अगस्त 14, 2013

'छोटी सी बात' के अरुण का 'कुन्दन' में बदल जाना

जहाँ पीछे छोड़ा था।

खुद इतना बूढ़ा नहीं हुआ हूँ, न इस उम्र को ऐसा वैसा कुछ कहा जाता है। पर इस आज वाली पीढ़ी के सामने ऐसा महसूस करने के कई बहाने कई-कई कारण मौजूद हैं। उनमे से एक है ‘झिझक का होना’। संकोच किसी भी बात को लेकर हो सकता है। किसी लड़की की तरफ़ देखना है, कैसे देखना है, कहाँ से कनअखियों का काम शुरू होगा, कब खुद ही पलक को झुका लेना है। पहली बात तो यह के उसे जिसे देख रहे हैं पता नहीं चलना चाहिए। गर पता चले भी तो उसे असहज नहीं करना है।

अपना अरुण इसी ‘कटेगरी’ का नायक है। शक्ल से भोला भाला। साधारण सा दिखने वाला। आज के लड़कों की तरह नहीं जो अख़बार में खबर बन टंग जाते हैं। ‘जेएनयू में साथी छात्रा पर हमले के बाद युवक ने की ख़ुदकुशी’

अरुण के पास एक ठीकठाक नौकरी है दफ़्तर में बाबू है उसके नीचे चार छह लोग काम करते हैं। माँ बाप हैं नहीं। उम्र इस पाएदान पर है जहाँ एक साथी की तलाश शुरू की जा सकती है। उसने कर भी दी है। इस सारे ब्योरे में वह है, उसका अकेलापन है, उसके इच्छाएं हैं। मतलब प्यार करने लायक लड़की की तलाश उसने शुरू कर दी है। दूसरे अर्थों में उसे यह कूट संदेश सामने वाले पक्ष की तरफ़ प्रेषित करना है और सकारात्मक उत्तर की प्रतीक्षा करनी है।

उस रात इस ‘छोटी सी बात’ के साथ जो फिल्म याद आ रही थी वह धनुष की 'राँझणा' थी। इन दोनों को यदि समय का दस्तावेज़ मान उन मनोवृतियों को भी काल-सापेक्ष समझ लिया जाये तब इस पूर्वधारणा के बाद क्या हम कह सकते हैं कि अरुण और इस नए नायक के बीच जो समय बीता है उसने हमारे समय के लड़कों को कुछ अलग तरीकों से गढ़ा है। कुछ बदला है तो कई सारी बातें अभी भी वैसी ही हैं। एक-एक करके शुरू करते हैं। बातें काफ़ी जटिल और उबाऊ हैं।

जैसे हम जिन्हे किन्ही ज्ञात-अज्ञात कारणों से पसंद करने लगे हैं या उन्हे पास महसूस करने लगे हैं उनके प्रति हमारा व्यवहार कैसा है। हम खुदको किन रूपों में जता रहे हैं। अरुण बेचारा इस तरह से देखता है कि दिख न जाये के देख रहा हूँ। पर कुन्दन ऐसा नहीं करता। वह ज़ोया को बचपन से पहली नज़र से पसंद करने लगा है और वहीं किसी प्रेम में गिर भी गया है। उसका पीछा करता है। जगह जगह उसे दिख जाता है। कि कभी-न-कभी लकड़ी उसे देख ले और वही सारी विचार प्रक्रियाएँ उसके मस्तिष्क में अपना काम करने लगें।

सत्रह थप्पड़ खाकर भी नाम पूछे बिना नहीं रहता और बनारस की गलियों में लगातार पीछा करने से भी नहीं चूकता। रिक्शे वाले से कहता है ‘पैसे न लेना भाभी है तुम्हारी’!! वहीं अरुण एक सुबह विद्या सिन्हा के अपने दफ़्तर आने पर काटो तो खून नहीं वाली सिचुएशन में पहुँच गया है। कि अब लड़की आई है तो क्यों। कहीं उसकी कंपनी के मालिक से शिकायत तो नहीं कर देगी। यह डर ही अरुण को अरुण बनता है।

अरुण ने एक सेकंड थर्ड हैंड मोटरबाइक खरीद ली है। वह प्रभा को उसपर घुमाने के सपने देखता है। प्रभा एक सुबह उसके साथ चल भी पड़ती है पर उस पहली बार में ही जब हीरोइन पीछे बैठी है तभी उस मोटर सायकिल के प्राण पखेरू कहीं उड़ जाते हैं और पीछे से आते नागेश के स्कूटर पर वह चली जाती है। यहाँ बड़े ध्यान से राँझणा में यही सब देखने लायक है कि ज़ोया कुन्दन को अपने बचपन के दोस्त की हैसियत से अपनी दिल्ली वाली कहानी बताती है और कुन्दन क्या करता है। ले जाकर नया नवेला स्कूटर ज़ोया के साथ जल समाधि धारण कर लेता है। उसके अन्दर गुस्सा है कि जिसे शिद्दत से वह प्यार कर रहा है उसे अरमानों पर यूँ नंगे पैर चल नहीं सकती। उसे रौंद नहीं सकती। यह उस एकाधिकार को भी स्पष्ट करता है जो उस ज़ोया को उसकी वाली बनाता था।

यह वही शाहरुख़ खान है जो 'डर' में है या 'तेरे नाम' के सलमान खान में। लेकिन शाहरुख़ उसे ख़ुद बदलते हैं और थोड़े 'फेमिनिन मेल' के रूप में सिल्वर स्क्रीन पर आते हैं। जो थोड़ा केयरिंग है, 'मर्द को दर्द नहीं होता' वाला मर्द नहीं, 'उसके सीने में भी एक अदद दिल है' वाला। पर यहाँ क्या कुंदन को कस्बाई मानसिकता का प्रतिनिधि मान सारी बातें स्वीकार कर लें। नहीं। हमें उन प्रक्रियाओं को समझना होगा जो वहाँ उन जगहों को बना रही हैं।

कुन्दन के चरित्र में इस पुरुष सत्तात्मक समाज के चिह्न सतह पर तैरते दिखाई देते हैं। वह ज़ोया का नाम ले तो एक बाप की औलाद नहीं। ऐसा वह ख़ुद कहता है। बचपन में एक बार कलाई काट चुका है और दूसरी बार भी काट लेता है। लड़की उसकी तरफ़ आकर्षित नहीं है फ़िर भी बार-बार उसे जतलाने के लिए उन हिंसक तरीकों से भी परहेज़ नहीं करता। मतलब स्त्री की इच्छा का कोई मोल नहीं। तुम हमे प्यार कैसे नहीं करोगी वाली ज़िद। उस हद तक ज़िद कि सगाई के वक़्त पहुँच कर सबको यह बता देना कि लड़का मुसलमान नहीं है।

यहाँ दोनों नायकों में अंतर यह भी है कि दोनों की उम्र जब दोनों को प्यार होता है उसमे किशोरावस्था और युवावस्था जितना अंतर है। पर देखा जाये तो किशोरावस्था वाला आकर्षण जवान होते-होते कम होने के बजाय बढ़ गया है। तो क्या इसे नवउदारवादी काल के साथ आई सांस्कृतिक सामाजिक प्रक्रियाओं का प्रतिफलन मान सहज स्वीकार कर लें जहाँ वह दोस्त के साथ सिनेमा ‘साजन’ फ़िल्म देख कर निर्णय करता है कि ज़ोया को वह अब जाने नहीं दे सकता।

सवाल है लड़कों में आया यह परिवर्तन उन्हे किस तरह गढ़ रहा है? उन्हे कैसे सामाजिक प्रक्रियाओं का उत्पाद बना रहा है। मराठी फ़िल्म ‘शाला’ में किशोर होता लड़का अपनी कक्षा में पढ़ने वाली लड़की को सिर्फ़ यह बोलने के लिए कि वह उसे अच्छी लगती है, उसे रास्ते में कलाई पकड़कर रोक लेता है। फ़िर क्या होता है। लड़की उसके साथ दिबाकर बेनर्जी के लक्की के साथ किसी रेस्तेरा में किसी काइयाँ वेटर के हाथों ठगा जाना स्वीकार कर लेती है। नहीं। वह अपने घर पर सारी बात बताती है। फिर होती है पिटाई। इसका काल खंड है आपातकाल के आस पास। मतलब तबतक परिवार नामक संस्था की कोशिशों को धूमिल करने वाले माध्यम तब तक प्रकाश में नहीं थे। उनका हस्तक्षेप जितना कुन्दन की ज़िंदगी पर है उतना अरुण की ज़िंदगी पर नहीं।

जितना समाज इधर खुलकर सामने आया है उसमे कुछ छिपाने लायक इस पीढ़ी को लगता ही नहीं है। ध्यान दें कि यह पंक्ति किसी भी तरह से उन दक्षिणपंथी विचारों की तरह प्रतिगामी नहीं मानी जानी चाहिए जिसके दरीचे किसी ‘नैतिक’ कहलाई जाने वाली शिक्षा पर खुलते हैं। बल्कि उस संक्रमण काल की तरफ़ इशारा करने भर के लिए हैं जहाँ हम किसी भी चीज़ को इतनी साफ़गोई से सही और गलत में नहीं बाँट सकते। बस उन्हे समझ सकते हैं।

अरुण कुन्दन में बदल गया है। उसने चुप रहकर छिपकर प्यार करना छोड़ दिया है। अपने अर्थों में पूरे औज़ारों में वह भी इस समाज में पला बढ़ा युवा है पर उसके पास उत्प्रेरक के नाम पर ऐसी ऐसी इच्छाएँ  हैं जिन्हे वह पूरा कर लेना चाहता है। आज प्यार के मंज़िल पर न पहुँचता देख खुद को मिटा लेना नहीं है बल्कि तेज़ाब खरीद उस लड़की का चेहरा जला देने तक पहुँच गया है। यहाँ प्यार सिर्फ़ रूमान नहीं एक सामाजिक आर्थिक प्रक्रिया है जिसे कई-कई कारक निर्धारित व पोषित कर रहे हैं।

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