जुलाई 06, 2013

वाया जुगाली: दो महीने से विलंबित रचना प्रक्रिया

अभी सुबह उठा तो पता नहीं नज़र, छिप गयी डायरी, पर चली गयी। बड़ी देर तक याद करता रहा के आखिरी बार कब लिखा था। याद आना था नहीं, याद आया भी नहीं। इस छिप जाने को वरीयता क्रम में नीचे हो जाना भी समझा जा सकता है। बिलकुल वैसे ही जैसे इधर दिल्ली विश्वविद्यालय दूसरी तीसरी कटऑफ आते-आते नब्बे प्रतिशत वालों की साँसे भी फूलने लगें, तब यूपी बोर्ड वालों को पूछता कौन है। खैर।

डायरी उठाई। पन्ने पलटे। दिन रात उंगली पर गिने तो नहीं पर अंदाज़ लग भर गया कि आने वाली ग्यारह को दो महीने होने वाले हैं। दिल्ली से कूच करने की पहली तारीख़। इस पर पैबंद लगाने की गरज से ही पाँच रुपये वाली छोटी पतली सी कॉपी बैग में रख ली थी कि रास्ते में लिखेंगे। पर क्या ख़ाक लिखा।

इधर याद्दाश्त के हालचाल कुछ यूं है के दिन पुराने पड़ने लग गए फिर भी कुछ कागज़ पर उतरा नहीं। हाँफता-हाँफता थोड़ी देर रुक भी जाऊँ तो लौटकर लिखे आठ पन्ने दिखाई देते हैं। उन्हे भी दस बारह दिन की कई-कई शिफ़्ट में लिखा था।

पता नहीं समझ नहीं पा रहा हूँ के ऐसा क्यो हुआ होगा। शायद उन दिनों की आपाधापी में कागज़ पर लिखना इस लैपटॉप पर लिखने से जादा मुश्किल लगा होगा। सोचा होगा बार-बार स्याही भरने से तो अच्छा है ‘वर्ड’ पर लिख मारो। मेज़ पर पसीने की चिपचिप से भी छुटकारा। फिर एक सहूलियत यह भी के यहाँ लिखे को सीधे ब्लॉग पर पेस्ट कर सकते हैं। कौन पहले कागज़ पर लिखे फ़िर उसी को दोबारा टाइप कर वहाँ शाया करे।

पर देख रहा हूँ वहाँ जितनी भी आपाधापी रही हो, यह इस सहूलियत से जादा दिल्ली की काहिली ही लगती है जो खून में दाख़िल हो गयी है। वरना कागज़ पर लिखे की बात ही कुछ और है।

ब्लॉग पर चाहकर भी कुछ बातें कह नहीं सकते। या कह तो दें पर उसके अपने ख़तरे हैं। इन्हे ख़तरे न भी कहने का मन हो, तब भी, फ़ोन की घंटियाँ बजने लगती हैं। खुली किताब होने का मन होने पर भी कुछ तो रह ही जाती हैं। पर डायरी के साथ ऐसा नहीं है। वो तो सिर्फ़ ‘हमारे’ लिए है। ‘एक्सट्रीम पर्सनल’ होने की हद तक। कुछ कोनो अंतरों की हद तक यहाँ भी हूँ, पर उतना नही।

दोबारा ऊपर से नीचे दो-तीन साँस में पढ़ गया होऊंगा। लग रहा है अपना लिखने का स्टाइल भी कुछ कुछ पॉलिटिक्स की तरह होता जा रहा है। मुद्दे को सेंटर ही न करो। वापस ट्रैक पर आने की कोशिश।

किसी मुकम्मल तरीके से दिन की शुरुवात न होकर एक ही तरह से रोज़-रोज़ उठना। उसके बाद खुद दोपहर में रात की नींद पूरी करने की जद्दोजहद में पिल पड़ने की दरमियानी में कोई लिखे तो लिखे कैसे। खाओ, हग्गो और सोओ। इन तीन ही क्रियाओं के इर्दगिर्द घूम रहे हो जैसे। जैसे तीनों आपस में गड्डमड्ड हो गए हैं। कब कौन पहले है इसे सुलझाने के चक्कर में ही दिन खल्लास। सच में दिन इस सूत्र के इर्दगिर्द ही अपने को गुंफित कर इस कदर छाया हुआ है के निकल ही नहीं पा रहा।

ऐसा नहीं है कि पूरे दिन सुषुप्तावस्था में ही रहता हूँ। खूब-खूब सोचता हूँ। पर सिर्फ़ सोचने से क्या हुआ है आज तक, जो अब होने जाने वाला है। पर अपन थोड़ा दूसरे तरीके से सोचने वालों में से हैं। कहते हैं सोचना कुछ करने से पहले की पूर्वपीठिका है। पहली सीढ़ी है। और ऐसा नही है, हमने नही सुना। हमने भी वो चुट्कला सुना है। कई बार सुना है। बाबर ने हिंदुस्तान पर पहला कदम रखने के बाद क्या किया। कॉमन सेंस। दूसरा क़दम रखा। नहीं तो बेचारा, कब तक, एक ही पैर पर खड़ा रहता। गिर नहीं जाते मियाँ।

इसलिए नर हो, न निराश करो मन को। और नारी तू भी हमारे वाले ‘एडिशन’ में है। मैथिलीशरण गुप्त ने नहीं लिया तो क्या। हम बिलकुल तेरी बगल में खड़े हैं। साथ-साथ। चिपक के। सट के। 'सिड्यूस' तो नहीं कर रहे न हम तुमको!!

आवाज़ें..

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