जुलाई 28, 2013

महात्मा गाँधी, मॉडर्न स्कूल, मिड डे मील: कुछ विचार

सुबह के ग्यारह बजे होंगे। बस में था। सड़क पर जाम। बेतरतीब। रेड लाइट की कोई गलती नहीं। वह अपना काम कर रही थी। जब गाडियाँ कुछ जादा हो जाएँ तब क्या अपनी अर्थव्यवस्था पर उसकी विकास दर के परिणामों को देख छाती फूल कर कुप्पा हो जानी चाहिए या बाबा रामदेव के कहे अनुसार भ्रामरी प्राणायाम शुरू कर देना चाहिए। कुछ समझ नहीं आया इसलिए छाती अपनी पूर्वावस्था में बनी रही। साँस को आना जाना था, वह आती जाती रही।

कुछ देर बाद समझ आया कि जिस सड़क पर हमारी डीटीसी बस खड़ी है उसका नाम बाराखम्बा रोड है और इसपर सन् उन्नीस सौ बत्तीस में ही एक स्कूल को दरियागंज से स्थानांतरित किया गया था। तब हमारे समाज में आधुनिकता का कितना अनुपात किस मात्रा में व्याप्त था, उसके कौन कौन से सूचक, उसके मानकों पर खरे उतर रहे थे इसपर कोई दस्तावेज़ अभी तक खोजा नहीं गया है। पर तब उसका नाम रखा गया था ‘मॉडर्न स्कूल’।

उन्नीस सौ बीस के लगभग गाँधी दिल्ली के ‘बिरला भवन’ गाँधी बिरला भवन से परिचित न हों और न ही उन्हें पता हो कि वह सन् उन्तालीस में उन्ही बिरला द्वारा निर्मित मंदिर मार्ग स्थित ‘लक्ष्मी नारायण मंदिर’ का उदघाटन इस शर्त पर करने वाले थे कि जातिगत आधार पर निम्न जतियों के प्रवेश पर किसी भी तरह की कोई पाबंदी नहीं लगाई जाएगी। तब भी यह नहीं माना जा सकता कि वह दिल्ली से इतने दूर थे। शायद कोई लेख ‘हरिजन’ या ‘यंग इंडिया’ में छपा भी हो। यहाँ यह देखना मानीखेज होगा कि गाँधी ने इस स्कूल पर कभी कोई लेख लिखा या नहीं। यह इसलिए भी गौरतलब है क्योंकि अँग्रेजी राज में यह दिल्ली का पहला प्राइवेट स्कूल था। उस समय तक डी॰ए॰वी॰ स्कूल(1886) महात्मा हंसराज द्वारा स्थापित किए जा चुके थे जो इस आधुनिकता के आग्रह को ‘एंग्लो’ विशेषण के साथ चुनते हैं। इस आलोक में उनके क्या विचार थे जबकि उनके पास अपना शिक्षा का मॉडल था, देखने लायक होता।

नयी तालीम के कुछ हिज्जे बुनियादी शिक्षा के नाम से ‘एनसीएफ़ 2005’ में हैं। जिनपर कभी कोई खुल कर बात भी नहीं करना चाहता। जिस आधार पत्र 'काम और शिक्षा' में इस गाँधी विचार को रेखांकित किया है उसका आज तक हिंदी में अनुवाद भी उपलब्ध नहीं है। आपको उसे औपनिवेशिक भाषा में पढ़ना होगा। यह श्रम को एक सम्मानजनक स्थान देने उसके साथ मानवीय गरिमा के मूल्य को भी अपने साथ प्रसारित करती है। जिसमे मदद करती है फ़िल्म दीवार। एक लड़का बूट पॉलिश कर जीविकोपार्जन कर रहा है वह अपने द्वारा किए गए श्रम के प्रति संवेदनशील है और दूसरों से उसके बदले सम्मान चाहता है। तभी वह फेंके गए सिक्कों को उठाने से इंकार कर देता है। यह उसकी भीख नहीं है, उसके काम के बदले मिला पारिश्रमिक है। जिसे उसके हाथ में दिया जाना चाहिए। ऐसे कई दरीचे उसके बाद बनी किताबों में यहाँ वहाँ हैं, जो नयी-नयी युक्तियों से इस विचार को संप्रेषित करती हैं। ख़ैर।

अचानक ध्यान गया शिक्षा के अधिकार में सुझाये गए ‘पड़ोस के विद्यालय’ की अवधारणा पर। ‘मॉडर्न स्कूल’ का पड़ोस बनने के लिए या तो तिलक ब्रिज-शिवाजी ब्रिज की रेलवे कॉलोनी में रहना पड़ेगा या सामने बने नीलगिरी अपार्टमेंट्स में। वरना ज़ाकिर हुसैन कॉलेज तक जाते फ़्लाइओवर के नीचे बना ली गयी झुग्गी कब तक अपनी ख़ैर मनाएगी। एक दिन तो उसे बुलडोज़र तोड़ ही देगा। इतनी महँगे पड़ोस से पौने दो हज़ार के करीब बच्चे नहीं आ सकते। इसलिए यहाँ बड़ी से बड़ी हर ब्रांड की देसी विदेशी गाडियाँ खड़ी दिख रही थीं क्योंकि उस दूर के पड़ोस की दूरी इन्ही पहियों से पाटी जाएगी। गाड़ी के साथ स्कूल कितना बड़ा ब्रांड है यह किसी से छिपा नहीं है।

अगर इस स्कूल को बनाने वाले ठेकेदार का बेटा इस स्कूल में पढ़ा तो कोई बड़ी बात नहीं हो गयी। दिल्ली उनकी बनाई हुई होगी पर यह मौके उस अधिशेष से ही निकल रहे थे जहाँ खुशवंत सिंह ‘बर्नस्टीन’ के कहे अनुसार अपनी भाषिक अभिव्यक्ति करते रहे। दर्शनीय तो वह होता जब सरदार शोभा सिंह के यहाँ काम करने वाले मजदूर का बेटा वहाँ पढ़कर निकलता। और इस भाषाविद् की स्थापना को उलटकर रख देता। दया पवार मराठी में लिखते हैं और ओमप्रकाश वाल्मीकि हिन्दी में। उनके ‘सीमित कोड’ उस रसानुभूति और भाषिक संस्कार की शास्त्रीय कसौटियों पर खरे नहीं उतरते जितने कि अँग्रेजी में लिखी मानो माजरा। ट्रेन टू पाकिस्तान।

बस का ऐसी ठीक काम कर रहा था फिर भी यह सोचने लगा कि कभी इन स्कूलों में ‘मिड डे मील योजना’ से जुड़ी कोई ख़बर क्यो नहीं आती। क्या यहाँ उस वर्ग का बच्चा नहीं आता जिसका पेट घर से खाली रहता है। जवाब हम सबको पता है। अब जब फुर्सत से यहाँ लिखने बैठा हूँ तो याद आता है एमएड एंट्रेंस में पूछा सवाल। कि अगर एक माता अपने बच्चों को भूखे स्कूल  भेज रही है तो इसका कारण क्या है। चार विकल्प थे: माता अनपढ़ है, उसके घर में अनाज नहीं है, सरकार इसके लिए दोषी है और चौथा पता नहीं। आज थोड़ा-थोड़ा  उसे समझ पाया हूँ के वहाँ माँ के अनपढ़ होने को बच्चों की भूख के साथ क्यों जोड़ा गया था।

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