जुलाई 14, 2013

मेरी दिल्ली में ग़ालिब नही

आसमान में बादल हैं। कुछ बरस भी चुके हैं। कुछ मौके की ताक में होंगे। यहाँ बारिश ऐसे ही रोते गाते आती है। पर नहीं, इस बारिश पर ‘नॉस्टेलजिक’ होने का मन नहीं हो रहा। उन यादों को फ़िर किसी दिन। इधर कल अख़बार से पता चला अपना इतने सालों से दिल्ली रहना एकबार फ़िर बेकार हो गया। प्राण यहीं बल्लीमारान के थे। उसी ग़ालिब वाले बल्लीमारान के। ग़ालिब की हवेली के कँगूरे भी इंतज़ार करते रह गए, पर आज तक हम वहाँ नहीं पहुँचे।

कई उनके दीवान को सिराहने रख सोते आह-वाह भरते रहते हैं पर सोचता हूँ इनके लिए पहले कुछ कुछ उर्दू को सिरे से सीखा जाये। सुनने में आ रहा है के कश्मीरी गेट वाली कोतवाली अब वहाँ नहीं पायी जाती। वहीं मोरी गेट के सामने सड़कपार कभी किसी ज़माने से ‘रिट्ज़’ सिनेमा हाल है। पीछे ‘था’ लगने की नौबत थी भी। पर अभी उसका भी ‘री-स्टोरेशन’ उसके मालिक में अपने दम पर करवाया। बिना किसी सरकारी मदद।

समझ नहीं आ रहा इतना गोल-गोल क्यों घूम रहा हूँ। कुछ काम की बात कर भी रहा हूँ या सिर्फ़ हवाबाज़ी? सोच रहा हूँ हमारा लोक कैसे निर्मित होता है। उसके उत्प्रेरक कौन कौन हैं। उसमे हमारी खुद की क्या भूमिका है। कोई भूमिका है भी या बस वह ख़ुद बना बनाया ‘रेडीमेड’ कहीं मिलता है। कौन कब कैसे इसका हिस्सा बनता है। कैसे दूर छिटक जाता है।

सीधे सीधे कहूँ तो क्या ग़ालिब मेरे लोक का हिस्सा हैं। अगर हाँ तब कैसे और न तो कैसे नहीं। सिर्फ़ दिल्ली में रहने भर से या चाँदनी चौक की तफ़री से हमारे ख़ून में थोड़ा बहुत गालिबाना अंदाज़ घुस गया हो। या लाल किले का ‘लाइट एंड साउण्ड’ शो देख कुछ कुछ शायराना हुए जा रहे हों। इश्क़ मोहब्बत ख्वाहिशों के हज़ारो हजार होने उनके अधूरे रहने पर कोई गज़ल गुनगुनाते दोस्तों ने पकड़ लिया हो।

इन सबमें से कुछ भी हमारे साथ घटित नहीं हुआ। तब सवाल उठना वाज़िब है कि यहाँ की मुख्यमंत्री कितना भी इस दिल्ली को ग़ालिब की कहती बताती रहें, दोस्त लोग कितने ही शेरों से फ़ेसबुक की दीवारें पाट दें, दूरदर्शन किन्ही नसरुद्दीन शाह को गुलज़ार कृत शायर दिखाते रहें, कोई संस्कृति मंत्रालय के पैसों से कितने ही प्रायोजित मुशायरे करवाते रहें, विलियम डेलरिम्पिल ‘सिटी ऑफ़ जिन्स’ लिख हमे इनकी दिल्ली वाला कहते रहें; वह आज अभी तक हमारे नही हो पाये हैं। कोई ऐसे ही चाचा नहीं बन जाता।

पिछले वाक्य की तरह यह जटिल प्रक्रिया है कि कैसे हमारी दिल्ली में ग़ालिब का होना ऐतिहासिक तथ्य तो है, उनकी पैदाइश की जगह खंडहर बनती इमारत की तरह आज भी मौजूद है पर वह मेरी तरह अपनी आज तक की सारी उम्र दिल्ली में बिताने के बाद भी ग़ालिब मेरे नहीं हो पाये।

शायद ऐसा कह कर मैं उस समानांतर चलने वाली प्रक्रिया को देख नहीं पा रहा हूँ जिसमे अपने हिस्से की अभिरुचियों के लिए ख़ुद भी आगे आना पड़ता है। उसके लिए कोशिश करनी होती है। यह सयास होता है। पर यहीं बड़ी बारीकी से उस तरफ़ को आड़ में कर देता हूँ, जहाँ यह अनायास है और हद दर्ज़े तक प्रायोजित भी। लगता है हम इसके शिकार हो गए। ख़ैर।

अगर थोड़ी खुराफ़ात कर इसे भाषा तक खींच लाऊँ और कहूँ के तर्जुमे के बाद भी ग़ालिब थोड़ा दूर लगते हैं तब उसी पल भाषा विमर्श उठ खड़ा होगा और तब सवाल ख़ुद मुझसे होगा कि मेरी भाषा कैसी है जिसमे ग़ालिब के लिए जगह नहीं। मैं ख़ुद किसी भाषा के साम्राज्यवादी एजेंडे के तहत मारा जाऊंगा। अभी किसी भी तरह से इस ‘सद्गति’ को प्राप्त नहीं होना चाहता। और पता है ग़ालिब और इंतज़ार कर सकते हैं। भले एक दिन मैं दिल्ली में न रहूँ, पर वह रहेंगे। पर अभी दिल्ली मेरी है और वो अभी यहाँ नही हैं।

आवाज़ें..

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