जुलाई 17, 2013

एक अश्लील एकालाप

यहाँ इस चेतावनी के साथ आगे बढ़ने की हिदायत दी जाती है कि पुलिहा संकरी है। साथ ही टुटही भी है। पलस्तर उखड़ गया है, ईंटें दिख रही हैं। जिसके चलते नैतिकता के पुतलों का कौमार्य भंग हो जाने के ख़तरे के साथ जान और माल का भी नुकसान हो सकता है। ऐसा किस तरह संभावित है, जानने के इच्छुक व्यक्ति, जिनमें समान रूप से स्त्री-पुरुष दोनों शामिल हैं, वह सब मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कसप’ के पेज नंबर एक सौ चौदह, ऊपर से उन्नीसवी, नीचे से तेरहवीं पंक्ति (राजकमल पेपरबैक्स, पहली आवृति: 2001) पर जाकर इस ज्ञान से परिचित हो सकते हैं। 

बहरहाल, अब काम की बात..

साला लड़की भगाने के लिए भी पैसे की ज़रूरत पड़ती है। फटी जेब में पैसा टिकता कैसे है, इस ज्ञान के बिना बिना गाड़ी एक दिन भी खिसकेगी नहीं। जेब में पैसे हो तो बहुत कुछ हो सकता है। बिन टिकट ट्रेन चढ़ टीटी को घूस देकर बच सकते हैं। कमरा किराये पर लिया जा सकता है। कुछ दिन एक वक़्त भूखे पेट रहने की नौबत नहीं आती। सब कुछ रूमानी सा लगता है। या फिर कुछ यूं होता के लड़की संग बंबई पहुँचते। पर करते क्या। हमारे खानदान के जातीय संस्करण ऐसे भी नहीं हैं कि ताज होटल वाले हमारे वंशानुगत वृक्ष के स्वाभाविक अंग होते। तो कुछ दिन खाने रहने की चिंता से दूर रहते। रात रंगरलियों में बीतती।

पर अगर इतना पैसा होता तब भागने का वाहियात खयाल भी नहीं आता। भागते तो वो हैं जिनके पास पैसा नहीं होता। जिनका पैसा उनकी जातियों को ढक नहीं पाता। फ़िर जो भागते हैं, उन्हे मारना पड़ता है। लड़की अकेली क्यों मरेगी। लड़का भी मरेगा। उनके ही परिवार वालों को कई-कई बैठकों के विचार विमर्श के बाद इस मर्मांतक निर्णय पर पहुँचना पड़ता है। लेकिन मेरी उमर के जो लड़के मरना नहीं चाहते, वह परिवार द्वारा सुझायी कन्या के संग हमबिस्तर होना स्वीकार लेते हैं।

इन सांस्कृतिक विवाहों में आर्थिक योगदान के फलस्वरूप जो दहेज़ मिलता है, उसके बूते लड़का अपने हनीमून के लिए किसी ऐसे स्थान का चयन करता है जो उसके सपनों का स्वर्ग हो। अधिकतर लड़कों के सपनों में ‘स्वप्नदोष’ होते हैं और कपड़ों का अभाव रहता है। इसलिए वह वहाँ जाता है, जहाँ उसकी पत्नी के अलावा अन्य स्त्रियाँ कपड़ों की न्यूनतम अवस्था में सरलता पायी जा सकें। जिन्हे देख उसके ब्याहता रात अंधेरे बंद कमरे में अपनी सामाजिक, दैहिक झिझक तोड़ उसके लिए खुद को समर्पित कर दे। भले उसकी इच्छा महात्मा गांधी के कथनानुसार संतानोत्पत्ति के लिए हर रात संसर्ग करना न भी रहा हो, पर पत्नी तो उसकी बाहों मे पायी ही जाती है। उसके मन की बात कैसे टाले। इसलिए कर लेते हैं। अगली रात नहीं करेंगे।

इस सबमे खुद को कहाँ रखूँ। रखने की ज़रूरत क्या है। अपनी तो चूलें ही हिल जाती। लड़की अपने साथ कितने गहने ला पाती। जिससे एक महिना दो महिना कोई आंटी किराये का कमरा दे भी देती और हमारा भाई बहन वाला बहाना चल भी जाता, फ़िर भी, हम उन रातों में किसी विज्ञापन कंपनी द्वारा अनुबंधित नहीं किए गए थे कि कमरे से आती पलंग की आवाज़ों को नज़र अंदाज़ किया जाए। कभी न कभी गर्भ-निरोधक के खाली छिलकों पर उनकी नज़र तो पड़ ही जाती। फ़िर इस मुसीबत से बचने के लिए अस्पताल पहुँचते। ‘कॉपर टी’ लगवाने की बात करते और तब वह लेडी डॉक्टर हमारा मैरेज सर्टिफिकेट माँगती तब क्या होता।

यहाँ यह बात साफ़ कर दूँ कि जितने भी साहसी लोग यहाँ तक मेरे साथ नीचे तक आये हैं, वह इन पंक्तियों से गुज़रते वक़्त, इन सब बातों को किसी भी तरह से इस ब्लॉग की ‘यूएसपी’ बढ़ाने का ‘मोदीय संस्करण’ मान बैठने की भूल न करें। हाँ, इस सबकी ‘फ्रॉयडियन सेटअप’ में कई-कई व्याख्याएँ हो सकती हैं। जिनमें उन दमित-अपूर्ण दैहिक इच्छाओं के पूरे न हो पाने के बाद बन गईं गाठों को देखा जा सकता है। पर ख़ुद इसे मनोविज्ञान से जादा, उस परिवार के निकट खींच लाना चाहता हूँ, जहाँ असद ज़ैदी की कविता ‘घर की बात ’ इंतज़ार कर रही है। उसकी शुरुवात होती है यहाँ से:
उस लड़के को स्वप्न में दिखते रहते हैं स्तन
उसके होंठ हिलते रहते हैं नींद में
जीभ कुछ चाटती रहती है

उसकी माँ समझती है
इसकी शादी हो ही जानी चाहिए
शादी की यही उम्र है
फिर जिम्मेदारियाँ आयेंगी तो यह नौजवान
अपने आप ठीक हो जाएगा
पर बात क्या सिर्फ़ इतनी सी है। लगता नहीं। यह स्त्री पुरुष के सहचर्य की परंपरागत अवस्था से कुछ जादा है। यह नाटकीय क्षणों में काव्योचित तर्क से विचित्र शब्द समूह प्रस्तुत करना नहीं है। कुछ है जो और भी मुझे कचोटता रहता है। उससे भाग नहीं सकता। मैं यह सोचकर भी संतुष्ट नहीं हो सकता कि कदाचित यह इसलिए हो रहा है कि मेरे मस्तिष्क में सहसा ‘मोनो एनीमो ऑक्सिडोज़’ नामक रसायन कम हो जाने से ‘सेरोटोनिन’ नामक रसायन बढ़ गया है और स्नायु पथों पर अवसाद गहरा उठा है।

बस नौकरी न होने की बात से इसलिए बच रहा हूँ कि इधर लगता है मैं उसे तीतर-बटेर की तरह इस्तेमाल करने लगा हूँ। फिर उसके बाद तो पता नहीं क्या क्या..

आवाज़ें..

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