अगस्त 12, 2013

हमारे भूलने की नव साम्राज्यवादी पटकथा

तारीखें आती हैं चली जाती हैं हमें कोई फरक नहीं पड़ता। उनका होना न होना भूलने के खिलाफ़ एक मौका हो सकता है पर हम चूक जाते हैं। यह चूकना उस दिन को भूलना नहीं हमारे प्रतिरोध का साल दर साल कमजोर होते जाना है। उसकी स्वीकृति जैसा है। स्वीकृति उस संस्कृति के सहज हो जाने की। कि हमे उसके साथ रहने में कोई दिक्कत नहीं है। यहाँ सह-अस्तित्व आकर विचारधारा का रुप ले लेता है और उस सच को ढक लेता है, जिसे उघाड़ देने की सबसे जादा ज़रूरत है।

छह अगस्त। तारीख़ ऐसे बीत जाती है जैसे कुछ हुआ ही न हो। पता नहीं हमारे जापान के साथ कैसे संबंध है और क्या इस दिन दूरदर्शन ने कोई रिपोर्ट दिखाई भी थी या नहीं। हम अगर डर रहे हैं उन लोगों को याद करने से तो एक दिन आएगा जब हम भी याद करने लायक नहीं रह जाएंगे। पहले ही ईरान से गैस पाइपलाइन ठंडे बस्ते में सुस्ता रही है फिर इधर हम अपने निर्णयों के लिए किसी दूसरे राष्ट्र के मुखापेक्षी रहना अपनी स्वतन्त्रता को कमतर करना है।

अभी पीछे बीते दिन स्टार मूवीस पर ‘टर्मिनेटर साल्वेशन’ आ रही थी। दृश्य कंप्यूटर से रचे हैं पर उस ‘जजमेंट डे’ के दिन जो जहाँ है वहीं ठहरा रह गया है। सड़कें वीरान हैं, पहाड़ सुनसान से पसरे खड़े देख रहे हैं। इस परमाणु विस्फोट के बाद अमेरिका में रह रहे इन्सानों की लड़ाई ‘स्काय नेट’ कंपनी के बनाए उच्च तकनीक सम्पन्न मशीनों से चल रही है। जो इंसान हैं वे अपने आप को ‘रेसिस्टेंस’ कहकर संबोधित कर रहे हैं। माने उनका प्रतिरोध उस मशीनी आक्रांता से है जो मानव जाति को समूल समाप्त करना चाहता है। यह मानव जाति की लड़ाई बिलकुल उसी तर्ज़ पर लड़ी जा रही है जैसे कई देशों में लोकतन्त्र स्थापित करने की गरज से उन देशों के बदले यह देश युद्ध लड़ता रहा है।

उनकी कल्पनाओं में युद्ध स्थायी भाव है। ऐसे कल की कल्पना जहाँ सिर्फ़ उनके देशवासी इस धरती पर आए संकट से किसी नायक की तरह मुक्त कराएंगे। मूलतः यह ‘हिरोइज़्म’ उस हथियार उद्योग को कच्चा माल मुहैया कराने जैसा है जहाँ डर का कारोबार गोली की नली से होकर गुज़रता है। डर नहीं होगा कोई कल्पित शत्रु नहीं होगा तो कैसे हजारों करोड़ के फंड पास होंगे। कैसे किसी मित्र राष्ट्र को रुपयों के बदले अपने देश में निर्मित हथियार सहायता के नाम पर दिये जा सकेंगे। फ़िर वहाँ का जनमानस विकास के सवाल उठाएगा ही नहीं वह उठाएगा बंदूक, रॉकेट लौंचर। बलास्टिक मिसाइल।

स्काय फॉल’ के साथ जेम्स बॉण्ड पचास साल का हो गया। एक ध्रुवीय हो गयी दुनिया में इंग्लैंड की छटपटाहट बढ़ गयी है। ऐजेंट ‘डबल ओ सेवेन’ के सामने ख़ुद को बचाए रखने का सवाल है। यहाँ भी छवियाँ कुछ ऐसी ही मौजूद हैं। उनका पुराना ऐजेंट खूफिया सूची को अपने कब्ज़े में कर लेता है। एम ने पीछे बॉण्ड को लगा रखा है। उन सारे जासूसों को जो दूसरे देशों की गोपनीय ख़बरे लगातार उन तक पहुँचाते रहे। हम लोग ‘एजेंट विनोद’ और ‘एक था टाइगर’ बना कर हाँफने लगते हैं उनके एजेंट पूरे आइलेंड को रातों रात रासायनिक प्रदूषण की अफ़वाह उड़ाकर हड़प उसे अपना बेस बना लेता है।

वहाँ वह अपने बचपन की एक कहानी सुनाता है। कि उसकी दादी के पास भी एक आइलेंड था। खास बड़ा नहीं फिर भी वह उनके लिए जन्नत से कम न था। उसका चक्कर वे आराम से तब घंटे दो घंटे में लगा लिया करते थे। एक बार वह गर्मियों की छुट्टियों में उनसे मिलने गए। और देखा वह जगह चूहों से भर गयी थी। वह किसी मछ्ली पकड़ने वाली नाव के साथ चूहे आ गए। और नारियल से पेट भरते थे। तो अब चूहों को उस आइलेंड से कैसे निकालें। तब उसकी दादी ने उसे सिखाया। एक तेल के ड्रम के उन्होने जमीन में गाड़ दिया और उसके मुहाने पर नारियल का चारा लगाया। चूहे नारियल खाने आते और उस तेल के ड्रम में गिर जाते। एक महीने में उन्होने सारे चूहे पकड़ लिए।

पर अब वह इस ड्रम का करते क्या? उसे आग लगा देते? समंदर में फेंक देते। नहीं उन्होने यह दोनों विकल्प नहीं चुने। उन्होने उसे वैसे ही रहने दिया। फिर उन्हे भूख लगने लगी। और एक एककर वह एक दूसरों को खाने लगे। आखिरी में बचे सिर्फ़ दो हिम्मत वाले। अब इन दो चूहों का क्या हुआ। दादी ने अपने पोते के साथ उन दोनों को नारियल के पेड़ों पर छोड़ दिया। पर अब उनकी नारियल खाने की आदत नहीं रही। वह चूहों को खाने लगे। उनकी तासीर बदल गयी।

इस कहानी को आज की इस दुनिया पर आरोपित कर हम समझ सकते हैं कि इस ज्यामिती में हमारे देश की क्या भूमिका है। इन देशों की तासीर एक दिन दो दिन में नहीं बदली। यह तरक़ीब इन्ही नव-साम्राज्यवादी देशों की आज तक इस्तेमाल की जाने वाली कूटनीति है जिसके बल पर वे आज तक कायम हैं। हम बस एक दूसरे को खा रहे हैं क्योंकि किसी ने हमे ऐसा करने को कहा है।

फ़िर अगर किसी को तारीख़ याद नहीं रहती तब तो वह बड़ी छोटी सी बात है। क्यों सही कहा न..!!

{कल बीस दिसम्बर थी। अचानक बी.एस.पाबला कमेंट न करते, तो पता भी नहीं चलता के जयपुर से निकालने वाले 'लोकदशा' में यह पोस्ट वहाँ 'नारियल छोड़ एक दूसरे को खाने लगे' नाम से सत्रह अगस्त को प्रकाशित हुई थी। वहाँ तो नहीं पर उसकी छायाप्रति के लिए इस जगह जाया जा सकता है।

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