अगस्त 02, 2013

दो ब्लॉग: दिल के पास: सोचालय और लहरें

लग रहा है थक गया हूँ। खूब थक गया हूँ। अभी डायरी में लिखते लिखते शब्द झिलमिला से गए जैसे। तारों की तरह। पलकें भारी हैं। लेटने का मन हो रहा है फ़िर भी सोचता हूँ जो मन में चल रहा है उसे कहे बिना दिल मानेगा नहीं। थोड़ा तुमसे भी बात करने का मन शाम से हो रहा है। पर नहीं कर सकता। अभी तुम्हारे पास फ़ोन होगा नहीं। कैसे बात करूँ। फ़िर ये जुखाम भी किसी को कहीं का नहीं छोड़ता। कल आइसक्रीम क्या खा ली, नाक सुड़सुड़ाने की नौबत आ गयी।

कई दिनों पहले सागर की पोस्ट पढ़ी थी। ठीक से याद नहीं क्या था उसमे। अभी गूगल कर यहाँ लिंक देने से पहले खुद भी पढ़ लूँगा पर अभी कुछ भी सही से कह नहीं सकता के क्या बात थी। जितना याद है उसमे शायद एक लड़का महबूबा के बेवफाई के किस्से बेतरतीब होकर कह रहा है। मतलब पता नहीं क्या। मेरे में हिम्मत ‘राँझणा’ के धनुष की तरह नहीं पायी जाती कि सोनम को बिठाकर स्कूटर का स्कूटर गंगा में कुदा दूँ। अभी महिना भी नहीं हुआ एक पोस्ट लिखी भी तो उसे खुद ही अश्लील एकालाप कह देता हूँ। अभी कुछ ही महीनों से सोचालय को पढ़ना शुरू किया है शायद बंगलोर की पूजा के ब्लॉग के साथ। कभी-कभी लगता है मैं वो सब वो सारी बातें क्यों नहीं लिख पाता जो सागर के यहाँ बड़ी सहजता से ‘स्पेस’ पा जाती हैं। उमर में हम दोनों शायद हमउम्र ही हों। पर नहीं। जैसा वह लिख लेता है वैसा लिखने की हिम्मत शायद मेरे में नहीं। मेरे यहाँ वह डायरी के पन्नों पर है। पर मैंने कभी उसे पूजा की तरह ‘कथार्सिस’ कभी नहीं कहा। मेरे लिए वह थोड़ा पर्सनल है। जिसे यहाँ लिख लेना इतना आसान नहीं लगता। अभी जो मन में चल रहा है उसे इर्दगिर्द बस घूमे जा रहा हूँ। बोल कुछ नहीं रहा।

कभी लगता है अपने अनुभव इकहरे क़िस्म के हैं। उनमे ‘ग्रे एरिया’ है ही नहीं। वही एकतरफ़ा प्यार करने वालों की तरह घुट घुटकर आहें भरना, कहीं दिल भारी हो जाने पर किसी दोस्त के कंधे पर सिर रखे बिना रो देना। या जादा हुआ तो डायरी को साझेदार बना लेना। पर फ़िर कभी अपनी ही पोस्टों को पढ़ता हूँ तो लगता है जो भी लिख दिया है उनमे अगर जिन व्यक्तियों को पता हो कि उनकी बात कही है तब मेरी स्थिति और विकट होती जाती। और अधिकतर वह हिस्से मेरे दिल के कोनों में उग आए प्यार के हैं। जिनमे वह सब हैं, उन्हे बिन बताए लगातार यहाँ लिखता रहा हूँ। उन्हे बताने की ज़रूरत कभी लागू भी नहीं। क्यों बताऊँ। मेरे हिस्से वह सब लड़कियाँ इतनी ही पड़ी होंगी या फ़िर उन्हे इतना ही समझा होगा।

कभी-कभी सोचता था अपने जैसी लड़की को ढूंढुंगा। मिल जाएगी तब उससे बात करूंगा। बात करूंगा अपनी हमसफ़र बनाने की बात तक। पर जिस तरह भी पढ़ाई की उनमे सब की सब पूंजीवाद के चलती फिरती देह से जायदा कभी नहीं लगीं। कहीं पहले कह भी चुका हूँ, फ़िर कह रहा हूँ। मेरे हिस्से वह कभी पड़ी ही नहीं। फ़िर एक दिन ऐसा आया कि यह तलाश बंद कर देनी पड़ी। पुरातत्व विभाग की अनुमति खत्म नहीं हो गयी अपन उन लड़कियों को ‘पॉपुलर कल्चर’ की पुरोधा मान अपनी तरह बनाने में पिल पड़े। सिर्फ़ पिल पड़े, मिली कोई नहीं। जो हमारी तरह बनने को तय्यार हो। वैसे असल में बात ये थी कि उन्हे कानो कान भनक भी न पड़ी के हम सोचते क्या हैं। भनक पड़ी होती तो पता नहीं क्या होता।

ख़ैर, कभी कभी जब किताब नहीं पढ़ रहा होता हूँ तब इन्ही ब्लॉगों पर घूम रहा होता हूँ। लगता है जैसा मैं जिस चीज़ पर सोचता हूँ या अगर कभी लिखता तो बिलकुल वैसा तो नहीं पर है कुछ-कुछ उस हद का लिखता। अभी जब सागर ने ‘ईएमआई’ के बाद कोई पोस्ट नहीं की और पूजा की ‘शिप ऑफ थीसियस’ पर अचानक पोस्ट आई। उनके दरमियान यही सोचता रहा के इनकी यहाँ से गैरहाजरियाँ अकेला क्यों कर रही हैं। उनमे मैं कहाँ छूटा जा रहा हूँ। पता नहीं क्यों जानना चाहता था के जब ये दोनों यहाँ नहीं होते, तब क्या कर रहे होते होंगे।

आगे लिखना थोड़ा मुश्किल हो रहा है क्योंकि ट्यूब टाइट की रौशनी में दो तीन ततैया घूम रही हैं। उनसे अपने आपको छिदवाने की कोई प्लानिंग नहीं है। इसलिए जा रहा हूँ। और वैसे भी इस पोस्ट को पढ़कर कोई भी कह सकता है कि मैं ब्लॉग का कोई गंभीर पाठक नहीं हूँ। जिनहे दिल के पास मानता हूँ बस वही कहा। आगे जो नहीं कहा है, फ़िर कभी..!!

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत शुक्रिया मित्र!

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    1. सोच जितना रहा था, उससे काफ़ी कम यहाँ उतर पाया। फ़िर यह भी सोचा के जिनके बारे में यहाँ बात कर रहा हूँ वे कभी जान पायेंगे भी या बस ऐसे ही..पर तकनीक दिमाग से तेज़ निकली।

      चलिए अब बात शुरू हुई है तो होती रहेगी। इसी उम्मीद के साथ।

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