जुलाई 23, 2013

अन्नपूर्णा डायनिंग की याद के बहाने

साल दो हज़ार सात। महिना हमारे सालाना इम्तिहान के बिलकुल बाद का। बीए ख़त्म हो रहा था। अब नए सिरे से ज़िंदगी को देखना शुरू कर देने के दिन आने वाले थे। उन सारी बेफ़िक्री से दूर। मौजों की तीमारदारी के बिना। नौकरी की टेंशन से फ़ारिग। हम सिर्फ़ कुछ दिन इन सारी बड़ी-बड़ी बातों से भाग लेना चाहते थे। कुछ देर बैठना चाहते थे। बेतरतीब सी दुपहरियों से दूर किन्ही पेड़ों की छाव में। उन सारे रोज़ाना की ऐसी तैसी से अलग।

हम तीनों चल पड़े राजस्थान। पहला पड़ाव जयपुर। ट्रेन पुरानी दिल्ली से थी। सवा नौ बजे के आस पास। मंडोर एक्सप्रेस। रिजर्व टिकट नहीं था। ऐसे ही किसी जनरल बोगी में खुद को बिठा लेना था। जद्दोजहद के बाद बैठने की जगह मिल गयी। दौसा चार सवा चार के आसपास थी। और हम जयपुर उतरे तड़के साढ़े चार के लगभग। फुर्सत से थे। बिना कोई नक़्शे। बिना किसी ट्रैवल एजेंट के चंगुल में पड़े।

किलों के बारे में कभी पढ़ा नहीं था पर थोड़ा बहुत जो भी दिमाग चलता था उसमे हमारा दिल्ली का लाल किला कहीं अटता नहीं था। किले भी कहीं इतने बंधे-बंधे होते हैं। इधर चाँदनी चौक की रेडलाइट पीछे रिंग रोड की गाड़ियों की आवाज़ें। लगा आमेर का किला ही है जिसने अपने आपको किले के रूप में बनाए रखा है। यहाँ जितनी भी भीड़ हो उसमे गायब हो जाती। दीवान-ए-खास से लेकर उन छतरियों तक जो सीढ़ियों से ऊपर आती हैं। फिर लंबे-लंबे गलियारे। उनसे झाँकते चहरे। इतमीनान से चलने का मज़ा। ऊपर नाहरगढ़ के किले में रखी तोप तो नज़र नहीं आती पर उसकी दीवारें अपनी तरफ़ खींचती सी हैं।

सिर्फ़ एक दिन के लिए हम जयपुर में थे। वो भी ऑफ सीज़न। जलमहल में पानी नहीं था। न तब तक तहलका का उसके ‘री-स्टोरेशन’ पर इशू ही आया था। हवामहल भी अपनी मरम्मत करवा रहा था। पर लोगों को जाने दे रहे थे। उसके पीछे सुबह घूमे जंतर मंतर, सिटी पैलेस, फिर आमेर दिखे। लगा सबकुछ इतनी पास-पास है। पंछी होते तो झट से उड़ जाते। पर वो जो सड़के हैं वहीं उन्हे दूर कर रही हैं। नीचे जावेरी बाज़ार। वहाँ फैली दुकानें। तब चौकी धानी के बारे में पता नहीं था न रात हम रुकने वाले थे।

शाम ही चल पड़े। वही लोकल डब्बा। अगला पड़ाव माउंट आबू। रेलगाड़ी आबू रोड तक ही आती हैं उसके आगे बस से। घंटे भर की दूरी भी नहीं है। हम घूम रहे हैं। सड़क घूम रही है। सड़क घूम रही है। हम घूम रहे हैं। हरे हरे पहाड़। दूर दिखे मोड़। कहीं किसी साइड व्यू मिरर की परछाई।

रात नक्की लेक के बगल बगल सड़क किनारे सैर कर रहे थे। भीड़ थी। आवाज़ें थी। कोई कॉलेज का ग्रुप था। फ़ोटो खिंचवा रहे थे। तभी झमाझम बारिश शुरू हो गयी। हम भी किसी दुकान के नीचे खड़े उसकी बूंदों का घनत्व नाप रहे थे। रात तो हो ही गयी थी। पूरा दिन आबू पर्वत घुमाने वाली बस ने तो जैसे जान ही ले ली थी। ऊँघते जागते शाम पाँच बजे ‘सनसेट पॉइंट’ पर जब उसने छोड़ा, तब कुछ जान में जान आई। हम ‘अन्नपूर्णा डायनिंग’ ढूंढ रहे थे। किसी ने बताया ही होगा ऐसे वैसे चले जाओ नक्की किनारे ही है।

तीन थाली ली। भर पेट खाओ। दाल पर छक के घी डलवाओ या मीठे चावल के साथ गुजराती दाल लो। सब कुछ अन-लिमिटेड। ऐसा नहीं था कि स्वाद में किसी से पीछे रह जाये। दाल बाटी भी उतनी ही स्वादिष्ट जितने गुजराती व्यंजन। हम यहाँ गए तो एक ही बार पर उसे आजतक अपने दिल में लिए घूम रहे हैं। लगा खाना वहाँ पेट भरने के लिए नहीं दिल जीतने के लिए बनाया जाता है।

छह साल लग गए मुझे यह लिखते-लिखते। आज मुकेश गोविन्दपुरी नहीं रहता। एम-तेरह आज नहीं चलती। पर गली नंबर तेरह आज भी वहीं है। वह हनुमान मंदिर भी। कभी-कभी शुरू की कई यादें वहाँ खींच ले जाती हैं। आज पहले की तरह मिलने के मौके कम हैं। फ़ोन पर लंबी-लंबी बातें भी गायब सी हो गयी हैं। नीरज भी कई साल पहले वापस पूर्णिया चला गया है। मुनीरका का वो कमरा किसी और ने किराये पर ले लिया होगा। मनोज से कई बार कह चुका हूँ मिलेंगे। प्लान बनाते हैं। पर वह कभी बना नहीं। लगता है वक़्त की किश्त या तो हमारे हिस्से कम पड़ती है या फ़िर हम खुद को जादा बिज़ी समझने लगे हैं।

[जारी..]

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