अगस्त 21, 2013

पता नहीं ऐसी कितनी ही बातें तुमसे नहीं कही हैं

06:22 शाम, सत्रह अगस्त 2013

तुम्हारे कानों के पास बिलकुल बगल से अभी गुज़रा हूँ। तुम देख भी नहीं पायी। तब तुम सीढ़ियों पर बैठी कुछ याद करने की कोशिश में थी। कि तभी यह हुआ। मैं गायब होकर तुम्हें ऐसे ही देखता रहा हूँ। तुम्हें बिन बताए। तुम्हारी बगल कुछ देर बैठ खुद के पास लौटता हूँ जैसे।

हर बार नहीं देख पाती हो तुम। तुम्हारा न देख पाना ही तो देखता रह जाता हूँ।

अभी कल की ही तो बात है पानी बतासे खाते हुए तुम्हें याद हो आई मेरी। कि कैसे मना कर रहा था। नहीं खाऊँगा। तीखा है। और छिपा ले गया था कि तुम्हारे मुँह का छाला चल कर मेरे पास आ गया था। तुम चुप सी बस बैठी रही। तभी तुम्हें अकेला देख फ़ोन किया था।

ऐसी पता नहीं कितनी बातें हैं जो मैंने तुम्हें कभी नहीं बताई। या कभी बोला तो बस चुपके से मैं भी चुप हो गया।

दोपहर एक डेढ़ के बीच, बीता इतवार
काश ऐसा कोई कैलेंडर बनाता जिसमे नवंबर से पहले फरवरी आती। हर साल के लिए नहीं। बस इस बीतते साल के लिए। तुम बोली तब तो अगस्त के बाद ही होती तो क्या बात होती।

रात दस बजे, अट्टठारह अगस्त
कभी जातिवाचक संज्ञा का भाववाचक संज्ञा में बदल जाना अखरता नहीं है। पर जब संख्या की मद के दिन दूरियों को कम करने के बजाय बढ़ाते जा रहे हो तब दिल एक एक बीतते दिन उसे बे रुखी से सोखते चले जा रहे हैं। वहाँ कोई नहीं है। मैं भी नहीं। बस मेरी परछाई सी रह गयी है तुम्हारे पास।

उसी परछाई का एक हिस्सा तब लेता आया था। वरना जितना अभी बचा हूँ उतना भी नहीं बचता।

02:36 सुबह, अट्टठारह अगस्त
पता नहीं ऐसा क्यों था कि जब हम दोनों साथ थे तो चुपके से मोबाइल के म्यूजिक प्लेयर में मेहदी हसन की गज़ल चला देता। तब की शरारत मेरे आज को और खाली कर रही है। उसकी धुन ही अंदर तक धँसती चलती है। तुम्हारी याद बहोत बे-क़रार करते हैं। वो दिन जो साथ गुज़ारे थे प्यार में हमने, तलाश उनको नज़र बार-बार करते हैं।

इस हद तक इतना सुनता हूँ के रोने को हो आता हूँ। फ़िर भी मन नहीं मानता। दिल नहीं माना तो क्लाउड पर अपलोड कर यहाँ लगा लिया है। मौके बे-मौक़े रात बैठा दिल को और उदास कर लेता हूँ। जैसे अभी रात के ढाई बज रहे हैं। मैं अकेला बैठा बस बैठा ही रह गया हूँ।

उन्नीस अगस्त शाम पौने छह
तुम्हारे मेरे हिस्से रहेंगी ऐसे कई यादें
ऐसे कई दिन, ऐसी कई -कई शामें

उन्नीस अगस्त पौने बारह बजे रात
एकबार फ़िर मोबाइल उठा कर देखता हूँ। कोई मिस कॉल नहीं। तुम्हारी भी नहीं। ऐसा करके एकबार फ़िर अकेला हो जाता हूँ। बिलकुल उस आसमान से गिरी अभी-अभी बूँद की तरह। पता नहीं ऐसा क्यों होता जा रहा है। अपने आप को इस तरह होने से दूर रखने के बावजूद। इधर दिल्ली में हफ़्ता भर हुए बादल डेरा जमाये हुए हैं। तुम नहीं हो इसलिए भीग नहीं रहा। बस अबेस्टस की छत के नीचे बैठा कुछ-कुछ सोचता रहता हूँ। मेज़ पर चॉक्लेट को बीते कई दिनों तक पड़े रहने दिया है। आज फ़िर उसके रैपर पर छोटे-छोटे अक्षरों में तुम्हें ढूँढ रहा था। तुम कहीं नहीं मिलती। फ़िर उदास हो आता हूँ।

सुबह उनींदे सपने में था। उठते वक़्त याद भी था। मन में था के लिख लूँगा। पर नहीं सुबह की शाम हो गयी नहीं लिख पाया। और अब धुंधली याद भी नहीं। पर हाँ उसमे कहीं किसी कोने पर अभी भी हम दोनों अटके हुए हैं। किसी पीपल के पेड़ की डाड़ में साथ साथ। हवा के झौंको के साथ हिलते से।

बादल गड़गड़ा रहे हैं। खूब पानी है। कुछ और तस्वीरें होती। लिखने का मन नहीं है। बस सोचे जा रहा हूँ। तुम होती। मैं होता। दोनों साथ कहीं से चलना शुरू करते। उनकी बनती बिगड़ती बूंदों के संग अपने कदमों की छाप होती। तुम्हारा ऐसे मेरे पास न होना अंदर तक खाली कर देता है। इस कमरे में जीने लायक कुछ कम हो गया हो जैसे। कुछ तुम कम हो कुछ मैं कम हूँ।

इन कमज़ोर से दिखते शब्दों वाक्यों की तरह रोज़ मैं भी कमज़ोर होता जा रहा हूँ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. भई, क्या गजब लिखते हो अमा यार ...
    मुरीद हो गया

    आर्य मनु, उदयपुर

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    उत्तर
    1. बस थोड़ा बहोत जी रहे हैं। थोड़ा बहोत रियाज़ कर रहे हैं। उन्ही दरमियानी कुछ-कुछ चलता रहे तभी ठीक।

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    2. raat ki 11.45 baje ya dhaai baje...
      ye jo aansu vahan beh rahe hain na...
      unki namkeen mahak yahan tak aa rahi hai..

      हटाएं

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