अगस्त 10, 2013

'छोटी सी बात' के बहाने प्यार पर कुछ

प्यार क्या हमेशा एकतरफ़ा होता है। कम-से-कम शुरुवाती दिनों में यह ऐसा दिखाई देता है। हमारी फिल्में भी इसी रूप में हमे संस्कारित करती रही हैं। संस्कार की जगह अगर ‘कंडीशनिंग’ कहा जाये तब और दृश्य साफ़ होता है। दोनों की प्रक्रिया है लगभग एक ही। एक लड़का है। किसी लड़की को पसंद करने लगा है। उसका दोस्त है, उसकी सब बातें जानता है। उसे ढाढ़स बँधाता है। एक दिन पट जाएगी। अपने आप नहीं उसके कहे पर चलने के बाद।

यह पसंद उसके रूप को लेकर है रंग को लेकर है या किसी और स्वभाव गुण आदत को लेकर यह बिलकुल ‘व्यक्तिनिष्ठ’ मामला है। ‘व्यक्तिनिष्ठ’ में केवल पुरुष है इसलिए इसकी भाववाचक संज्ञा पुल्लिंग है। हमारे पुरुषसत्तात्मक समाज की बपौती। उनकी जुबान। उनकी भाषा बोली। डीएनए की तरह ख़ून में समाई। कभी धर्मेन्द्र जो काम करते थे वही अपने जमाने में गोविंदा करने लगे। किसी लड़की के गुरूर को अपने प्यार में फँसाकर तोड़ना। लड़की की हेकड़ी तुरंत गायब।

बीते साल आई इशकजादे भी इसी रूप में देहवादी फिल्म है जहाँ लड़का योजना के तहत लड़की की तरफ़ आकर्षित होता है तो सिर्फ़ उसकी देह को रौंदने के लिए। कि एकबार बस एक बार इसके साथ हमबिस्तर हो जाने के बाद इसका सारा लड़कपन तुरंत गायब हो जाएगा। परिणिति चोपड़ा और लड़कियों की तरह ‘बिहेव’ भी करने लग जाती हैं और उसी ‘स्टीरियो इमेज’ में क़ैद होकर रह जाती हैं। यह बिलकुल ‘सावित्री’ जैसा किरदार है जहाँ जिसे देह अर्पित की उसी के संग प्रेम जैसा पवित्र लगने वाला कृत्य किया जाने लगता है। झोलझाल वाली कहानी को ‘ऑनर किलिंग’ बनाने की हबीब फ़ैसल की तड़प यहाँ बार-बार देखी जा सकती है।

बिलकुल इसी तरह शारीरिक अंगों-प्रत्यंगों की तस्वीर देख लेने के बाद देव विदेश से भारत लौटता है। पर स्त्री देह पर पुरुष के एकाधिकार वाली बात उसके खिंचाव को तहस नहस कर देती है। जब उसे लगता है लड़की ओवर स्मार्ट है। खुद साइकिल पर गद्दा लिए खेत खेत डोल रही है। ऊपर से हमारे कान के कच्चे लड़के। लड़की हमें नहीं मिली तो दूसरों को भी लगे कि जूठी मिल रही है। जूठे उसके अंग प्रत्यंग। फ़िर जब शादी कहीं और तय हो जाये तो ड्रामेबाजी। वोदका की बोतल पहले गले के नीचे उतारना फिर उल्टी कर देना।

आज कोई मन नहीं था के फ़िल्म पर समाजशास्त्रीय विश्लेषण देने पिल पड़ूँगा। बस शाम अमोल पालेकर की ‘छोटी सी बात’ देख रहा था। अरुण प्रभा की तरफ़ आकर्षित है पर बोलने की हिम्मत नहीं है। बीच में नागेश नाम का काँटा इस मुश्किल को और बढ़ा रहा है। दोनों को मिलने नहीं देगा। ख़त लिख लिख खंडाला के विलफ़्रेड सिंह वगैरह वगैरह से प्यार पर टिप्स लेता रहा है। कहानी सरल एकरेखीय लगती है। हम भी इस भागमभाग वाली ज़िंदगी में इन इतमीनान से बनाई गयी फिल्मों को देख हँस बोल लेते हैं। किसी ऐसी ही फ़िल्म की फ़िर से ताकीद करने लगते हैं।

पर मामला इतना ही नहीं है। जहाँ से हमने शुरू किया था वहीं दोबारा पहुँचने पर दिखाई देता है कि यह तो वही लड़का है जो लड़की की तरफ़ खिंचा चला जा रहा है, जबकि लड़की की तरफ़ से ऐसी कोई कोशिश नहीं दिखाई देती। यहाँ कई पूर्वधारणायेँ एक-एक कर हमें मिलती हैं जिंहोने हमारे समाज के युवा वर्ग को कभी न कभी प्रभावित ज़रूर किया है। जैसे लड़कों के मन में जो लड़कियों का रूपक है और समानुपातिक रूप से लड़कियों के मन में लड़कों की छवि। यह कब कैसे किसने बैठायी कहना मुश्किल है। बिलकुल वैसे ही जैसे यह कि इन मामलों में शुरुवात लड़कों को ही करनी पड़ती है आदर्श स्थिति यही कहलाई और मानी जाती है जब लड़का हिम्मत करके खुद से आगे बढ़े। मतलब ‘कुछ है’ और ‘कुछ हो सकता है’ की संभावनाओं को परखने की दृष्टि से भी लड़के को सम्पन्न होना पड़ता है।

यहाँ प्रेम को आत्मविश्वास से जोड़ा गया है जहाँ लड़का बार बार अपने लूस कॉन्फ़िडेंस को नाक पर हाथ मलकर लूस नहीं करता। इससे कहीं कॉन्फ़िडेंस में तो रजनीगंधा का आमोल पालेकर है। सीधे कहता है। या कहें वहाँ ट्रीटमेंट अलग किस्म का है। थोड़ा सतही किस्म का। पढ़े लिखे वर्ग की लड़की भी ऐसे प्रेम नहीं करती। वह तो चश्मेबद्दूर की ‘मिस चमको’ की तरह खुद आगे बढ़ती है और रौ में अपना पता तक बोल जाती है। पर ऐसी नायिकाएँ सई परांजपे के बाद कई सालों की छुट्टियों पर चली जाती हैं।

यहाँ लड़के को ओवर हौलिंग की ज़रूरत है। उसकी पर्सनलिटी को डेंटिंग पेंटिंग की ज़रूरत है। यहीं आकार मुझे पिछले दिनों देखी राँझना याद हो आती है। जिसके बारे में ही लिखने बैठा था। पर ख़ैर आगे जल्द उसको भी लेंगे। आज कई सारी बाते रहने दे रहा हूँ कि अभी तो इस टॉपिक को शुरू ही किया है।

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