जुलाई 20, 2013

रात, अधलिखा सपना, सपने में लौट आई मेज़, उस पर पड़ी डायरी और थोड़ी बारिश की बातें

रात के डेढ़ बज रहे हैं और मैं बाहर घूम रहा हूँ। छत पर। बिलकुल अकेले। मेरी परछाई भी साथ नहीं है। क्योंकि चाँद नहीं है। उसकी रौशनी नहीं है। उसे ढक लिया है बादलों ने। मैं उसकी तरह देखता नहीं। पर पता है। उसे ऐसा ही कर दिया होगा। बादलों ने। हवा और रातों की तरह ठंडी है। अँधेरा उतना नहीं है कि अपनी शक्ल नज़र न आए। पर साथ आईना नहीं है न इसलिए बता नहीं सकता कैसा लग रहा हूँ।

पता नहीं सपने में हूँ या क्या है। सामने लगा जैसे कोई खड़ा है। कोई एक नहीं। कोई दो। एक लड़का। एक लड़की। उस पेड़ की आड़ में। कभी उससे बाहर आ जाते। कभी छिप जाते। कुछ-कुछ एक दूसरे में समाते। तभी लौट आता हूँ। मेज़ के पास।

मेज़। जो कभी तरतीब से नहीं रही। बे-वजह किताबों से अटी पड़ी। बार-बार याद दिलाती। मैं बार-बार भूलता जाता। वो फिर याद दिलाती। मैं एकबार फिर भूल जाता। और इस याद दिलाने भूल जाने की कई कई किश्तों में वहाँ जमा होती रहती धूल। धूल में छिप जाते किताबों के नाम।

इसी पर पड़ी रहती है डायरी। दर्जन भर दिन बीत जाते हैं। कुछ नहीं लिखता। बस उसे नीचे पड़े दिन में एक दो बार देख लिया करता हूँ। पिछली तारीख़ का लिखा पढ़ लेता हूँ। और कुछ नहीं।

पता है पिछले दिनों हुआ क्या है जो लगातार इनसे दूर होता गया हूँ। मुझे खुद नहीं पता। कभी उनमे उनके कुछ न होने की बात याद आती है। कभी लगता है, किताबे वक़्त के उलट ठहर सकती हैं। जो नहीं ठहर सकती उनकी फिक्र में पतले होने से कुछ होना जाना नहीं। बस जो कर सकता हूँ वो इतना ही के चढ़ गयी धूल को झाड़ दूँ। कि दूर से ही नयी सी लगे। फिर न पढ़ने का कोई बहाना मिल जाएगा।

यह सब रात को ही लिख लेना था। पर बारह घंटे बाद लिख रहा हूँ। रात कोई घूमा-वूमा नहीं था। बस एक चक्कर काट लौट आया। लेट गया। नींद में एक सपना देखा। अभी नहीं बताऊंगा उसमे क्या था। फिर कभी। बस कहा न ठंडी हवा था। मैं था। छत पर कोई नहीं था। कोई नहीं था मतलब कोई नहीं।

बारिश भी नहीं। बारिश पिछले शनिवार गोल मार्किट से पेशवा रोड पर मिली था। रायसीना बंगाली स्कूल आते-आते फुस्स। आज हम दोनों मिले आराम बाग के बाद पहाड़गंज थाने से पहले। नूतन मराठी स्कूल के बिलकुल सामने। मन था उसे किसी छत के नीचे छिप कर चुपके से देखने का। खुद भीगने की कोई प्लानिंग करके नहीं गया था। भागा। तुरंत बस में चढ़ गया। उनतालीस नंबर। लक्ष्मी नगर। झील। रामलीला मैदान तक आते-आते उसकी साँसे फूल गयी। वह पीछे रह गयी।

आज भी शनिवार है। जहाँ छोड़ा था बस से उतरते वहीं उसने पकड़ लिया। आराम से दस बारह लाख वाले बस शेड के नीचे आया। पर आने का कोई फ़ायदा जान नहीं पड़ा। टुहने तक बारिश पहुँच चुकी थी। लोग सिमट कितना पीछे खिसकते। बौछारे उन्हे  की-ऑक्स तक आ चुके थे।

वहीं दो लोग आज पहली बार मिले होंगे। शुरू हो गए। पुराने साथी की तरह चिंतन की मुद्रा ले चुके थे। पहले लोगों की अंटी में कम पड़ गए वक़्त पर नज़र पड़ी। कि देखिये साहब इतनी ज़ोर से बारिश हो रही है और लोग रुककर, उसके थम जाने का इंतज़ार भी नहीं कर सकते। भागे जा रहे हैं। हमें देखो एक स्टैंड आगे जाना था। पर यहाँ रुक गए हैं। इतमीनान से हैं। फिर दोनों कूदे गाँव के मैदान में। कि आज के गाँव वो गाँव नहीं रहे। खाना खाये बिना पहले कहाँ कोई जाने देता था। वहीं आज अगर चाय नसीब हो जाए तो बड़ी बात है। और तो और कोई रोकता भी नहीं। आपने बोला नहीं के अभी आखिरी बस तो आती ही होगी, वो महाशय आपकी हाँ में हाँ मिला आपकी विदाई के ताबूत में आखिरी कील ठोंक देंगे।

थोड़ी देर की इस गपशप ने मेरे दिमाग पर पता नहीं क्या असर डाला कि कुछ देर बाद ही उन दोनों की शक्लें मुझे एक सी लगने लगी। कुछ देर और रुकता तो क्या पता यह भी खुलासा हो जाता कि वह नाटा उस लंबू का कुंभ के मेले में बिछड़ गया वही सातवाँ भाई है, जो तब हज़ार रुपये लेकर किसी की औरत के साथ उड़ गया था।

अच्छा हुआ वहाँ से भीगता भागता ही चल पड़ा। वर्ना पता नहीं कितनी देर रुकना पड़ता। अब लैपटॉप के सामने हूँ। फ़िल्म देखने का मन नहीं है। भीग पहले लिया इसलिए अब नहीं। खुद तो बोर हो रहा था सोचा चलो इधर भी सबको बोर करता चलूँ। क्यों कैसी रही.. कभी-कभी हम भी कुंबले वाली गुगली डाल लेते हैं। हरभजन का ‘दूसरा’ तो मुरलीधरन की कॉपी है। और नक्कालों से सावधान वाली चेतावनी हमने खूब पढ़ी हैं।

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