’ हम लोग हैं। तुझे हमसे मिलने के लिए सोचना पड़ता है और देख कैसे उस शाम सेंट्रल पार्क घूम रहा था।

फिर तरकश से एकलव्य का एक और तीर निकलता है। छलनी कौन हुआ पता नहीं। पर तब तक उसका अँगूठा माँगा जा चुका था। विद्वत जन कहाते हैं कि आज भी इसलिए आया हूँ क्योंकि फोन पर उस शाम उक्त व्यक्ति के साथ वाली बात कहीं लग गयी होगी। मतलब मिलने जाओ तब भी परेशानी। न मिलने जाओ तब भी। मुझे पता है दोनों कई दिनों से घेरने की तय्यारी में लगे होंगे पर टलते-टलते मौका हाथ भी लगा तो दो-ढाई घंटे। इसमे तो मज़मून भी नहीं पढ़ा जाता। आगे की तो क्या कहें।

साफ़-साफ़ फिर कहे दे रहा हूँ मुझे मेरे ‘पर्सनल स्फेयर’ में किसी की भी आवाजाही नहीं चाहिए। तब तो बिकलूल भी नहीं जब मेरी मर्ज़ी न हो। पर नहीं तुम मानने वाले कहाँ थे। आदत जो ठहरी। अगर दोस्ती बराबर की साझेदारी है, उसमे जीतने तुम हो, उतना ही मैं हूँ; तब क्यों लगातार इन मुलाकातों में छिझता रहा हूँ। महसूस तो ऐसा ही हुआ मुझे। कि मेरा इंतज़ार सिर्फ़ कुछ देर की खींचतान से जादा आगे नहीं बढ़ पाता। टाइमपास की ‘भेजा फ्राई’ ने जो नयी व्याख्या दी है उसी के इर्दगिर्द। पर दोस्त कितनी बार विनय पाठक की भूमिका निभाऊँ। और तब तो और जबकि मुझे पता है के मेरे साथ क्या होने वाला है।

तुम मेरे मोबाइल न दिये जाने के कारण कुछ जादा ही आहत हुए लगते हो। बाद में दूसरे की ‘वॉल’ से कह रहे थे ‘हम किसी की सामाजिक प्रयोगशाला के यन्त्र नहीं हैं जिन पर प्रयोग किया जा सके’। तो मियाँ मिट्ठू किसने कहा कि होने दो। पर जब एक बार, दो बार, चलो तीन बार माँगने पर भी मैं अपना मोबाइल नहीं दे रहा हूँ तब उसकी टीका करने की ज़रूरत क्या थी। एकबार फिर कह रहा हूँ के जो दिखाया नहीं जा रहा है उसको लेकर तुम्हारा हठ कभी-कभी कोफ़्त से भर देता है। बार-बार वही पैटर्न। थोड़ा तो परिपक्व हो जाओ। अब ‘मच्योर’ नहीं होगे तब कब।

इसमे तुम्हारे आत्मसम्मान को ठेस भी लग गयी। इतने पर भी तुम रुके कहाँ। तुम भले मेरे दोस्त हो। पर जब मना कर रहा हूँ, तब उसे भी समझाने की ज़िम्मेदारी भी क्या मेरी है। कहने लगे के आगे से हम भी इसे कोई तस्वीर नहीं दिखाएंगे। न इससे खिंचवाएंगे। तो साहेबान आज तक जितनी भी तस्वीरें इस फोटो-खींचक ने उतारी हैं उनमे बराबर की सहमति तुम सबकी भी उतनी ही थी, जितनी मेरी। इसमे छिपाने-दिखाने वाली बात आनी ही नहीं चाहिए थी।

वैसे कहना नहीं चाहता था पर अब बात आई है तो कह दूँ उस ‘सोश्ल नेटवर्किंग साइट’ पर तुमसे जादाह ‘पर्सनल’ हूँ। ढाई तीन हज़ार तस्वीरें ऐसे ही वहाँ मौजूद नहीं हैं। और बताओ कब तुम्हारे कहने पर तुम्हारी तस्वीरों की ‘प्राइवेसी सैटिंग’ चेंज नहीं की हैं। उस मोटे के एकबार कहे पर वहाँ से फ़ोटो डिलीट नहीं की। तुम कह तो ऐसे रहे थे जैसे हमारी दोस्ती इसी शर्त पर हुई थी कि हम अपनी फॅमिली फ़ोटो एल्बम छमाही छमाही दिखाया करेंगे।

क्या कभी-कभी तुम्हें मेरी तरह ऐसा तो नहीं लगता के गलत पात्र से दोस्ती गाँठ ली। या कभी समझने की कोशिश की है के हम सब एक दूसरे को समझने में लगातार विफल हो रहे हैं तो इसका कारण क्या है। या समझना ही कौन चाहता है। टूट रहा है, उसे टूट जाने दो। कोई फ़र्क नहीं पड़ता। तभी मैं बार-बार वहाँ आना टाल रहा था। मुझे पता है पीछे हमारे बीच बातें कम हुई हैं। वे सिमट रही हैं। उनमे सिर्फ़ और सिर्फ़ दोहराव है। जो उमंग उल्लास प्रीति आनंद होना चाहिए वह ख़त्म हो रहा है। शायद इसे ही ठहराव कहते हैं। जो हमारे बीच आ रहा है। फ़िर यह भी लगता है इसमें से स्वभाविकता कम हुई है जो इसे सहज नहीं रहने दे रही। वहाँ आकार मैं असहज नहीं होना चाहता था। पता है हम छूट रहे हैं। लगातार। बिन बताए।

तभी लिखा था कि ‘लगता है इधर कई दोस्तियों का स्थगन काल कुछ लंबा चलेगा’। शायद इसके बाद हम कुछ नए होकर मिल सकें। पर अपने इस कहे को बदलूँगा नहीं। मैं किसी भी सामजिक बंधन के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। बशर्ते मेरी मर्ज़ी न हो। जिसे जो कहना है कहता रहे। कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अब तो बिलकुल भी नही।

आवाज़ें..

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