जुलाई 09, 2013

वो जो फ़िल्मों वाला ऊटी था..


पहाड़ पहाड़ अलग तरह के होते हैं। हम लोग जो मैदानी इलाकों में रहने वाले लोग हैं, पहाड़ों को लेकर कई तरहों से सोचते हैं, उनकी कल्पना करने लगते हैं। उन अनुभवों की पहली खेप न भी हो, तब भी, उसकी कोई न कोई छवि, हम अपने लिए गढ़ लेते हैं। बिलकुल स्वयं प्रकाश की कहानी ‘संधान’ की तरह। जो जो यहाँ है वो वो शर्तिया वहाँ नहीं होगा। जैसे यहाँ की गर्मी, यहाँ का चिपचिपा मौसम, बिन बरसात के उड़ते आवारा बादल। सबकुछ। कुछ भी नही।

फिर कई चीज़ें छवियाँ ऐसी होती हैं जिसे हम खुद नहीं गढ़ते। किसी के कहने पर उसे वैसा मानने लगते हैं। जैसे ज़ायकों के लिए विनोद दुआ हिंदुस्तान के लिए खाने का दावा तो करते हैं पर कई चीज़ें छिपा ले जाते हैं। बिलकुल उसी तर्ज़ पर जैसे कई विशिष्ट चैनल पर्यटन उद्योग के लिए कच्चे माल का काम करते हैं। दूर-दूर ले जाते हैं। अच्छे-अच्छे दृश्य दिखाते हैं। खाने स्वाद मसालों पर बड़ी-बड़ी बात करते हैं। रहन सहन संस्कृति समाज पर रुक कर ठहर कर‘एथनॉग्रफी’ करने का मन न भी हो, तब भी दूरदर्शन की तरह या इम्तियाज़ अली की फ़िल्मों की तरह पंजाब को, लद्दाख को दिखाने का मोह छोड़ नहीं पाते।

ऐसा ही मोह कभी रणबीर कपूर के पिता के ज़माने में फ़िल्मों में ‘ऊटी’ को दिखाने का था। पहली बार इस ‘ऊटी’ का नाम सन् अस्सी  में आई ‘कर्ज़’ को उसे रिलीज़ हो जाने के कई सालों बाद टीवी पर देखते हुए सुना था। टोनी या मोंटी नाम के अपने दोस्त को किसी शाम की महफ़िल मे ‘दर्द-ए-दिल, दर्द-ए-जिगर’ वाले गाने के बाद से उत्पन्न प्रेम संकट का समाधान करने की दवा के रूप में डॉक्टर दोस्त इसी जगह का नाम सुझाता है।

तब असम, अरुणाचल प्रदेश, दार्जिलिंग के चाय बगानों के क्या हालचाल थे, कह नहीं सकता। इन पूर्वोत्तर के राज्यों को आज की तरह हम उत्तर भारतीय कब से आतंकवाद से ग्रस्त मानते आए हैं, इसका भी कोई ख़ाका नज़र नही आता। ख़ैर। ऊटी में अभी ठीक से दाखिल हुए नहीं थे कि हमारे गाइड ने बताया यह ‘हिंदुस्तान फ़िल्म फ़ोटो कंपनी’है। फ़िल्मों से इसका कुछ लेना देना है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि इस ‘नीलगिरी’ से एक सौ साठ किलोमीटर की दूरी पर मैसूर का ‘बृंदाबन गार्डन’ है। जहाँ आज भी पाँच साल पहले बजने वाले गानों पर ‘म्यूज़िकल फाउंटेन’ नाचता है।

पर्यटन स्थल के रूप में फिल्मों ने इसका जो भी कुछ विकास किया हो, ‘हिल स्टेशन डेव्लपमेंट बोर्ड’ को आज भी उसका विकास करना पड़ रहा है। ऊपर से गाइड का तुर्रा ये कि साहेब ये जो मोड़ पर दुकान देख रहे हैं न यहीं कभी माधुरी दीक्षित की ‘साजन’ फ़िल्म वाली किताबों की दुकान थी। और वो जो सड़क पार लाल बोर्ड वाली दुकान है वहीं संजय दत्त बैठकर चाय पीते पाये जाते थे। फ़िर किसी धोबी घाट को दिखा कर कहता है यहाँ ‘मैंने प्यार किया’ की शूटिंग हुई थी। फ़िल्म भी क्या गजब हिट थी। और भी पता नहीं क्या-क्या कहा उसने।

पर कहीं मन में लगता जा रहा था कि आज का ऊटी वैसा क्यो नहीं दिख रहा जैसा हम उन फिल्मों में देखते आए हैं। जो नहीं देखा था, उसे खुद ही बनाते आए थे। कहाँ गायब हो गए हैं सारे नज़ारे। सारी धड़कने। धुनें, उनसे निकलता संगीत। मन में एक बार ऊटी देख लेने वाली बेचैनी। कहाँ हैं सारे पंछी, झीलें, पेड़, ढलान पर उतरती साइकिलें। वो पहाड़ के कोने तक जाती सड़क। वहाँ से आती कोई आवाज़।

आज उसकी हालत बिलकुल बोट क्लब की झील के किनारे से टकराती खाली पानी की बोतलों के लगते ढेर की तरह होती गयी है। धीरे-धीरे वहाँ इतने ‘रिज़ॉर्ट’ बन गए हैं जो अपने स्थापत्य में कॉटेज से बड़े नहीं हैं। जिस इत्मीनान के लिए, अकेलेपन में खो जाने के लिए कभी जो लोग यहाँ आते रहे होंगे, उन्हे यह भीड़-भाड़ अखरेगी। एकांत के क्षण यहाँ से गायब होते रहे हैं। खुद इसपर लाद दी गयी बातों से आज यह इतना दब सा गया है कि वैसा ही बने रहने का संघर्ष दबाव वहाँ नज़र नहीं आता। उसने अपने को छोड़ दिया है।

वह ‘तमिलनाडु सुपर मार्केट’ और ‘वीनस सुपर मार्केट’ जैसी दुकानों में सिमटकर रह गया है। वह भी सिर्फ़ तीन चार चीज़ों में। घर-घर बनती होममेड चॉकलेट, नीलगिरी की पहाड़ियों पर ही पाये जाने वाले तेल और यहाँ बागानों में उगाई जाने वाली चाय। ‘बॉटेनिकल गार्डन’ के इर्दगिर्द उग आई दुकानें मनाली-शिमला के माल रोड का फ़ील देने की कोशिश करती हैं, पर पता नहीं उसकी यह कोशिश दिल को दुखाती जादा हैं। सुकून नही दे पाती।

सच कहूँ उन बीतते घंटों में यही लगता रहा कि जगहें कैसी बताई जाती रहती हैं और असल में वह कैसी होती गयी हैं। तीन साल पहले पंचमणि छोड़ दिया था, अब कुन्नूर। शायद फिर कभी वहाँ जाएँ तो उनकी हालत कहीं ऐसी न मिले। डर लगता है, जब वह बने बनाए, जीवित मिथक, हमारे सामने मरते दम तोड़ते हैं। ऊटी तभी हमारे लिए हमेशा के लिए मर गया।

[जारी..]

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...