अगस्त 20, 2013

पेड़ की छाव का सपनों से भी गायब हो जाना

जिनको हम बचपन से देखते आ रहे हैं उनमे से कई धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। यादें बातें मुलाकातें, किसी मोड़ पर अधूरी रह गयी कहानी ही नहीं, किसी के हाथ की छुअन, किसी के होंठों की मुस्कुराहट भी है। बड़े आहिस्ते से यह सब हमारे सामने गुज़रता रहता है और जब तक हमें उनके बारे में पता चलता है वह अपनी जगह से कई इंच पीछे खिसक चुके होते हैं। अलविदा न कह पाना सबसे ज़ायदा कसक देता रहता है। आखिर तक।

हम अपने आम के पेड़ को मरता देख रहे हैं। धीरे-धीरे वह बूढ़ा होता रहा पर अपनी उमर हो जाने के बाद भी उसकी फल देने की आदत गयी नहीं। हर साल नहीं तो क्या, एक-एक साल छोड़कर। उसकी जड़ें आसपास की कंक्रीट हो गयी जमीन से कितना अंदर जाकर गुठलियाँ इकट्ठा करती होंगी। धीरे-धीरे उसकी गति औरों की तरह नहीं रह पायी। उनमे मिठास घोलने के लिए किसी से कहा नहीं। अपने आप सींचता रहा।

आज लगता है वह अकेला नहीं था। उसने बाकी सबको भी कह रखा होगा। तभी बाकी तीन पेड़ों में कभी आम नहीं आये। वह सब नीचे ही नीचे गुपचुप अपना काम करते रहे। सब मिलकर उसे जिंदा रखने की कोशिश करते रहे। अब लगता है उस जमीन से लड़ते-लड़ते हार रहा है। उसकी जड़ें अब वैसी नहीं रहीं।

बहुत पुरानी याद में इसकी छाव में पिट्ठू खेल रहे हैं। हम चार पाँच से जादा होंगे। बार-बार जब भी गेंद से दूसरी तरफ़ का साथी मारना चाहता मैं नए-नए बड़े हो रहे उस पेड़ की आड़ में छिप जाता। बारी-बारी हम सब ऐसा ही करने लगे। उसने कभी मना नहीं किया। वह हमें छिपा भी लेता और हमारे हिस्से की मार भी खाता। उमर में हमसे छोटा ही रहा होगा। अभी आम नहीं दे सकता था न इसलिए हमे बचाता रहता।

एक दिन उसे काट दिया गया और हमारे उस मैदान के गायब होने के साथ ही कभी बड़े होकर उसकी डाड़ पर चढ़ने देने के सपने बिखर गए। थोड़ा हम भी बिखरे। पर संभल गए। शायद हमें दुख हुआ भी हो पर उसे जताते किसपर। उसी साल इस आम के पेड़ के चारों तरफ़ मिट्टी की जगह कंक्रीट ने ले ली। बिना सोचे समझे। कि वह साँस कैसे लेगा।

ऐसे ही अमरुद के पेड़ के साथ हुआ। हम कभी समझ ही नहीं पाये कि वह हमसे कितना प्यार करता था। ख़ुद बीमार रहने के बावजूद बारहमास हमें अमरुद देता रहता। बेवकूफ़ बनाने के लिए उन टहनियों पर ख़राब अमरुद उगने देता जिसके इर्दगिर्द कीड़े जादा रहते। धीरे-धीरे उसका तना झुकने लगा। पास बहती नाली से साफ़ पानी मिलता भी कैसे। तब भी अपने को खड़ा किए हुए था। उसने भी कटने का कोई इरादा ज़ाहिर नहीं किया था। पर एक शाम कुल्हाड़ी आई और वह वहाँ से चल पड़ा। कभी लौट के न आने के लिए।

धीरे-धीरे हो सकता है हम उसे भूलने लगें। कि छुपन छुपाई खेलते वक़्त कैसे नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे की सीढ़ी बन जाता था। किस को मना नहीं करता था। शायद तब वह हमारे सपनों में आए। साथ उसके अमरुद भी ज़िद करने लगें। ख़ुद वह चलता हुआ आ जाये। तब क्या जवाब देंगे।

पता नहीं यह कैसी पढ़ाई हमने पढ़ी और आज के बच्चे पढ़ रहे हैं। पेड़ों के सामान्य रोग तक हमें नहीं मालूम। कई बार उनके नाम तक पता नहीं होते। अपने आसपास के प्रति यह तादात्म्य बिठाने के बजाय यह हमें उजाड़ रही है। इस आधुनिक शिक्षा ने हमे हमारे लोक में अजनबी की तरह बड़ा किया। उनके प्रति प्रेम तक नहीं जता पाते हैं, आभार तो दूर की बात है।

अभी पार्क के पास वाला अशोक भी लगता है रूठ गया है। उसके भी पत्ते झड़ने लगे हैं। शायद आम के पेड़ ने उसे भी अपने साथ यहाँ से चलने को राजी कर लिया होगा। और सच में एक दिन आएगा जब दोनों नहीं होंगे। दोनों की बातचीत भी नहीं। बस हम रह जाएंगे। अकेले। किसी की छाव नहीं होगी। तब तन जाएँगी किसी कोक लिमका की बड़ी बड़ी छतरियाँ और ब्लैकबेरी फोन में इनकी तस्वीरें देख बच्चे पूछेंगे। तब हम उन्हे क्या जवाब देंगे। कि उनके बचपन में कोई पेड़ नहीं है।

सब हमसे नाराज़ होकर यहाँ से हमारे सपनों में चले गए। एक दिन वहाँ से भी कूच कर देंगे।

2 टिप्‍पणियां:

  1. उफ़. ऐसे कितने पेड़ मेरी यादों में भी बसे हुए हैं. देवघर में शीशम के बहुत से लम्बे, ऊंचे पेड़ थे. घर लौट कर जाती थी तो उनसे मिलना हमेशा होता था. फिर मेरा जाना कम क्या हुआ दीमक उन्हें अन्दर ही अन्दर खा गयी. इस पोस्ट से याद में कितने गुलमोहर खिल गए. शुक्रिया.

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    1. पेड़ मीठी सी याद की तरह हमेशा बने रहेंगे। बने रहें। उनका होना हमारा होना है। अपने वजूद के साथ। कभी तुम अपनी याद पर लिखना तब हम भी उसमे शामिल होंगे। कुछ पीछे जाकर हम भी उनसे अपनी पहचान बनाएँगे, दोस्ती करेंगे ..

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