जुलाई 07, 2013

मेरा लगातार खुद से बचना और कहानी 'घोंघा'

जबसे कहानी ‘घोंघा’ पढ़ी तब से सन्न हूँ। सुन्न भी कह सकते हैं, पर अब थोड़ा थोड़ा अपने में हूँ। तब तो एक बारगी जैसे उस अवस्था में पहुँच गया के काटो तो खून नहीं। अंदर खून बह भी क्यो रहा है, सोचने लगा। उसकी जकड़ इतनी मज़बूत जान पड़ी कि लिखने को जानबूझ कर टालता रहा, ऐसा नहीं है। ऐसा खूबसूरत बहाना बना सकता तो ठीक रहता। कुछ सोचने से जादा उसके अंदर खुद को महसूस करने लगा। अब थोड़ा बराय दूरी उसे देखने ही आया हूँ। अभी भी कुछ खास नहीं है। बस बैठ गया हूँ। देखते हैं कहाँ तक पहुँचते हैं।

गठरी। थोड़ा भदेस सा है। थोड़ा बेतरतीब भी। पर इसे कहूँ क्या? रूपक-बिंब-प्रतीक या कुछ और। शायद मेरी भाषा में इसे इनमे से कुछ न कहने का आग्रह तो है, पर शब्द नहीं। यह पूरी-पूरी मेरी कमजोरी है। जिसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ मुझ पर आती है और शायद यही उस कहानी की सबसे बड़ी जीत। वैसे यह कोई हार जीत वाल खेल नहीं है। पर अभी कहा न, थोड़ा कमज़ोर हूँ। उदय प्रकाश ‘मोहनदास’ में कई-कई मर्तबा कह चुके हैं कि हम कैसे समय में जी रहे हैं। पता नहीं वहाँ यह भी लिखा है के नहीं कि यह समय सिर्फ़ ‘हम पुरुषों का, पुरुषों के लिए सदैव’ रह गया है।

इधर बढ़ने से पहले मैं बात शुरू कर रहा था ‘गठरी’ की। मम्मी की कोई पुरानी साड़ी होती है जो गुदड़ी बनने से पहले गठरी बन जाती है। उसमे कपड़ों, गैर ज़रूरी चीजों को समेट उसे गद्दों के कोने में छिपा देते। कि अगले मौसम में निकालेंगे। या तब जब उसकी ज़रूरत पड़े तब। उसे बांधने उसे खोलने का तरीका अगर किसी स्त्री पर आरोपित कर दिया जाए तब क्या होगा। ऐसा क्या है जिसे उसने उन गांठों में समेट लिया है। उसके बाजू वह गाँठ हैं। सबसे मजबूत गाँठ।

पता नहीं लिखते हुए कैसा-कैसा सा होता जा रहा हूँ। खुद इसको लिख लेना उस गठरी बन गयी स्त्री के अंदर उठते सवालों की तरह आस पास घूम रहे हैं। शायद क्योंकि मैं खुद एक लड़के के रूप में इस समाज में बड़ा किया गया हूँ इसलिए भी उन अंदर तक धँस गए नुकीले सवालों की जद से काफी दूर हूँ। कितना आसान है न समाजशास्त्र की आँड़ में छिप जाना। कि हम नहीं चाहते किसी जितुआ और उसके मामा की तरह हो जाना। हम उसे सदर अस्पताल ही पहुँचाते। अपने साथ कमरे पर नहीं लाते। ले भी आते तो उसे गठरी न बनाते और न उस गठरी बन गयी नंगी देह को बराबर मामा भांजे की तरह खोलते बंद करते।

यह जो जीतू हो जाना है यह बराबर उस देह के प्रति निर्मम हो जाना है, अमानवीय होते जाना है। ‘घोंघे’ की रूपक कथा लगता है, यहाँ चुक जाती है। क्योंकि मन नहीं मानता कि यह समाज घोंघो से बना है।  यह तो रेत में मुँह बाए बगुले की तरह हो जाना है। यह कोई ऐसा मोर नहीं है कि जंगल में मोर नाचा और किसी ने न देखा हो। उसके नाच पर उसका कॉपीराइट भी नहीं रहा अब तो। कॉपी‘लेफ़्ट’ हो चुका है।

इस अरण्य में आपका स्वागत है। यहाँ के नीति नियंता हम ही हैं। हम ही इसके स्थपति हैं। बस इस कहानी में उसका नाम जितेंद्र है। जितुआ है बड़ा शातिर। वह हर कमरे में अपनी हंसी और किस्सों के साथ कथित ईश्वर की सार्वभौमिकता को टक्कर देता मौजूद रहता है। जिसकी सैद्धांतकी वहाँ के लड़के उसकी किस्सागोई और उसमे समाये ‘काम’शास्त्र के बूते अपने पाये मज़बूत करते रहे हैं। जो लड़कियों से बात न करने से उपजी कुंठा है, उसमे स्त्री सिर्फ़ भोग्या के रूप में ही उनके सामने आती है।

इसी रस्ते डेढ़ सौ रुपये जुटाकर टीवी सेट वीसीआर और कैसट का जुगाड़ किया गया था। साँस फूलने औक्सीजन कम पड़ने वाले दृश्यों को देख लेने के न्योतों के बाद कहानी उस हॉस्टल से बाहर एक रात मामा भाँजे के चंगुल में पड़ गयी घबराई सी लड़की पर आकार ठहरती है। लड़की रात दस बजे स्टेशन पर उतरी है और उसकी किस्मत में ‘जब वी मेट’ की करीना कपूर की तरह किसी शाहिद कपूर से मिलने वाली स्क्रिप्ट इस राईटर ने लिखी नही है। भटकते भटकते काफी देर हो जाने पर भी वह सदर अस्पताल नहीं पहुँच पायी है। रात इतनी हो चुकी है के नाइट शो भी ख़तम हो चुका है।

पता है अभी भी सवालों से सीधे टकराने से बच रहा हूँ। शायद हिम्मत भी नहीं है। इसलिए पहले से ही आड़ लेकर चलता रहा। जितनी आसानी से लिख दिया कि सब इसी में छिपा हुआ है, क्या हम पुरुष उसे ऐसा ही नहीं रहने देना चाहते? अगर ऐसा न हो तब इस तरह की पुरुष ठेकेदारी खत्म नहीं हो जाएगी? मैं खुद कभी नहीं कहना चाहता कि उन मामा भांजे ने उस लड़की की क्या दशा कर दी।

क्योंकि मुझे पता है जैसे ही कोई कहता है कि 'हमारे' 'समाज' में स्त्रियॉं की दशा ऐसी है/वैसी है। तभी इस वाक्य की पड़ताल शुरू कर देनी चाहिए कि यह ‘हमारा’ किन्हे उसके भीतर का मान उन्हे ‘अंदर’ समाहित कर रहा है। और किन्हे ‘बाहर’ का मान उसके अधिकारों की रक्षा उसके हितों के लिए लामबंद होना चाह रहा है।  शर्तिया यह वही कह सकेगा जिसका वह समाज बनाया होगा। वही उसके 'हमारा' होने के सबसे जायदा दावे करेगा। उसकी गतिकी में उसकी निर्णायक भूमिका होगी। और किसी भी तरह से वह इसमे विचलन को स्वीकार नहीं करेगा।

{कहानी तो इससे भी जायदा कहती है। पर शायद उस पर आगे फिर कभी लिख पाऊं। फ़िलहाल जो संजीव सर की 'बनास ' में छापी यह कहानी पढ़ना चाहते हैं वह 'तिरछी स्पेलिंग 'के इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं। यह मुझे सबसे ऊपर लिखना चाहिए था। पर खैर। }

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...