अगस्त 11, 2013

मेरे शहर में मेरा इंतज़ार

बिरला मंदिर, सन् चालीस
हमारे लिए शहर कहाँ होता है। पूरे शहर में? शहर के एक हिस्से में? या उन हिस्सों के छोटे छोटे टुकड़ों में। वहाँ भी शर्त यह कि उनसे हमारी जान पहचान कितनी है। जिस छत पर बने कमरे में बैठकर लिख रहा हूँ, उसे कौन लोग जानते हैं; कितने यहाँ तक मेरे साथ आए हैं। सवाल ‘पर्सनल’ है इसलिए जवाब भी व्यक्तिगत ही होगा। बिलकुल इसी तरह उन कोनो सड़कों मोहल्लों गलियों जगहों में हम होते हुए भी नहीं हैं। बस हम तभी तक हैं जब तक हम वहाँ से गुज़र रहे होते हैं। वरना किसे पड़ी है किसी के हिस्से का शहर बचाने की।

तभी तो लगातार वह बदलता रहता है। हमें बदलने से पहले बताता नहीं है। बस बदल जाता है। अब कोई गोरखधाम एक्सप्रेस से सुबह दिल्ली उतरे और अजमेरी गेट की तरफ़ निकले एकबारगी वह भौचक रह जाएगा। ये कहाँ आ गए हम। सामने हरी लाल बसें खड़ी हैं। एयरपोर्ट जाने के लिए मिनट मिनट पर मेट्रो है। पर इससे जादा नहीं। लोग वैसे ही हैं उनकी आवाज़ें ऐसी ही हैं। थोड़े कदम कमला मार्केट की तरफ़ बढ़ाएगा उसे वही रुका घंटाघर दिख जाएगा। वह भी वैसा ही है। उसकी सूई आज भी बरसों पहले की तरह कहीं चली नहीं गयी हैं। वहीं बंगाल से आये उन कारीगरों के इंतज़ार में हैं जिन्होंने एसआरसीसी की घड़ी ठीक की है।

थोड़ा और आगे जाने पर शजहानाबाद वैसा ही बसा मिलेगा। अजमेरी गेट भी वहीँ है। खारीबावली जाती सड़क का नाम भी तो आज तक जी बी रोड है। पिछली बार जिस लड़की को पकड़ कर लाया था इस शहर के साथ ही बड़ी हो गयी होगी। कुछ साल बाद इस बार वाली भी हो जाएगी।

शहर हमसे जायदा बड़े होते हैं। अभी चार बजे दूरदर्शन पर चश्मे बद्दूर में दिखने वाली दिल्ली आज की दिल्ली से काफी अलग है। यहाँ आज तालकटोरा स्टेडियम तो है पर कोई दीप्ति नवल फ़ाहरुख शेख़ के साथ बैठी ट्रूटी फ्रूटी नहीं खाती। बस वहाँ बनी छतरियों झाड़ियों में बैठने के एवज़ में कुछ रुपए ऐठने वाले ज़रूर उग आए हैं। नहीं बदला है तो लोधी गार्डन का अठपुला। जिसके पार उस लड़की का प्रेमी पहले से इंतज़ार कर रहा था और रवि बासवानी की सारी चतुराई धरी की धरी रह जाती है। इससे जादा दिल्ली उसमे दिखाई देती भी नहीं है। बस ईस्ट वेस्ट निज़ामुद्दीन की रिहाइश के कुछ सीन। हुमायूँ के मकबरे के पास नीले गुंबद वाला सब्ज़ बुर्ज़ और चिकनी सड़कें। लुटीयन दिल्ली की तीमारदारी।

जिस मंदिर मार्ग पर हम रहते हैं दिल्ली का सबसे कम बदले जाने वाला हिस्सा है। दो हज़ार दस न आया होता तो इसे भी बदलना कहाँ था। अब यहाँ नया स्कूल है। हरकोर्ट बटलर के सामने नवयुग स्कूल। पर नहीं इन लगातार सामने बीत गए सालों में यहाँ भी काफ़ी कुछ नहीं रह गया है। दो सौ सोलह दो सौ पंद्रह नंबर की बसें उसी नवयुग स्कूल की जगह बने बस स्टैंड से चलती थीं। हमारी ग्रेजुएशन तक थीं। चालीस नंबर तो गायब ही हो गयी। बदरपुर बार्डर जाती थी। सीधे। पीछे उदद्यान मार्ग पर तब सीएनजी पंप स्टेशन बन रहा था। जगमोहन ने वहाँ बसी झुग्गी बस्ती को झटके से गायब कर दिया। और झटके से गायब हो गईं सारी सब्जी की दुकानें।

बहुत छोटे थे तब की याद है जन्माष्टमी आती तो साथ वहीं से सैकड़ों दुकाने उग आती थीं। भीड़ की भीड़ कालीबाड़ी मार्ग से होते हुए घूमती खाती पीती सैर करती रहती थी। अब कई सालों से बिरला मंदिर के सामने बहुत बड़ा पार्क बन आया है। तब ‘महाबोधि सोसाइटी’ के सामने कई टूरिस्ट वाले थे निगम की कई दुकानें थी। एक ऐसी ही शाम याद है जब सुमन के साथ वहाँ ‘थम्सअप’ पी थी। बिरला मंदिर को आती सारी बसें वहीं बनी पार्किंग में ही खड़ी होती थीं।

इससे भी छुटपन की याद जनवरी में लिख रहा था जब आज जहाँ नया स्कूल है वहीं बस स्टैंड से होते हुए वहाँ बनी पंद्रह बीस दुकानों तक जाते थे। एक तरह से टैक्सी स्टैंड था। फिर वहीं से बिरला मंदिर के बिलकुल सामने बना पार्क। तब वहाँ तांगे वाले भी दिख जाते थे। कभी तांगे नहीं दिखते थे तब घोड़े की लीद की गंध नाक में घुस जाती।

अब वहाँ कुछ नहीं है। इधर साउथ इंडिया क्लब भी तोड़ दिया गया है। बिल्डिंग तो कई सालों से बंद थी इस जून उसे ढहाकर नयी इमारत बनाई जा रही है। वहाँ अब पता नहीं सांबर वडा खाने का मौका लगेगा कि नहीं। तब तक शायद और दो चार लोग चले जाएँगे। कुछ और अकेले रह जाएंगे। फिर ऐसी किसी इतवार की शाम होते होते निकल पड़ूँगा अपने हिस्से का शहर देखने। उसमे कहाँ कहाँ अभी भी पाया जा सकता हूँ। कितनी हद तक वह वैसा ही मेरा इंतज़ार कर रहा है। शायद वह इंतज़ार मेरा होगा। जो मैंने बड़े चुपके से उसकी जेब में डाल दिया है। कि आऊँगा तो वहीं मिलना। कुछ देर तुम्हारे साथ भी बैठूँगा। दिन पुराने होते जाएँगे। यादों की तरह। तब इन पन्नों पर लौटूँगा। देख भर लूँगा। फिर चला जाऊंगा।

{ यह पोस्ट जयपुर से निकालने वाले दैनिक 'लोकदशा ' में चौबीस अगस्त को 'पुराने शहर से मिलने मैं ज़रूर जाऊँगा ' शीर्षक के साथ प्रकाशित हुई है। 'ब्लॉगस् इन मीडिया 'के लिंक पर इसे देख सकते हैं ।

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