अगस्त 22, 2013

पिछली शाम का हासिल: तीन अधूरे ड्राफ़्ट

पहला ड्राफ़्ट

दीपिका मुझे कभी भी अच्छी अदाकारा नहीं लगी। अदाकारा बोलना ही उससे कुछ जायदा की डिमांड करने जैसा है। बिलकुल वैसे ही जैसे कल ‘दामिनी’ के आखिरी सीन में ऋषि कपूर अपने परिवार के खिलाफ़ बयान देकर मुस्करा रहे थे। सोचता हूँ कि पता नहीं अगर रणबीर कपूर  फ़िल्म इंडस्टरी में नहीं कूदे होते, तब देखते इस मोटे तुंदियल को कौन ‘दो दुनी चार’ में लेता और कौन इस बुढ़ाते दंपति को ‘बेशरम’ में साथ काम करने का मौका देता।

यह अमिताभ के अपने बेटे अभिषेक को लगातार सत्रह फिल्में फ्लॉप हो जाने के बाद भी टिकाये रहने के बाद की उत्तर आधुनिक मीमांसा है जहाँ बेटे का रुतबा अपना काम कर रहा है। ख़ैर।

बारह अगस्त। इतवार। घोषित सरकारी चैनल पर ‘रंगोली’ आगे आने वाले तीन दिन की तय्यारी में जी-जान से जुटा था। आजतक हमने देशभक्ति जैसे संप्रत्यय को सेना के अलावा किसी सीमा पर कहीं और देखने की जहमत नहीं उठाई है। उनका होना किसी पड़ोसी राष्ट्र के विरुद्ध अपने अस्तित्व को बनाए रखना है।

दूसरा ड्राफ़्ट

‘पोशम पा भई पोशम पा, लाल किले में क्या हुआ’ की तर्ज़ पर बने लुंगी डेन्स’ के साथ अभी-अभी ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ ख़त्म हुई है। फ़िल्म कुछ ख़ास नहीं। बर्बर समाज के अवशेष की तरह है। लड़ लो अपनी होने वाली बीवी के लिए। जीत जाओगे तो जिंदा भी रहोगे और लड़की मिलेगी सो अलग। पर यहाँ इस के बारे में तो लिखने बैठा नहीं। रजनीकान्त को ‘डैडिकेट’ हाइ बीट हाइ वोल्टेज गाना।

दिल्ली का मौसम इतना रोमेंटिक हो रहा है। रह-रह बूँदें गिर रही हैं और उसका रूमान और बढ़ता जा रहा है। यह पंक्ति जितनी ‘स्टीरियोटाइप’ है उसी अनुपात में कालांतर की सीमाओं के परे जाकर उस गाने में दीपिका की पोशाक है। जिस तरह के ब्लाउज़ में नायिका वहाँ नृत्य कर रही है और नाभि के दो-ढाई इंच नीचे साड़ी लपेट रखी है। क्या इसी तरह कोई महिला दिल्ली मेट्रो में यात्रा कर सकती है। ‘दोस्तना’ की प्रियंका भी कुछ कम ‘सेक्सी’ नहीं लगती उन डिजाइनर साड़ियों में। पहाड़गंज में घूम के दिखाएँ तब जाने।

शायद ऐसी मांग ही पुरुषसत्तात्मक समाज की गहरी उपस्थिती बताने के लिए काफी हो। कपड़ों पर और उनके सीमित सौंदर्यशास्त्र में उन्हे ऐसे ही होना है।

तीसरा ड्राफ़्ट

कभी-कभी जो सबसे बकवास सबसे कमजोर शुरुवात लगती हैं उन्ही से शुरू करना पड़ता है। जैसे कि अभी। बिलकुल अभी। कि बताऊँ पिछले पौने घंटे में तीन पोस्टों को ड्राफ़्ट मे रखकर बाहर बारिश में भीग लेने के बाद चार पाँच मिनट लेटे रहने की दरमियानी में यही सोचता रहा कि लिखूँ तो कैसे। कितना अजीब है न कि एक बंदा लिखना चाहता है पर लिख नहीं पा रहा। वह ऐसा क्या लिख देना चाहता है जो कह नहीं पा रहा। वैसे नहीं लिखेगा तो कोई आसमान नहीं फट पड़ेगा। पर नहीं। हम तो ढीठ किस्म के जीव हैं। कुछ भी कूड़ाटाइप लिखे बिना मानते कहाँ हैं।

मन में कई बातें एक साथ चल रही हैं। सबको तरतीबवार उतारने का धैर्य चुकता जा रहा है इसलिए भी लैपटाप के और पास आकर उसी मेज़ पर चढ़ बैठा हूँ। कि अब कहाँ भागोगे बच्चू।

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