जुलाई 15, 2013

तुम्हें पता है। मुझे पता है।

ग़ालिब को दरबदर करने के बाद अभी और उस दरमियान लगातार लगता रहा कुछ तो है जिसे लिख नही पा रहा। कुछ-कुछ बातें हैं पर उन्हे शब्द नही दे पा रहा। कुछ कहना है, पर वह है क्या। उसे कैसे कहूँ जो अंदर ही अंदर होता जा रहा है। कभी-कभी लगता है उनको कह भी पाऊँगा। सब कुछ इतना साथ है के बस। रेलमपेल। ऊपर नीचे। गुत्थम-गुत्था।

बिलकुल उस चौसा आम की तरह जो खिड़की पर दो दिन से घड़े पर रखा है। अभी तक खाया नही है। बारिश हो गयी है तब कुछ स्वाद तो बदला ही होगा। कुछ मिठापन कम हुआ होगा। थोड़ा पानी उसमे भी चला गया हो जैसे। और मिठास में पानी घुल गया हो। मिसरी अगर घुल जाती तो घोल देता।

कहीं से बैंगन के ऊपर के छिलके के जलने की गंध आ रही है। भर्ता बन रहा है। धीरे-धीरे वो नीली-नीली आँच उसे पकाती रहेगी। उसका स्वाद बनाती रहेगी। ताप उसे सेंक रहा है। भून रहा है। उसे नरम कर रहा है। पर अचानक उसकी खुशबू हवा के साथ कहीं और चल पड़ी है। इस तरफ बस इतनी ही।

दिल के अंदर भी कुछ ऐसा ही चल रहा है। उसके ऊपर की परत के पास कहीं खून के थक्के इकट्ठे होकर एक तरफ़ चल दिये हैं। मुझे पता है, कहाँ जा रहे हैं। चाह कर भी कुछ करने का मन नही है। शायद मेरी मर्ज़ी भी यही हो। कि चलने दो। फिरने दो। उन्हे आज नहीं तो कल वहाँ जाना ही था। पता है, वहाँ तुम हो। इंतज़ार में। तभी तो कुछ ऐसा नहीं करता के तुम इन धड़कनों से बाहर निकल पड़ो। बड़ी धीरे से धड़कने को कहता हूँ दिल को। कि तुम्हें जब पता चले तब उस वक़्त मैं तुम्हारे कान के बिलकुल बगल में खड़ा होऊँ। कनअँखियों से तुम मुझे देखो। मैं तुम्हे देखूँ।

जिस कमरे में बैठ लिख रहा हूँ वह जितना गरम है, उससे कहीं जादा ठंड बाहर छत पर घूमते हुए महसूस कर सकता हूँ। पर नहीं। फ़िलहाल तुम यहीं हो। कमरे में। मेरे साथ। मेरे पास। दिल के बिलकुल सिराहने। तुम्हें छोड़ कैसे जाऊँ। बारिश नहीं हो रही। पर होगी ज़रूर। तब हम दोनों उसकी आड़ में कुछ देर बैठे रहेंगे। कुछ तुम मुझे देखोगी। कुछ मैं तुम्हे देखूँगा। तुम्हारे बालों में अरझ गयी बूँदों में कहीं मेरा दिल भी होगा। तुम्हारी धडकनों के साथ।

घड़ी की तरफ़ देख रहा हूँ। दस बज कर दो मिनट। थोड़ी देर बाद नीचे जाऊंगा। तुम मेरा इंतज़ार कर रही होगी। इस कमरे से निकल हम वहीं पार्क के पास मिलते हैं। हमे कोई देख नहीं पाता। चुपके से तुम्हारे करीब होता आता हूँ। फ़िर से किसी को पता नहीं चल पाता। सिर्फ़ तुम महसूस करती हो। उस मुलायम घास पर बैठे वक़्त पता नहीं कैसे बितता जाता है। तब दोनों थोड़ी देर बाद उठेंगे। साथ चलने को होंगे। पर दोनों एक साथ कहेंगे। थोड़ी देर रुक जाओ न। और दोनों रुक जायेंगे। फ़िर से।

हरबार खलता है यह जाना और लौट के आना। पर अन्दर ही अंदर पता है के बार-बार ये जो जाकर वापस आना है उसी के आसपास हम मिलने के बहाने ढूंढ़ते हैं। और हर बार ढेर ढेर बहनों के साथ फ़िर मिलते हैं। फ़िर चुपके से तुम्हारे कान में कहता हूँ। तुम नहीं कहती। चलते हैं। रात हो गयी है। कल फिर मिलेंगे। तुम कुछ नहीं कहती। बस सुन थोड़ा उदास हो जाती हो। चेहरा ठीक से दिख नहीं पाता पर आवाज़ सब बता देती है।

पर तुम्हें पता है। मुझे पता है। हम दोनों को पता है। एक रात ऐसी आएगी जब हमें यह बोलना नहीं पड़ेगा। न तुम्हे। न मुझे। हम दोनों ऐसे ही बैठे रहेंगे। बिलकुल अगल बगल।

आवाज़ें..

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