अगस्त 08, 2013

एक्सट्रीम पर्सनल: इसे ख़त समझना बेनामी

दिल थोड़ा भारी है। बस लिख रहा हूँ। ताकि आगे वाले दिन ऐसे न हों।

कल रात लगा मेरे सारे शब्द कहीं गायब हो गए हैं। उनका कोई अर्थ ही नहीं रह गया। वह कभी बोले ही न गए हों जैसे। बिलकुल वैसे ही जैसे कि मैं तुम्हारे लिए। सुबह अब तक कि सबसे भयानक पंक्ति सोचते हुए सिहरहन न बाजू से गुज़री न आँखों से होते हुए पैरों की तरफ निकली। उस क्रिया के बाद सारे सवाल अपने आप शांत हो जाते। पर उसका होना पलायन कर जाना है। जबकि लड़ना उन स्थितियों से जूझना ही है। पर यह हम दोनों बैठ कर सुलझा लेंगे। कहीं लगता है। बस

जिससे रात बात होने के बाद ठीक से नींद आती हो, मन न लगता हो अचानक आज वह अवांछनीय हो गया। तुम्हारा फ़ोन 'स्विच ऑफ' है। रात भर लगता रहा फ़ोन अब घरघरा रहा है। उधर तुम हो। बराबर उचक उचककर गर्दन मोड़ता इस मेज़ पर रखी किताबों तक लाता। कोई रोशनी नहीं दिखती तो उठकर आता। और निराश हो हर बार लेट जाता। रोने को हो आता। कुछ आँसू आते भी। चुपके से। पर नहीं आता तो उधर से एक मैसेज भी। 

पूरी रात ऐसे जाग उठ बैठने में बीत गयी। पर नहीं।  सुबह छह बजे कुछ लिखा था। कविता में कहने की आदत नहीं। फिर भी। लेट होरहा था फ़िर भी:
कल तक कही मेरी सारी बातें शून्य में बदल गईं
उनमे कोई अर्थ बचा नहीं रह गया 
उनका होना न होने के बराबर है।

वरना ऐसे कैसे होता कि मैं कहूँ और तुम्हें सुनाई न दे।
बात न करना बिलकुल सही रास्ता है
जब दो लोग बात न करना चाहें। 
या कहूँ 
जब कोई एक दूसरे से बात न करना चाहे।
लगता था मैं और पुरुषों की तरह  नहीं हूँ, उनसे कुछ अलग हूँ। कुछ बात है मुझमे। जो अलग करती है। पर नहीं। सारा तिलिस्म एकाएक आज टूट गया। तुमने तोड़ दिया। एक झटके से। अचानक लाग्ने लगा हम कितना कुछ लिए बैठे हैं एक दूसरे के लिए। जिनके जवाब एक दूसरे से कभी लिए भी नहीं। बस उनमे जुड़ता गया जुड़ता गया। 

पता नहीं मुझे क्या हो गया है? शायद खुद से नाराज़ चल रहा हूँ। खुद के बाद दूसरी तुम हो, जिसे पता चलता है। तुरंत। प्रतिकृया की तरह। तीर से भी तेज़ बातें कभी कभी बोल जाता हूँ। पता नहीं आवाज़ में पहले वाला विस्मय कहाँ खो गया है। तुम्हें भी नाराज़ करता चला हूँ। तुम्हें जाता देता हूँ किस्से बात कर रही हो। वहाँ अब हैरानी नहीं है। आश्चर्य में बाल सुलभ चंचलता भी नहीं है। बस रह गयी है आवाज़। 

मुझे लगता था के अपने हिस्से के सच बताकर उन पुरुषों से तो अलग ही काम कर रहा हूँ जो छिपाते बगलें झाँकते हैं। एक हाँड़ माँस का जीव अब मेरे साथ था। पर मालूम नहीं था इस बनाने में कहीं सबसे जायदा पुरुष होता गया। तुम्हें ऐसे साँचे में ढाल रहा था जिसे मैंने गढ़ा था। लेकिन असली तुम को ढकता गया ढकता गया। बिन पूछे। 

फ़िर कल लगा के मेरी इस रौं में तुम भी चल पड़ी थी। पर उसमे तुम कहाँ थी। वहाँ भी मैं था। सीधी और सबसे आसान बात यही समझ में आती है कि मैं तुम्हारी ज़िन्दगी में दखल की तरह आया। जैसी तुम कल जी रही थी उनमे कतरब्योंत करने न करने की चाहिए अनचाही चाहत लिए। हम एक दूसरे की तरफ़ खिंच रहे थे, खिसक रहे थे, लुढ़क रहे थे या इनमे से सब कुछ होते जा रहे थे या इनमे से कुछ भी नहीं होते जा रहे थे। पर दिख रहा था कि ऐसा कुछ हो रहा है। लगातार। भ्रम ऐसे ही काम करता है। करता रहा। 

और तुम उन सारी बातों में लगातार नाराज़ होते जाने का समान इकट्ठा करती जा रही थी। मुझे बिन बताए। जबकि मुझे लगता रहा उन सारी बातों में हम दोनों हैं। बराबर हैं। पर नहीं। उनमे सिर्फ़ मैं था। मेरी दिल को लग जाने वाली बातें थी। मतलब एक तरफ़ तुम्हें मेरी बातें जैसी भी लग रही थी तुम उनको हँस कर टाल रही थी और मैं था कि ताव दिखाकर तुरंत फ़ोन काट देने कि आदत बनाए जा रहा था। पर कल तुमने भी वही किया। जो जो बातें कभी न कभी लगीं दिल के गहरे उतर गईं उन्हे एक साथ कह गईं। 

इन सारी बातों के बावजूद कल डायरी में नौ पचपन पर क्या लिखा था पता है? बताता हूँ: 

पता नहीं हम दोनों यहाँ कैसे पहुँच गए? इतनी सारी बातों के बाद भी? तुमने साथ के साथ अपनी बातें क्यों नहीं कहीं? तुम्हें कहा तो नज़र लगी है। बिस्तर पर तकिये के नीचे दो सिक्के रख सोना। फ़िर तालाब में फेंक देना।

बात करना छोड़ूँगा नहीं। लगातार बात होगी तब यह आ गयी दूरी मिटेगी। तुम बात करोगी न! बस यह मत कहना कि मेरा फ़ोन है मेरा बैलेन्स है, मेरी मर्ज़ी। यह थोड़े दिनों कि बात है, फ़िर ठीक हो जाएंगी ये बिगड़ी रातें।
जिस बात को लेकर डर रहा था वही हुआ। शाम सवा पाँच से जायदा हो गए हैं और हमारी तुम्हारी एक भी बार बात नहीं हुई है। पता नहीं दिल कैसा कैसा हो रहा है। यह गाना सुनकर तो और भारी हो गया।

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